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    Home»अंतर्राष्ट्रीय»बीएनपी को प्रचंड जनादेश के मायने
    अंतर्राष्ट्रीय

    बीएनपी को प्रचंड जनादेश के मायने

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inFebruary 14, 2026
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    बांग्लादेश ने तारिक रहमान की पार्टी बीएनपी को प्रचंड जनादेश दिया है। बेशक यह अभूतपूर्व, अप्रत्याशित और ऐतिहासिक जनादेश है। संसद की कुल 300 सीटों में से 212 सीटों पर बीएनपी के उम्मीदवार जीते हैं। जिस शख्स ने निर्वासन के 17 लंबे साल लंदन में काटे हों, अचानक वक्त और परिस्थितियां बदल गईं और आज उसका प्रधानमंत्री बनना महज औपचारिकता भर है। बांग्ला लोगों ने एक लोकतांत्रिक, समावेशी, प्रगतिशील, महिला सशक्तिकरण वाले और विकासशील देश के लिए जनादेश दिया है, लिहाजा तारिक रहमान की यही सबसे गंभीर चुनौती है। जिन इस्लामवादी ताकतों ने ऐलान किया था कि अब बांग्लादेश एक मुस्लिम देश होगा और अल्लाह के कानून, यानी शरिया, से देश चलेगा। ‘कठपुतली’ यूनुस इन्हीं कट्टरपंथियों की हुकूमत का हिमायती था। जनता ने उन जेहादी किस्म की कट्टरपंथी और भारत-हिंदू-विरोधी ताकतों को लगभग खारिज कर दिया है। जमात-ए-इस्लामी के 11 दलों के गठबंधन को 74 सीटें ही नसीब हुई हैं। पाकिस्तान और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई, जनरल मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज का ‘इस्लामिक एजेंडा’ और ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ धरे-धराए रह गए हैं, क्योंकि बीएनपी भी पाकिस्तान को फासले पर रखने की पक्षधर रही है। यह जनादेश छात्रों, युवाओं की बगावत की आड़ में कट्टरपंथी ताकतों के आंदोलन के 18 माह बाद सामने आया है। तब ‘जुलाई चार्टर’ तय किया गया था और शेख हसीना को देश छोड़ कर भागने को विवश किया गया था, इसके पक्ष में भी 70 फीसदी से अधिक लोगों ने मतदान किया है। तख्तापलट प्रधानमंत्री शेख हसीना के बाद एक लोकतांत्रिक सरकार ‘नया बांग्लादेश’ बनाएगी और भारत उस देश के साथ खड़ा रहना चाहता है, प्रधानमंत्री मोदी ने तारिक रहमान को बधाई देते हुए यह अपेक्षा की है और भरोसा दिया है। यह गौरतलब है कि करीब 20 साल बाद बीएनपी बांग्लादेश की सत्ता में लौटी है।

    यकीनन यह चुनाव आसान नहीं था। मतदान के दौरान 14 इलाकों में जमकर हिंसा हुई, लाठियां चलीं, बूथ पर बम धमाके किए गए, बूथ छापे गए, आधी रात में फर्जी मतदान के वीडियो ने सब कुछ बेनकाब कर दिया। इसके अलावा, अल्पसंख्यक हिंदुओं पर 4000 से अधिक हमले किए गए, उनके मंदिर, देवी-देवताओं की प्रतिमाएं खंडित की गईं, फिर भी एक करोड़ से अधिक हिंदुओं ने, लोकतंत्र और बंगाली देश की खातिर, मतदान किए। उन्होंने ‘अवामी लीग’ पर पाबंदी के बावजूद बीएनपी को वोट दिए और ‘मुस्लिम देश’ बनाने की साजिशों की बाजी ही पलट दी। भारी संख्या में महिलाओं ने भी बीएनपी को जनादेश दिया, जो पार्टी सत्ता में रही है और कमोबेश उनकी सोच संकीर्ण और जेहादी नहीं है। बहरहाल खूंरेजी, कत्लेआम, लूटमार, ढहती अर्थव्यवस्था का वह दौर खत्म हो रहा है। अब तारिक रहमान की बीएनपी को बंपर बहुमत हासिल हुआ है, लिहाजा वह ताकतवर नेता के तौर पर उभरे हैं। वह दो बार प्रधानमंत्री रहीं खालिदा जिया के बेटे हैं। उनके हालिया इंतकाल से भी बीएनपी के पक्ष में सहानुभूति वोट आए होंगे! तारिक के पिता जियाउर्रहमान देश के राष्ट्रपति थे। चुनौती और प्राथमिकता अब यह होनी चाहिए कि भारत के साथ रिश्ते किस तरह मधुर, सकारात्मक और सहयोगपूर्ण हो सकते हैं, क्योंकि दक्षिण एशिया में बांग्लादेश भारत का सबसे बड़ा और अहम कारोबारी साझेदार है। हमारा चिंतित सरोकार है कि हिंदुओं और उनके मंदिरों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। कट्टरपंथी ताकतों पर नियंत्रण रखा जाए, सडक़-रेल-जलमार्ग की परियोजनाएं, जिनमें भारत का मोटा निवेश है, फिलहाल दांव पर हैं। भारत सरकार की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति में बांग्लादेश एक अहम देश है। भारत उम्मीद कर रहा है कि कनेक्टिविटी योजनाओं में आपसी सहयोग बढ़ेगा। सवाल यह भी है कि ढाका में पाकिस्तान का दखल अब भी कितना रहता है? चीन बांग्लादेश में कितना दिलचस्प है? सबसे अहम यह होगा कि अब तारिक रहमान कितना भारत-समर्थक होते हैं, क्योंकि उनके नेतृत्व में ही बांग्लादेश में ‘इंडिया आउट अभियान’ चलाया गया था।

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