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    Home»लेख-आलेख»जनजातीय खेल प्रतिभा: हमारा राष्ट्रीय गौरव-श्रीमती द्रौपदी मुर्मु
    लेख-आलेख

    जनजातीय खेल प्रतिभा: हमारा राष्ट्रीय गौरव-श्रीमती द्रौपदी मुर्मु

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inApril 2, 2026
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    द्रौपदी मुर्मु
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    श्रीमती द्रौपदी मुर्मु
    भारत की राष्ट्रपति

    मैंने देखा है कि ग्रामीण क्षेत्रों और वनांचलों में, बच्चे घर के बाहर प्रकृति के सानिध्य में अधिक समय बिताते हैं। वे खेल-कूद के सहज तरीके खोज लेते हैं। वे मिट्टी में लकीरें खींचकर और आकृतियां बनाकर, खेलने की जगह तैयार कर लेते हैं। वे फलों के सूखे बीजों का खेल की गोटियों की तरह इस्तेमाल कर लेते हैं। सूखे पत्तों, पेड़ों की जड़ों और फटे-पुराने कपड़ों से गेंद बना लेते हैं। बांस का उपयोग करके हॉकी और फुटबाल के गोल-पोस्ट बना लेते हैं। इस प्रकार, अनेक प्राकृतिक वस्तुओं का उपयोग करके, वे अपने खेल-संसार की रचना कर लेते हैं। बहुत से बच्चे बिना जूते और जर्सी के पूरे जोश से खेलते रहते हैं। पोखरों-तालाबों में बच्चे खूब तैरते रहते हैं। तैराकी की इस सहज प्रतिभा को अब उपलब्ध प्रशिक्षण और संसाधनों की सहायता से विकसित करके, केवल 15 वर्ष की, जाजपुर की बेटी अंजलि मुंडा ने प्रथम ‘खेलो इंडिया जनजातीय खेल 2026’ में पहले ही दिन तीन स्वर्ण-पदक जीत कर पूरे देश के युवाओं को प्रेरित किया।

    तीरंदाजी के प्रति जनजातीय लोगों में सहज तरंग सी होती है। संताल-समुदाय ने वर्ष 1855 में शोषण के विरुद्ध एक घनघोर संग्राम किया था जो ‘संताल हूल’ के नाम से अमर है। आधुनिक हथियारों से लैस ब्रिटिश सेनाओं ने उस क्रान्ति को दबा तो दिया लेकिन अपने विवरणों में अंग्रेजों ने संताल वीरों के युद्ध कौशल, खासकर तीरंदाजी का विशेष उल्लेख किया है। संताल-हूल का नेतृत्व करने वाले बहादुर भाइयों सिद्धो-कान्हू तथा चांद-भैरव एवं वीरांगना बहनों, फूलो-झानो की प्रतिमाओं का झारखंड में उनके गांव उरी-मारी में जाकर अनावरण करने का सौभाग्य मुझे तब मिला था जब मैं राज्यपाल थी। तीरंदाजी में एकलव्य की महानता से देश का बच्चा-बच्चा परिचित है। वे श्रेष्ठतम धनुर्धर के रूप में सम्मानित हैं। एकलव्य, सभी देशवासियों के लिए, विशेषकर जनजातीय समाज के लिए एक प्रेरक विभूति हैं। एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालयों में स्थापित ‘खेल उत्कृष्टता केंद्र’ बच्चों को खेल-कूद की आधुनिक सुविधाओं और पद्धतियों से सक्षम बना रहे हैं। इसी प्रकार स्कूल-व्यवस्था के साथ-साथ अन्यत्र विद्यमान खेल-प्रतिभाओं की पहचान करने और उन्हें प्रशिक्षित करने के कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं।

    मेरे व्यक्तिगत प्रयासों से, मेरे गांव में वंचित वर्गों के बच्चों के लिए एक आवासीय स्कूल की स्थापना की गई है। इस विनम्र प्रयास के तहत स्कूल के परिसर में ही तीरंदाजी के प्रशिक्षण की व्यवस्था भी कराई गई है। सरकार के प्रयासों के साथ-साथ छोटे-छोटे व्यक्तिगत और सामूहिक प्रयास भी जनजातीय बच्चों में निहित खेल-प्रतिभाओं को निखारने में सहायक होंगे।

    मेरे गांव के अन्य जनजातीय बच्चों की तरह, मुझमें भी तैराकी सहित, व्यायाम और खेलों के प्रति बहुत रुझान था। मैं स्कूल की खेल प्रतियोगिताओं में प्रायः प्रथम स्थान पर रहती थी। एक प्रतियोगिता में जानबूझकर मैंने अपने को इसलिए पीछे रखा ताकि मेरी एक सहेली को प्रथम पुरस्कार का आनंद मिल सके। खेल-कूद से टीम भावना विकसित होती है तथा सामाजिक संबंध मजबूत होते हैं। मैदान पर कड़ी प्रतिस्पर्धा और मैदान के बाहर गहरी मित्रता, खिलाड़ियों में प्रायः देखने को मिलती है।

