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    Home»लेख-आलेख»विपक्षी पार्टियों का कांग्रेस में विलय मुश्किल!…
    लेख-आलेख

    विपक्षी पार्टियों का कांग्रेस में विलय मुश्किल!…

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inJune 20, 2026
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    तृणमूल कांग्रेस में बगावत के बाद इंडिया गठबंधन में शामिल दलों के कांग्रेस में विलय की खबर जोर-शोर से उठी। एक सुझाव आया कि तृणमूल कांग्रेस को कांग्रेस में शामिल हो जाना चाहिए ताकि पार्टी में बगावत रोकी जा सके। शिव सेना (उद्धव ठाकरे गुट) के संजय राउत ने सुझाव दिया कि सभी विपक्षी पार्टियों को कांग्रेस में शामिल हो जाना चाहिए। राउत के सुझाव पर चर्चा शुरू होने से पहले ही शिव सेना (ठाकरे गुट) दूसरी बार टूट गई। अब तो समाजवादी पार्टी के टूटने की खबरें आने लगी हैं। क्या इंडिया गठबंधन में शामिल करीब 23 पाॢटयां एक हो सकती हैं? 

    भाजपा से मुकाबले के लिए सभी पाॢटयों के विलय को एक आसान उपाय बताया जा रहा है। इसके उदाहरण के तौर पर 1977 में बनी जनता पार्टी का नाम लिया जा रहा है, जब कई समाजवादी पाॢटयों लोक दल, कांग्रेस से टूटे घटक और जनसंघ पार्टी ने मिल कर जनता पार्टी का गठन किया तथा उत्तर भारत में कांग्रेस एवं इंदिरा गांधी का सफाया कर दिया। 

    क्षेत्रीय अस्मिता का सवाल : आज के दौर में जो पार्टियां राजनीति में सक्रिय हैं, वे 1990 या उसके बाद अस्तित्व में आईं। हिंदी पट्टी की 4-5 बड़ी क्षेत्रीय पार्टियां स्थानीय सामाजिक उभार की प्रतिक्रिया में सामने आईं। इनमें सबसे पहले उत्तर प्रदेश की बहुजन समाज पार्टी आती है। 80 के दशक में दलित उभार के दौर में कांशी राम ने इसकी स्थापना की और मायावती ने शीर्ष तक पहुंचाया। इसके बाद आई समाजवादी पार्टी, जिसने अपेक्षाकृत समृद्ध पिछड़े वर्ग को आवाज दी। बिहार में 90 के दशक में पहले लालू यादव के राष्ट्रीय जनता दल और फिर नीतीश कुमार के जनता दल यूनाइटेड और राम विलास पासवान की लोकतांत्रिक जनता पार्टी का उदय हुआ। 

    इन पार्टियों के उदय में उनके नेताओं, जैसे कांशी राम, मायावती, मुलायम सिंह यादव, लालू यादव, नीतीश कुमार और राम विलास पासवान जैसे नेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के साथ-साथ जातीय गौरव और जातीय पहचान स्थापित करने की इच्छा भी शामिल थी। 60 के दशक में डा. राम मनोहर लोहिया के नेतृत्व में पिछड़ों को 100 में 60, यानी पिछड़ी जातियों के लिए 60 प्रतिशत आरक्षण के समाजवादियों के आंदोलन ने 1990 में पिछड़ों के लिए आरक्षण के कानून ने सिर्फ आरक्षण नहीं, बल्कि जाति केंद्रित दलों का रास्ता भी खोल दिया। दलित और पिछड़ी जातियां एक कदम आगे बढ़ीं लेकिन इन पाॢटयों पर भी परिवारवाद हावी हो गया और वे दलित-पिछड़ा सशक्तिकरण के रास्ते से हटती गईं। बाद में भाजपा की अगुवाई में सवर्ण एक बार फिर सत्ता पर हावी होने लगे।

