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    Home»संपादकीय»भारत के विक्टर ओर्बन…
    संपादकीय

    भारत के विक्टर ओर्बन…

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inApril 19, 2026
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    हंगरी के सत्ता परिवर्तन का भारतीय शासन व्यवस्था और राजनीति से कोई संबंध नहीं है। हंगरी की जनसंख्या भी एक करोड़ नहीं है। (अप्रैल २०२६ तक ९५ लाख ९० हजार।) इनमें ८० लाख मतदाताओं में से ६० लाख से ज्यादा मतदाताओं ने मतदान किया और १६ वर्षों से सत्ता पर काबिज प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बन को करारी शिकस्त दी। लोकतंत्र ने एक शक्तिशाली तानाशाही को मतदान के माध्यम से परास्त कर दिया। उनकी इस हार ने न केवल यूरोपीय देशों को, बल्कि पूरी दुनिया को आश्चर्यचकित कर दिया। विक्टर ओर्बन मतलब ‘सौ नरेंद्र मोदी और अमित शाह’ थे, उनके बारे में इतना वर्णन ही काफी होगा। भारत में फिलहाल जो सत्ता का भ्रष्ट किंतु अभेद्य मॉडल चल रहा है, वो शायद यहां के लोगों ने हंगरी के विक्टर ओर्बन से ही अपनाया होगा। विक्टर ओर्बन प्रे. डोनाल्ड ट्रंप के पक्के समर्थक थे इसलिए विक्टर के प्रचार के लिए अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वैंस अपनी पूरी ‘टीम’ के साथ शामिल हुए थे, लेकिन हंगरी में विक्टर ओर्बन के साथ-साथ प्रे. ट्रंप की भी हार हो गई।
    भारत से तुलना
    हंगरी में हुए सत्ता परिवर्तन की तुलना भारत की मौजूदा राज्य व्यवस्था से की जाती है, यह महज संयोग नहीं हो सकता। १६ साल से सत्ता में रहे विक्टर ओर्बन ने जनता को ‘राष्ट्रवाद’ वगैरह का नशा चढ़ाकर बहका दिया। ‘मैं ही राष्ट्रवाद का सेनापति और देश का तारणहार हूं’ ऐसा जोरदार प्रचार शुरू किया गया। उनका ‘फिडेस’ दल अजेय है और उसे हराना संभव नहीं, ऐसी हवा यूरोपीय देशों में फैलाई गई। जो भारत में होता दिख रहा है, वही हंगरी में २०१० से होने लगा था। बहुमत के जोर पर मूल संविधान को खत्म कर दिया और खुद को जैसा चाहिए वैसा बदलाव करके नया संविधान विक्टर साहब ने बना लिया। न्याय व्यवस्था को मुट्ठी में कर लिया। मीडिया पर ९० प्रतिशत नियंत्रण हासिल कर लिया और ‘क्रोनी वैâपिटलिज्म’ (पूंजीवादी मित्रवाद) के जोर पर सार्वजनिक संपत्ति अपने ही लोगों की जेब में डाल दी।
    विक्टर ओर्बान ने अपने कार्यकाल में उनके देश में क्या-क्या किया यह देखिए, फिर भारत से तुलना क्यों? इसका खुलासा हो जाएगा।
     पत्रकारिता पर नियंत्रण: स्वतंत्र पत्रकारिता पर प्रतिबंध लगाए गए। सोशल मीडिया पर सरकार विरोधी विचार व्यक्त करने वालों को धमकाया गया। उनके खिलाफ मामले दर्ज किए गए। सरकार की आलोचना को ‘राष्ट्रीय अपराध’ घोषित कर दिया गया। अनेक ‘मीडिया हाउस’ सरकार समर्थक उद्योगपतियों के नियंत्रण में आ गए। जो सरकार का समर्थन करते हैं, उन्हीं चैनलों और समाचार पत्रों को सरकारी विज्ञापनों की खुराक मिलने लगी।
