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    Home»लेख-आलेख»डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की चिरस्थाई विरासतः संस्थाएं, विचार और राष्ट्र निर्माण
    लेख-आलेख

    डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की चिरस्थाई विरासतः संस्थाएं, विचार और राष्ट्र निर्माण

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inJuly 6, 2026
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    लेखकः गजेंद्र सिंह शेखावत

    इतिहास अक्सर महान नेताओं को उनके राजनीतिक संघर्षों के जरिए याद करता है। लेकिन राजनेताओं के चिरस्मरणीय योगदान राजनीति के दायरे तक ही सीमित नहीं होते। उनकी वास्तविक विरासत उनके द्वारा सृजित संस्थाओं, परिपोषित विचारों और आने वाली पीढि़यों के लिए छोड़े गए आदर्शों में होती है। राष्ट्र भारत केसरी डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी का 125वां जन्म दिवस मना रहा है। इस अवसर पर उनके सार्वजनिक जीवन के एक ऐसे पहलू को स्मरण करना प्रासंगिक होगा जिसकी ओर व्यापक रूप से गौर करने की जरूरत है। यह पहलू है, राष्ट्र निर्माण की बुनियाद के रूप में संस्थाओं का सृजन करने की उनकी आजीवन प्रतिबद्धता।
    स्वतंत्र भारत का उदय सिर्फ एक राजनीतिक संघर्ष से नहीं हुआ। उसे विश्वविद्यालय बनाने थे जो नागरिकों को शिक्षित करने में सक्षम हों। ऐसी अनुसंधान संस्थाएं खड़ी करनी थीं जो वैज्ञानिक ज्ञान का प्रसार कर सकें। उसे ऐसे उद्योग तैयार करने थे जो आर्थिक आत्मनिर्भरता पैदा कर सकें। सभ्यता की विरासत की रक्षा करने वाले सांस्कृतिक संगठनों और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूती देने वाली लोक संस्थाओं को तैयार करना था। डॉ मुखर्जी ने जल्दी ही समझ लिया था कि राष्ट्र का भविष्य सिर्फ दूरद्रष्टा नेतृत्व पर ही निर्भर नहीं करता। यह उन मजबूत संस्थाओं पर भी निर्भर करता है जो नेताओं और सरकारों से ज्यादा टिकाऊ होंगी।
    उनका असाधारण शैक्षिक कॅरियर उनके विश्वास को प्रतिबिंबित करता है। वह कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे कम उम्र के कुलपति बने। उन्होंने वैसे समय में यह कार्यभार संभाला जब उच्चतर शिक्षा भारत के बौद्धिक जागरण का केंद्र बन रही थी। उनके लिए विश्वविद्यालय सिर्फ स्नातक तैयार करने के स्थल नहीं थे। वे वैसे सुविज्ञ नागरिकों को गढ़ने वाले संस्थान थे जो सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदारी के साथ योगदान करने में सक्षम हों। उनकी राय थी कि शिक्षा को राष्ट्र निर्माण के वृहत्तर कार्य से अलग नहीं किया जा सकता।
    विज्ञान और प्रौद्योगिकी प्रगति के प्रति उनका समर्पण विश्वविद्यालयों के परिसर से कहीं आगे बढ़कर था। भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु की कोर्ट और काउंसिल के सदस्य के तौर पर, उन्होंने भारत के प्रमुख वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्रों में से एक को मज़बूत बनाने में योगदान दिया। 1947 में, उन्होंने ‘डिपार्टमेंट ऑफ़ पावर इंजीनियरिंग’ की आधारशिला रखी क्योंकि वे भली-भांति समझते थे कि स्वतंत्र भारत की आर्थिक प्रगति के लिए इंजीनियरिंग की शिक्षा और प्रौद्योगिकी क्षमता बहुत ज़रूरी होगी। नवाचार को मुख्य नीतिगत लक्ष्य बनाए जाने से बहुत पहले ही, उन्होंने यह समझ लिया था कि वैज्ञानिक उत्कृष्टता और औद्योगिक विकास ही देश की दीर्घकालिक मज़बूती तय करेंगे।
    स्वतंत्रता के बाद, जब डॉ. मुखर्जी भारत के पहले उद्योग और आपूर्ति मंत्री बने, तब इस दृष्टिकोण को व्यावहारिक रूप दिया गया। उन शुरुआती सालों में, नए नए आज़ाद देश के सामने एक औद्योगिक आधार तैयार करने की बड़ी चुनौती थी। चित्तरंजन लोकोमोटिव वर्क्स और सिंदरी फर्टिलाइज़र फैक्ट्री जैसे संस्थान सिर्फ़ मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों के तौर पर नहीं, बल्कि तकनीकी क्षमता और आर्थिक आत्मनिर्भरता हासिल करने के भारत के संकल्प के प्रतीक के तौर पर स्थापित किए गए थे। डॉ. मुखर्जी के लिए, औद्योगीकरण कभी भी अपने आप में कोई अंतिम लक्ष्य नहीं था; यह राष्ट्रीय क्षमता और सामूहिक आत्मविश्वास में किया गया एक निवेश था।
