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    Home»लेख-आलेख»युद्ध का परिणाम जो भी हो, विभीषिका झेलता आम आदमी
    लेख-आलेख

    युद्ध का परिणाम जो भी हो, विभीषिका झेलता आम आदमी

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inMarch 31, 2026
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    युद्ध की विभीषिकाओं के चलते एक तरफ जान-माल का विध्वंस तो दूसरी ओर आम आदमी के लिए विकास दर में गिरावट, महंगाई, बेरोजगारी और खाद्य असुरक्षा विश्व के लिए किसी भी प्रकार से मंगलकारी नहीं हो सकती…

    पिछले दो सप्ताह से अधिक समय से अमरीका और इजराइल द्वारा ईरान पर हुए हमलों के बाद, जहां एक ओर इस युद्ध की आग 20 देशों तक फैल चुकी है, जिसकी वजह से हजारों जानें तो गई ही हैं, बड़ी मात्रा में तेल और गैस के भंडार भी नष्ट हुए हैं, भारी मात्रा में संपत्ति का भी नुकसान हुआ है, साथ ही पूरा विश्व ही समुद्री मार्गों के बाधित होने के कारण फिलहाल तो तेल और गैस की कीमतों में वृद्धि से भी जूझ रहा है। वैश्विक एजेंसियों की मानें तो युद्ध के कारण दुनिया में मुद्रास्फीति, गरीबी और खाद्य असुरक्षा भयंकर रूप से बढ़ सकती है। साथ ही आपूर्ति श्रंृखला में बाधा, जहाजरानी लागतों में वृद्धि और महत्वपूर्ण कम्पोनेंट्स की उपलब्धता में कमी के चलते वैश्विक आपूर्ति आघात, अर्थव्यवस्थाओं में अफरा-तफरी मचा सकते हैं। ऐसा माना जा रहा है कि यह युद्ध अमरीका की तेल भंडारों पर पकड़ बनाने की महत्वाकांक्षा के कारण हो रहा है, हालांकि पहले तो यह कहा गया कि ईरान आणविक हथियार बना रहा है और इसके कारण अमरीका और विश्व की शांति भंग हो सकती है, लेकिन अब अमरीकी प्रशासन के लोग भी यह कहने लगे हैं कि अमरीका ने बिना वजह इस युद्ध को छेड़ा है। वे इजरायल को युद्ध भडक़ाने के लिए दोषी ठहरा रहे हैं। लेकिन समझना होगा कि पहले तो वेनेजुएला के राष्ट्रपति की गिरफ्तारी कर उसे अमरीका लाया जाना, और अब ईरान पर हमला करना, विशेषज्ञ ऐसा मानते हैं कि यह सब दुनिया के तेल भंडारों पर अमरीका के काबिज होने की कोशिश का यह संकेत है। अंतरराष्ट्रीय न्यूज एजेंसी रायटर का यह कहना है कि इससे पहले इराक में सत्ता परिवर्तन के माध्यम से वहां के तेल भंडारों पर भी अमरीका का लगभग कब्जा हो चुका है। दुनिया में अपनी धौंस जमाने के लिए इस प्रकार से युद्ध थोपना अवांछनीय है।

    महंगाई का खतरा : यूं तो कोई भी जंग महंगाई को बढ़ाने का कारण बनती है, लेकिन दुनिया की अधिकांश कच्चे तेल और गैस की आवश्यकताओं को पूरा करने वाले खाड़ी के देशों के इस जंग में शामिल होने के कारण स्वाभाविक तौर पर तेल और गैस की कीमतों में वृद्धि से महंगाई तो बढ़ती ही है, समुद्र के रास्ते सामान की आवाजाही में आने वाले अवरोधों के कारण साजोसामान की कमी के चलते भी महंगाई बढ़ती है। युद्ध जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा है, यह समस्या भीषण रूप लेती जा रही है। महंगाई के कारण घटती क्रय शक्ति, आवश्यक वस्तुओं की कमी और सरकारों द्वारा उसे वहन करने की शक्ति कम होने पर सामाजिक अशांति का भी खतरा बढ़ सकता है। समझा जा सकता है कि युद्ध के कारण बढ़ती महंगाई आवश्यक वस्तुओं की कमी और यदि उसके कारण सामाजिक अशांति फैलती है तो उसका सीधा सीधा खामियाजा आम आदमी को ही भुगतना पड़ता है।

    वित्तीय बाजारों में खलबली : युद्ध के हालात में निवेशकों का रुझान सुरक्षित परिसंपत्तियों की ओर हो जाता है। व्यवसायों में विश्वास डगमगाता है और अनिश्चितता फैलती है। ऐसे में शेयरों और बांडों में निवेश की बजाय लोग ज्यादा सोना, चांदी खरीदने लगते हैं। स्वाभाविक तौर पर शेयर बाजार गिरने लगते हैं। भारत की बात करें तो युद्ध के समय से लेकर अभी तक मुंबई स्टॉक एक्सचेंज का सेंसेक्स 7 प्रतिशत से अधिक गिर चुका है। वैश्विक बाजारों की बात करें तो वहां भी यही स्थिति देखने को मिल रही है। शेयर बाजार में गिरावट का भी सीधा सीधा असर आम आदमी पर ही पड़ता है। एक तरफ उसके पोर्टफोलियो का मूल्य कम हो जाता है और साथ ही साथ पेंशन फंडों द्वारा शेयर बाजारों में निवेशित धन का मूल्य भी कम हो जाता है।