     असीमित भ्रष्टाचार: चुनिंदा उद्योगपति मित्रों को मालामाल करने का अभियान चलाया गया। सभी सरकारी कॉन्ट्रैक्ट और लाभ अपने ही लोगों को दिए गए। कहा जाता है कि यह सारी बेनामी संपत्ति विक्टर ओर्बन की ही है।
     चुनाव जीतने के लिए कुछ भी: चुनाव जीतने के लिए भ्रष्ट तरीकों से चंदा इकट्ठा किया गया। विपक्ष को चुनाव में परेशानी हो, इस तरह से निर्वाचन क्षेत्रों की रचना की गई। खुद की ही पार्टी को फायदा हो, इस तरह से चुनावों में पक्षपात और भ्रष्टाचार किया गया। इसमें हंगरी का चुनाव आयोग भी शामिल हो गया।
     डर का राज: मतदाताओं और जनता में निरंतर भ्रम और डर पैदा किया। लोगों को धर्मांध बनाया। एक बड़े दुश्मन का आभास पैदा किया। (जैसे भारत में मुसलमानों और पाकिस्तान का हौवा खड़ा किया गया है।) शरणार्थियों, विदेशी नागरिकों और बुद्धिजीवियों, उदारवादियों को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरनाक बताया गया। ऐसे विचारों वाले लोगों के कारण देश संकट में आ जाएगा, ऐसा दुष्प्रचार करने में प्रधानमंत्री विक्टर सबसे आगे रहे।
     न्याय व्यवस्था पर कब्जा: देश की न्याय व्यवस्था को एक तरह से गुलाम और असहाय बना दिया गया। अपनी ‘फिडेज-केडीएनपी’ पार्टी के प्रवक्ताओं और चमचों को न्याय प्रणाली के सर्वोच्च पदों पर बैठाया गया। न्यायाधीशों की नियुक्ति व निवृत्ति के नियमों में गैर-जिम्मेदार तरीके से बदलाव किए गए, कानून का शासन कमजोर किया गया।
     अर्थव्यवस्था नष्ट हो गई: विक्टर को अर्थव्यवस्था के बारे में कोई समझ नहीं थी। उनके कार्यकाल में अर्थव्यवस्था सुस्त हो गई, महंगाई बढ़ गई, नौकरियां कम हो गईंऔर सार्वजनिक सेवाएं चरमरा गर्इं। आर्थिक और कानूनी अव्यवस्था के कारण यूरोपीयन निधि बंद कर दी गई।
     सेंट्रल विस्टा: भारत में प्रधानमंत्री मोदी ने Central Vista जैसी प्रशासनिक पुनर्रचना की परियोजना लागू की। नई संसद, नया प्रधानमंत्री कार्यालय और नई प्रशासनिक इमारतें बनाई गईं। अंग्रेजी शासन की निशानियों को मिटाने का यह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रयास विक्टर ने भी हंगरी की राजधानी ‘बुडापेस्ट’ में शुरू किया। ओर्बन ने बुडा कैसल और Liget परियोजना के माध्यम से राजधानी को अपने तरीके से सजाया। सत्ता पर अपनी पकड़ को मजबूत करने के लिए ही इन खर्चीली परियोजनाओं का निर्माण किया गया। आखिरकार मतदाताओं ने इन परियोजनाओं को नकार दिया।
    हंगरी नकली राष्ट्रवाद की एक यूरोपीयन प्रयोगशाला थी। भारत में हमेशा ‘घुसपैठियों’ के खिलाफ अभियान चलाकर राष्ट्रवाद को हवा दी जाती है। वही तरीका विक्टर और उनके लोगों ने हंगरी में अपनाया। विक्टर के समय में कट्टर, धर्मांध राष्ट्रवाद को बढ़ावा मिला। इसी तरह की राजनीति वहां लोकप्रिय हुई।
    ओर्बन यूरोप में कट्टर राजनीतिक विचारों के ‘पोस्टर बॉय’ बन गए। कुछ लोग विक्टर को पोप और जीसस से भी ऊपर मानने लगे। प्रे. ट्रंप भी विक्टर के प्रशंसक बन गए, जिसके कारण उपराष्ट्रपति वैंस ने विक्टर ओर्बन का खुलकर प्रचार किया। वैंस अपनी सभाओं से प्रे. ट्रंप को फोन लगाते और स्पीकर फोन माइक से जोड़कर जनता को ट्रंप का भाषण सुनाते। हम अमेरिका जैसी महाशक्ति के इतने करीब हैं, यह दिखाने का कोई भी मौका विक्टर ओर्बन नहीं छोड़ते थे।