    कांग्रेस का विभाजन : कांग्रेस में टूट की शुरुआत आजादी के तुरंत बाद से शुरू हो गई। सबसे पहले समाजवादी विचारधारा के जय प्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, संपूर्णानंद और राज नारायण जैसे नेताओं ने कांग्रेस से नाता तोड़ कर सोशलिस्ट पार्टी का गठन करके 1952 के चुनाव में कांग्रेस को टक्कर देने की कोशिश की और नाकाम रहे। 1966 में इंदिरा गांधी के सत्ता में आने के बाद कांग्रेस फिर टूटी। बाद में कांग्रेस से निकल कर ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस और शरद पवार ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का गठन किया। आंध्र में वाई.एस.आर. कांग्रेस भी कांग्रेस के गर्भ से जन्मी पार्टी है।  

    दक्षिण में नव जागरण : तमिलनाडु में जोसेफ विजय के उदय ने पुराने द्रविड़ समीकरण को हिला दिया है लेकिन इसे द्रविड़ राजनीति का अंत मानना एक भूल होगी। लंबे समय के बाद कांग्रेस को भी सरकार में जगह मिली है। विजय की सहानुभूति कांग्रेस से है लेकिन वह कांग्रेस में नहीं जा सकते। इससे तमिल भावना को ठेस पहुंच सकती है। महाराष्ट्र में शिव सेना का जन्म बाल ठाकरे के नेतृत्व में मराठा आंदोलन से हुआ। बाल ठाकरे के बाद इसका नेतृत्व उनके बेटे उद्धव ठाकरे ने संभाला। उद्धव मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे लेकिन उसके बाद 2 बार पार्टी टूट चुकी है। हाल ही में इससे टूटे 6 सांसदों ने पार्टी के कांग्रेस में विलय की आशंका जताई लेकिन कांग्रेस विरोध से उपजी इस पार्टी के कांग्रेस में विलय का रास्ता आसान नहीं लगता।

    एन.डी.ए. बनाम ‘इंडिया’ : ‘इंडिया’ में शामिल 23 पाॢटयों के मुकाबले एन.डी.ए. में 33 पाॢटयां हैं। एन.डी.ए. गठबंधन में तालमेल ज्यादा दिखाई देने का एक बड़ा कारण यह है कि इसमें शामिल जद (यू) और तेलुगू देशम के अलावा सभी पाॢटयां बहुत छोटी हैं। चुनाव में गिनी-चुनी सीटों से उनका काम चल जाता है। तमिलनाडु और पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों में भाजपा ने जूनियर पार्टनर बने रहना स्वीकार कर लिया है। दूसरी तरफ इंडिया गठबंधन में शामिल कई पार्टियों के प्रमुख अपने राज्य की सत्ता के साथ देश का प्रधानमंत्री बनने का सपना भी देखती हैं। राजद बिहार में, समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में तो तृणमूल कांग्रेस बंगाल में फिर सत्ता में लौटने का सपना देख रही है। इसलिए इनका कांग्रेस में विलय संभव नहीं लगता। 

    जो पार्टियां दोनों गठबंधन से दूरी बनाकर चलती हैं उनमें ‘आप’ का कांग्रेस से सीधा संघर्ष पंजाब, दिल्ली और कई अन्य राज्यों में है। ओडिशा में बीजद को किसी की फिक्र नहीं है। माकपा और अन्य वामपंथी पार्टियों का थोड़ा-बहुत असर केरल और बंगाल में बचा है। दोनों राज्यों में उनका मुकाबला कांग्रेस से है। राजद और समाजवादी पार्टी जैसी पिछड़ा आधारित पाॢटयों के कांग्रेस के साथ मिलने से भी उनका वोट बैंक कांग्रेस की तरफ शिफ्ट होना आसान नहीं लगता। जब तक कांग्रेस उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे अपने पुराने गढ़ में मजबूत नहीं होती, तब तक एक मजबूत विपक्षी गठबंधन का बनना भी आसान नहीं।-शैलेश कुमार  

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