    अर्थव्यवस्थाओं पर युद्ध का असर : सामान्यत: भारत जैसे विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर युद्ध का असर नकारात्मक ही पड़ता है। सबसे पहले तेल की कीमतें बढऩे से विदेशी मुद्रा का बहिर्गमन बढ़ जाता है और विदेशी मुद्रा भंडार कम हो जाते हैं। दूसरे, बढ़ते आयात बिल और संस्थागत निवेशकों द्वारा पूंजी के बहिर्गमन के कारण स्थानीय मुद्रा का अवमूल्यन हो जाता है। गौरतलब है कि युद्ध के पिछले लगभग तीन सप्ताह में रुपए का मूल्य डॉलर के मुकाबले लगभग 3.0 प्रतिशत घट चुका है, और यह प्रक्रिया लगातार जारी है। तीसरे मुद्रास्फीति से निजात दिलाने के लिए सरकारों को ऊर्जा, खाद्य पदार्थों और उर्वरकों पर अधिक सब्सिडी देनी पड़ती है या कर कम करने पड़ते हैं। ऐसे में सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ता है जिसका सीधा असर दोबारा से मुद्रास्फीति पर पड़ता है जिसका खामियाजा आम आदमी को ही भुगतना पड़ता है। यही नहीं कि केवल विकासशील अर्थव्यवस्थाएं ही प्रभावित होंगी, विकसित देश भी इससे अछूते नहीं रहेंगे। स्वयं अमरीका में भी आने वाले समय में भारी मंदी की आशंका व्यक्त की जा रही है। अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी मूडीज का कहना है कि इस बात की 49 प्रतिशत आशंका है कि अमरीका अगले 12 महीनों में मंदी का शिकार हो जाएगा और उसे रोक पाना कठिन होगा। इसके पीछे बढ़ती तेल कीमतें, युद्ध के कारण अवरुद्ध अंतरराष्ट्रीय मार्ग, बताई जा रही हैं, एक तरफ रोजगारविहीन आर्थिकी संवृद्धि और दूसरी ओर युद्ध के कारण बढ़ती कीमतों के चलते अमरीका का मंदी में जाना लगभग तय माना जा रहा है।

    बाधित हो सकती है खाद्य सुरक्षा : दुनिया में खाद्य पदार्थों का उत्पादन सभी देशों में इस जैसा नहीं है कि हर देश अपनी खाद्य सुरक्षा स्वयं कर सके। ऐसे में इन देशों को खाद्य निर्यातक देशों से आयात पर निर्भर होना पड़ता है। युद्ध के कारण वस्तुओं के आवागमन में बाधा आती है जिसके चलते खाद्य पदार्थों के आयात पर निर्भर देशों में खाद्य सुरक्षा का संकट खड़ा हो जाता है। खाद्य असुरक्षा और खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि आदि का सीधा असर भी आम आदमी पर ही पड़ता है। हालांकि भारत अपनी खाद्य आवश्यकताओं के लिए अधिकांशत: आत्मनिर्भर है, लेकिन इसके बावजूद तेलों और दालों के मामले में आयात पर निर्भरता बनी हुई है। इन वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि भी आम आदमी के जीवन पर प्रतिकूल असर डाल सकती है।

    विकास पर प्रतिकूल प्रभाव : लंबे समय में, युद्ध के कारण व्यापार में रुकावटों और बढ़ती अनिश्चितता के कारण निवेश कम हो जाता है, जिससे वैश्विक जीडीपी की वृद्धि धीमी हो जाती है। दूसरे, युद्ध और पुनर्निर्माण पर बढ़ा हुआ खर्च सरकारों को ज्यादा कर्ज लेने के लिए बाध्य करता है, जिसके परिणामस्वरूप सरकारी कर्ज बढ़ जाता है और भविष्य में वित्तीय दबाव पैदा होता है। तीसरे, युद्ध के कारण तकनीकी बदलावों की दिशा रक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और साइबर सुरक्षा के क्षेत्रों की ओर मुड़ जाती है। इससे इनोवेशन को बढ़ावा तो मिलता है, लेकिन इसके साथ ही संसाधनों को सामाजिक और विकासात्मक क्षेत्रों से हटाकर दूसरी तरफ लगाना पड़ता है। कुल मिलाकर, युद्ध आर्थिक प्राथमिकताओं को बदल कर संतुलित तथा टिकाऊ वैश्विक विकास को कमजोर कर सकता है। आज सबसे जरूरी काम वैश्विक शांति को बहाल करना और यह सुनिश्चित करना है कि विकास में कोई रुकावट न आए। कोविड के बाद, वैश्विक विकास दर, जो अभी 2.5 प्रतिशत से 3.0 प्रतिशत के आसपास बनी हुई है, अभी तक कोविड-पूर्व के 3.5 प्रतिशत से 4.0 प्रतिशत के स्तर तक नहीं पहुंच पाई है। ऐसा माना जा रहा है कि युद्ध के कारण वैश्विक आर्थिक संवृद्धि की दर 0.2 प्रतिशत से 1.0 प्रतिशत तक और कम हो सकती है। युद्ध की विभीषिकाओं के चलते एक तरफ जान-माल का विध्वंस तो दूसरी ओर आम आदमी के लिए विकास दर में गिरावट, महंगाई, बेरोजगारी और खाद्य असुरक्षा विश्व के लिए किसी भी प्रकार से मंगलकारी नहीं हो सकती। विश्व के तमाम देशों को युद्ध की समाप्ति के लिए अपने प्रयास बढ़ाने होंगे।-डा. अश्वनी महाजन

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