    पीटर मग्यार
    १६ वर्षों तक असीमित और निरंकुश सत्ता का आनंद लेने के बाद विक्टर ओर्बन को पीटर मग्यार की ‘तिस्जा’ पार्टी ने करारी शिकस्त दी। पीटर मग्यार की पार्टी ने १९९ में से १३८ सीटें जीतीं। विक्टर ओर्बन को हार स्वीकार करनी पड़ी। हंगरी का जनमत इतना तीव्र था। पीटर ने ‘इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी’ (मतदान के माध्यम से थोपी गई तानाशाही) के खिलाफ आवाज उठाई और जनता की मदद से तानाशाही को हराया। हंगरी ने दुनिया को दिखा दिया कि तानाशाह चाहे कितनी भी किलेबंदी कर ले, अगर मतदाता एकजुट हो जाएं तो तानाशाही की र्इंट से र्इंट बजाई जा सकती है। ‘हम हंगरी रिजीम को खत्म कर देंगे’, यह घोषणा जब पीटर मग्यार ने पहली बार की, तब लोगों को लगा था कि यह संभव नहीं है। उन्होंने हंगरी के ग्रामीण इलाकों में हर दिन छह-छह सभाएं कीं। लोगों की नाराजगी उनके चेहरों पर साफ नजर आती थी। पीटर मग्यार ने उन परेशान लोगों को आत्मविश्वास दिया। हंगरी की यह जीत वहां के आम नागरिकों की जीत है। हंगरी ने साबित कर दिया कि लोकतंत्र कभी खत्म नहीं होता, वह केवल सो जाता है। जब लोगों की आंखें खुलती हैं तो तानाशाही को भागना पड़ता है।
    हंगरी की तरह भारत का लोकतंत्र भी फिलहाल सोया हुआ है। यहां के विक्टर ओर्बन ने लोकतंत्र को धर्म और राष्ट्रवाद की भांग पिला दी है, लेकिन वह भी उतर जाएगी और जनता जाग जाएगी।
    पीटर मग्यार ने लोकतंत्र के लिए आशा की एक किरण जगाई है। लोगों के लिए उनका संदेश था, ‘‘घबराओ मत, डरो मत।’’ १६ साल हंगरी की जनता ने कट्टरता के नशे और दहशत में बिताए। वह भयानक दौर समाप्त हुआ। लोग अब खुशी से नाच रहे हैं। देशभक्ति के गीत गाते हुए सड़कों पर उतर रहे हैं। गाड़ियों के हॉर्न बजाकर उत्सव मना रहे हैं। एक-दूसरे के कंधे पर सिर रखकर आंसुओं को बहने दे रहे हैं। मग्यार ने जीत के बाद पहली प्रेस कॉन्प्रâेंस की। साढ़े तीन घंटे खड़े रहकर वे पत्रकारों के सभी सवालों के जवाब देते रहे।
    मग्यार से पत्रकारों ने पूछा, ‘‘क्या विक्टर ओर्बन को भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल भेजेंगे?’’ मग्यार ने शांति से जवाब दिया, ‘‘प्रधानमंत्री का काम किसी को जेल में डालना नहीं है। न्यायालय को निष्पक्ष तरीके से अपना काम करना चाहिए। न्यायालय निष्पक्ष रूप से काम करे, इसके लिए मैं उसके साथ खड़ा रहूंगा। किसे जेल भेजना है, इसका निर्णय न्यायालय करेगा। मैं राष्ट्र निर्माण का काम करूंगा।’’
    नतीजों के बाद मग्यार ने जो कहा वह महत्वपूर्ण है- ‘‘आज रातभर जीत का जश्न मनाएंगे। कल से काम पर लगेंगे।’’
    लोकतंत्र और नेता ऐसा ही होता है।
    भारत के विक्टर ओर्बन को हंगरी की इन घटनाओं का अध्ययन करना चाहिए!

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