संसद का विशेष सत्र और हरेक मंच पर चर्चा कि महिलाओं की प्रगति, उन्नति और समृद्धि तब ही हो सकती है, जब उन्हें संसद और विधानसभाओं में आरक्षण मिले। 33 प्रतिशत आरक्षण विधेयक 3 साल पहले पारित हुआ और उस पर अमल करने के लिए सरकार ने संविधान संशोधन विधेयक के जरिए इस आरक्षण का दायरा बढ़ाने का असफल प्रयास किया। सरकार चाहती थी कि अब क्योंकि आबादी बढ़ गई है, इसलिए संसद में सीटों की संख्या बढ़ाई जाए, जो विपक्ष को मंजूर नहीं था और उसका कहना था कि मौजूदा संख्या में ही आरक्षण दिया जाए।
महिला आरक्षण क्या है : वर्तमान स्थिति यह है कि यह और कुछ नहीं, सिवाय इसके कि राजनीतिक घरानों की महिलाओं के लिए स्वॢणम अवसर, जिसके आधार पर वे देश की संसद में बैठकर अपनी शान-शौकत दिखा सकती हैं। इन परिवारों के पुरुष तो पहले से ही नेता हैं और अब उनके घरों की बहू, बेटी भी नेतानी अर्थात मैडम बन जाएं तो ये मु_ी भर परिवार राजनीति में अपना वर्चस्व हमेशा बनाए रखें। इसका अर्थ यह है कि वर्तमान संदर्भ अर्थात 543 सीटों में से 181 पर केवल महिलाएं ही उम्मीदवार बन सकेंगी तो फायदा सिर्फ बड़े और पहले से ही राजनीति में सक्रिय परिवारों को मिलेगा, न कि किसी दूरदराज क्षेत्र, अविकसित प्रदेश या गरीब परिवार से आने वाली महिला को, जो वास्तव में राजनीति में आना चाहती हो और अपने इलाके की जनता के लिए स्कूल, अस्पताल और अन्य आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था कराने में निर्णायक भूमिका निभा सकती हो।
इसके विपरीत यदि जनगणना और परिसीमन के बाद सीटों की संख्या बढ़ती है और एक तिहाई महिलाओं के हिस्से में जो सीटें आती हैं, तो उन पर अपना अधिकार जमाए रखने में इन तथाकथित बड़े परिवारों को सबसे अधिक नुकसान उठाना पड़ेगा। इसका कारण यह है कि उनकी सोच कभी अपने घरवालों को ही सत्ता में बनाए रखने से ऊपर उठकर साधारण लोगों के लिए आगे आने का रास्ता छोडऩे की कभी रही ही नहीं। प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव और उन्हीं के जैसे परिवारवादी दल इसीलिए वर्तमान सीटों में से ही 33 प्रतिशत महिलाओं के लिए आरक्षित करने की बात कर रहे हैं क्योंकि वे जानते हैं कि जैसे ही पिछड़े वर्गों, आदिवासियों और अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं को यह अधिकार मिल जाएगा कि उनकी भी राजनीतिक भागीदारी तय हो गई तो उनके पैरों तले जमीन खिसक जाएगी। इनकी ताकत केवल इसमें ही है कि कभी भी इनके खानदानों के अतिरिक्त कोई भी महिला स्वावलंबी और अधिकार संपन्न न हो सके, वे न तो उचित और उच्च शिक्षा प्राप्त कर सके और न ही किसी के सामने हाथ फैलाने, गिड़गिड़ाने और दुत्कारे जाने से मुक्ति पा सके।