    मेरे भाई फुटबाल के बहुत अच्छे खिलाड़ी रहे हैं जो गंभीर चोट लगने के कारण आगे नहीं खेल सके। मेरे परिवार के कुछ अन्य सदस्यों ने भी विभिन्न खेलों में उत्कृष्टता प्रदर्शित की है। इस निजी विवरण से मैं यह बताना चाहती हूं कि जनजातीय परिवारों में खेल-कूद की जीवन्त परंपरा विद्यमान है। उनमें खेलों के लिए असीम प्रतिभा है, ऊर्जा है, रुचि है और आगे बढ़ने का हौसला भी है। सुविधाओं और प्रशिक्षण के द्वारा ऐसी प्रतिभाओं को निखारने से, खेल-कूद उनके लिए केवल मनोरंजन और सामाजिक मेल-जोल का जरिया न होकर जीवन में आगे बढ़ने का, आर्थिक आत्म-निर्भरता और सामाजिक सम्मान प्राप्त करने का माध्यम बन सकता है। इस संदर्भ में वर्ष 2018 से केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकारों तथा खेल- संस्थानों के साथ मिलकर चलाए जा रहे ‘खेलो इंडिया’ अभियान द्वारा अच्छा बदलाव आया है।

    कुछ वर्षों पहले तक हमारे देश में खेल-कूद की अच्छी सुविधाएं केवल महानगरों तक सीमित थीं जबकि ग्रामांचलों और वनांचलों में अनेक प्रतिभावान खिलाड़ी रहते हैं। जनजातीय क्षेत्रों में खेल-अकादमी और प्रशिक्षण सुविधाएं सुलभ नहीं होती थीं। अब एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालयों में बच्चों के खेल-कूद पर विशेष ध्यान देने से लेकर ‘खेलो इंडिया जनजातीय खेल’ जैसे प्रयत्नों के बल पर जनजातीय प्रतिभाओं को प्रशिक्षण और प्रोत्साहन मिल रहा है।

    मुझे याद है कि मेरे विद्यार्थी जीवन के दौरान ग्रामीण स्तर पर, पांच-छह गांवों के लोग मिलकर खेल प्रतियोगिताएं आयोजित किया करते थे। कुछ आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संस्थाएं भी जनजातीय क्षेत्रों में खेल-कूद को बढ़ावा देती रही हैं। प्रायः ग्रामीण क्षेत्र की प्रतियोगिताओं में भाग लेने वाले अच्छे खिलाड़ी भी ग्रामीण स्तर से ऊपर नहीं उठ पाते थे। पिछले कुछ वर्षों में, इस स्थिति को बदलने के अनेक सराहनीय प्रयास किए गए हैं। ऐसे प्रयासों को आगे बढ़ाते हुए ‘खेलो इंडिया जनजातीय खेल 2026’ का आयोजन किया गया। इस आयोजन से जमीनी स्तर के जनजातीय खिलाड़ियों को भी पहचान मिली है तथा उन्हें सुविधाएं और प्रशिक्षण उपलब्ध कराए गए हैं। इन राष्ट्रीय खेलों में लगभग सभी राज्यों और संघ राज्यक्षेत्रों के खिलाड़ियों ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया है।

    भारत ने खिलाड़ियों की नैसर्गिक प्रतिभा के बल पर ओलिम्पिक खेलों में पहला स्वर्ण-पदक, हॉकी के लिए, वर्ष 1928 में जीता था। उस विजय में जनजातीय समुदाय के खिलाड़ियों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। तब से लेकर आज तक दिलीप तिर्की, सुबोध लाक्रा और सलीमा टेटे जैसे स्टार-हॉकी खिलाड़ी भारत की पुरुष तथा महिला टीमों को जनजातीय प्रतिभा से समृद्ध करते रहे हैं।

    भारत सरकार द्वारा चलाए जा रहे ‘खेलो इंडिया’ नामक राष्ट्रीय खेल विकास कार्यक्रम के तहत स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक सभी भौगोलिक क्षेत्रों, सामाजिक वर्गों और संस्थाओं के लिए समुचित खेल इको-सिस्टम उपलब्ध कराने का समावेशी प्रयास किया जा रहा है। इसी कार्यक्रम के तहत, खेल-कूद में बेटियों की भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए चलाई जा रही ‘अस्मिता’ नामक योजना से जनजातीय बेटियों की क्षमता भी विकसित हो रही है। ‘खेलो इंडिया जनजातीय खेल 2026’ द्वारा शुरू की गई मुहिम को मजबूत बनाते हुए जनजातीय खेल-प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने से, खिलाड़ियों के ऐसे समूह तैयार होंगे जो विश्व-पटल पर भारत को खेल-महाशक्ति के रूप में स्थापित करेंगे।

    पिछले कुछ महीनों में आयोजित बस्तर एवं सरगुजा ओलिम्पिक में कुल 7 लाख से अधिक खिलाड़ियों ने भाग लिया। उन खिलाड़ियों में कुछ ऐसे युवा भी शामिल थे जो नक्सलवाद के रास्ते को छोड़कर खेल-कूद के सन्मार्ग पर चल पड़े हैं। खेल-कूद से युवा-ऊर्जा को सकारात्मक अभिव्यक्ति मिलती है। सरकार द्वारा युवाओं में खेल-प्रतिभा को पहचानने और विकसित करने के अच्छे परिणाम राष्ट्रीय और अंतर-राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में दिखाई देने लगे हैं।

    युवाओं, विशेषकर जनजातीय युवाओं की खेल प्रतिभा हमारे राष्ट्र की अमूल्य सामाजिक पूंजी है। मुझे विश्वास है कि इस अनमोल संसाधन का सदुपयोग करते हुए हमारा देश खेल-कूद के क्षेत्र में उत्कृष्टता के अनेक गौरवशाली प्रतिमान स्थापित करेगा। इसी विश्वास के साथ मेरा संदेश है – खेलो इंडिया! खूब खेलो इंडिया!

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