    हालाँकि, किसी भी संस्थान के निर्माण के लिए केवल भौतिक अवसंरचना या प्रशासनिक कुशलता की ही ज़रूरत नहीं होती। इसके लिए सहानुभूति, जन-सेवा और नैतिक ज़िम्मेदारी की भावना की भी आवश्यकता होती है। डॉ. मुखर्जी में इन गुणों की झलक 1943 के बंगाल अकाल के दौरान ही साफ़ तौर पर दिखाई दी थी, जब उन्होंने बीसवीं सदी की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी से प्रभावित लोगों के लिए बड़े पैमाने पर राहत कार्य करने में खुद को समर्पित कर दिया था। विभाजन के बाद, उन्होंने विस्थापित लोगों के पुनर्वास के लिए बड़े पैमाने पर काम किया। वे समझते थे कि राष्ट्र के पुनर्निर्माण में संस्थानों को फिर से खड़ा करने के साथ-साथ लोगों के दुख दर्द को कम करना और उस पर मरहम लगाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
    उनका सार्वजनिक जीवन, भारत की सांस्कृतिक विरासत के प्रति गहरी समझ और सम्मान को भी दर्शाता था। ‘महाबोधि सोसाइटी ऑफ़ इंडिया’ के अध्यक्ष के तौर पर, उन्होंने बौद्ध देशों के साथ भारत के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंधों को मज़बूत करने में अहम भूमिका निभाई। सभ्यतागत कूटनीति के स्थायी महत्व को समझते हुए, बुद्ध के मुख्य शिष्यों—अर्हत सारिपुत्र और अर्हत मौद्गल्यायन—के पवित्र अवशेषों का भारत में स्वागत करने में उन्होंने सक्रिय रूप से हिस्सा लिया। आज भी, मंगोलिया जैसे देशों के साथ इन पवित्र अवशेषों को साझा करने की भारत की कोशिशें यह दिखाती हैं कि किस तरह सांस्कृतिक विरासत अंतरराष्ट्रीय सद्भावना को मज़बूत करती है और ऐतिहासिक संबंधों को और गहरा बनाती है।
    साहित्य और विद्वता के प्रति भी उनकी चिंता उतनी ही स्पष्ट थी। उनके पत्रों से पता चलता है कि उन्होंने प्रसिद्ध कवि काज़ी नज़रुल इस्लाम की उनके व्यक्तिगत संकट के समय किस तरह मदद की थी। ऐसी घटनाएँ हमें याद दिलाती हैं कि सार्वजनिक नेतृत्व को केवल बड़े नीतिगत फैसलों से ही नहीं, बल्कि उदारता के उन शांत और मौन कार्यों से भी आंका जाता है, जिन पर शायद ही कभी लोगों का ध्यान जाता है।
    डॉ. मुखर्जी ने संस्थागत निर्माण के इसी दृष्टिकोण को संविधान सभा में भी आगे बढ़ाया। संविधान के निर्माण को “एक बड़ी जिम्मेदारी” और “एक गंभीर और पवित्र विश्वास” के रूप में वर्णित करते हुए, उन्होंने संवैधानिक शासन के साथ जुड़ी नैतिक ज़िम्मेदारियों पर ज़ोर दिया। उनके वे शब्द आज भी बेहद प्रासंगिक हैं। संविधान की ताकत अंततः न केवल उसके लिखित प्रावधानों पर, बल्कि संसद की शुचिता, सार्वजनिक संस्थानों की स्वतंत्रता, कानून के शासन और नागरिकों की जिम्मेदारी पर भी निर्भर करती है। संवैधानिक लोकतंत्र तभी फलता-फूलता है जब संस्थाओं पर जनता का भरोसा हो और वे ईमानदारी से काम करें।
    जैसे-जैसे भारत एक विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य की ओर अग्रसर हो रहा है, डॉ. मुखर्जी की सोच हमें एक ज़रूरी बात याद दिलाती है। सिर्फ़ आर्थिक विकास से ही देश की तरक्की तय नहीं होती। संवहनीय विकास के लिए शिक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान, तकनीकी नवाचार, सांस्कृतिक संरक्षण और लोगों का भरोसा जगाने वाले संस्थानों में लगातार निवेश की ज़रूरत होती है।
    सड़कें, हवाई अड्डे और कारखाने बेहद जरूरी हैं, लेकिन उतने ही जरूरी वे विश्वविद्यालय भी हैं जो जिज्ञासा को प्रोत्साहित करते हैं, वे प्रयोगशालाएँ जो ज्ञान का विस्तार करती हैं, वे संग्रहालय जो विरासत को संजोते हैं और वे सार्वजनिक संस्थान जो संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करते हैं, वे भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
    संस्थाओं में एक अद्भुत गुण होता है: वे सरकारों, राजनीतिक आंदोलनों और यहाँ तक कि कई पीढ़ियों से भी ज़्यादा समय तक बनी रहती हैं। वे संचित ज्ञान को संजोकर रखती हैं, बदलाव के बीच निरंतरता बनाए रखती हैं और समाज को दीर्घकालिक राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने में सक्षम बनाती हैं। नेता इतिहास को आकार दे सकते हैं, लेकिन संस्थाएं सभ्यता को जीवित रखती हैं।
    डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सार्वजनिक जीवन का सबसे अहम सबक यही है। उनकी विरासत केवल उन पदों तक सीमित नहीं है जो उन्होंने संभाले या उन बहसों में भी नहीं है जिनमें उन्होंने हिस्सा लिया, बल्कि यह उनके उस अटूट विश्वास में निहित है कि मजबूत संस्थान ही किसी राष्ट्र की आकांक्षाओं के सच्चे संरक्षक होते हैं।
    जैसे-जैसे भारत अपनी विकास यात्रा पर आगे बढ़ रहा है, ज्ञान, वैज्ञानिक चेतना, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और संवैधानिक मूल्यों को बढ़ावा देने वाले संस्थानों को मजबूत करना ही उनके प्रति सबसे सार्थक श्रद्धांजलि होगी।

    लेखक केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री हैं।

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