महिलाएं और राजनीति : प्रश्न यह है कि क्या महिलाओं को राजनीति में लाने और उन्हें नेता बनाने में ही उनकी बेहतरी है या उन्हें उनकी योग्यता और कार्यकुशलता के अनुसार नौकरी, रोजगार और व्यवसाय चलाने का प्रशिक्षण देकर सशक्त भारत की कल्पना को साकार करना है? ध्यान रहे कि यह आधी आबादी की आकांक्षाओं और अपेक्षाओं का सवाल है और जरूरी है कि उनकी आवाज संसद और विधानसभा में कानून बनाते समय सुनी जाए क्योंकि वही जानती है कि दर्द कहां होता है और उसकी दवा क्या है। उदाहरण के लिए, जिन पंचायतों में महिला सरपंच बनीं, वहां पीने के पानी, शौचालय जैसी सुविधाओं पर दोगुना बजट खर्च हुआ। जो पुरुष समाज लड़की को पढऩे से रोकने, घर से बाहर निकलने और अपनी इच्छा के अनुसार व्यवसाय से लेकर विवाह तक करने में रुकावट डालता है, कहीं लड़की पैदा न हो जाए, भ्रूण हत्या करता है और यदि वह देर रात तक बाहर रहे तो उसे कठोर अनुशासन में रहने को कहता है, उसके लिए महिला का नेता बनकर नेतृत्व करना यदि संभव होता है तो इसमें वह अपनी पराजय देखता है।
सोचना यह है कि जैसे अनपढ़ या कम पढ़े लिखे पुरुष के मंत्री या मुख्यमंत्री बनने पर कोई सवाल नहीं होता, तो अशिक्षित महिला को भी सांसद या विधायक के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। उसके सामने पाबंदी और बड़े घरों की महिलाओं के लिए पूरी व्यवस्था कि वे अपना खाली समय संसद या विधानसभा में बैठकर बिताएं और जो वास्तव में वहां बैठने का अधिकार रखती है, वह कभी इस बारे में सोच भी न सके। राजनीतिक दल बार-बार महिला आरक्षण की बात करते हैं और कोई न कोई मुद्दा उठा कर इसे कानूनी रूप नहीं लेने देते क्योंकि नेताओं को अपने स्वार्थ पूरे करने होते हैं और अगर कोई इसमें बाधक हो, चाहे घर की महिला ही क्यों न हो, वे इसे कभी स्वीकार नहीं करेंगे।
जरूरी क्या है : आरक्षण हो या न हो, किसी भी महिला के लिए 4 चीजें जरूरी हैं-आर्थिक आज़ादी, घर के काम का बंटवारा, सामाजिक हैसियत और उसके बाद राजनीतिक ताकत। अगर 33 प्रतिशत आरक्षण मिल भी जाए और उसकी हिस्सेदारी अर्थात बोलने और पुरजोर तरीके से अपनी बात रखने से वंचित कर दिया जाए तो यह आरक्षण किस काम का। आधा-अधूरा न्याय अन्याय से अधिक खतरनाक होता है।
निष्कर्ष यही है कि अगर समाज साथ न दे तो कैसा भी आरक्षण हो, उसे स्वीकृति नहीं मिल सकती क्योंकि डर हमेशा यही रहता है कि जिसे आरक्षण मिला है वह हमसे आगे रहेगा क्योंकि दोनों के लिए योग्यता के पैमाने अलग हैं। महिला को संसद या विधानसभा तो भेजा जा सकता है लेकिन जब महिला अपने ऊपर होने वाले अत्याचार के खिलाफ कानून बना सकने की हैसियत में आएगी तो क्या समाज को यह मंजूर होगा? सामान्य वर्ग की महिला जब राजनीति में आएगी तो उसकी भूमिका शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर सकारात्मक बहस करने और इनका हल निकालने के लिए गंभीर प्रयास करने और कड़े कानून बनाने में अहम योगदान की होगी।
यदि वास्तव में महिला आरक्षण कर उन्हें राजनीति में लाना है तो वर्तमान संख्या को बढ़ाना ही होगा, अन्यथा वर्तमान संख्या में 33 प्रतिशत आरक्षण का अर्थ यही है कि ‘अंधा बांटे रेवड़ी, फिर-फिर अपने को दे।’ चाहे विधेयक पारित हो गया हो लेकिन उसे लागू तब तक नहीं किया जा सकता जब तक जनगणना और परिसीमन नहीं होता। इसलिए वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या इस विधेयक के आधार पर महिलाओं का संगठन के स्तर पर निर्णयात्मक तरीके से सशक्तिकरण हो पाएगा या यह केवल एक राजनीतिक उपलब्धि बनकर इतिहास के पन्नों में दर्ज होकर रह जाएगा।-पूरन चंद सरीन

