बच्चों को अपने प्रति संवेदनहीन बनाने में मां-बाप का भी कुछ कसूर है। सोचें कि यदि आप अपने बच्चों को बोझ की तरह पालेंगे तो बच्चों से क्या उम्मीद करते हैं कि वे आपकी सेवा करेंगे? कदापि नहीं। संस्कार और प्यार तो दूर की बात है, स्त्री और पुरुष जब दोनों घर से बाहर धन कमाने को जाते हैं, तो उनके बच्चे पीछे कैसी कैसी यातनाएं सहते हैं, ऐसी परिस्थितियों का उनके मस्तिष्क में अपने माता-पिता के प्रति कड़वाहट उत्पन्न करना स्वाभाविक है। क्या यह सच नहीं है? क्या हमारे बच्चे समझते हैं कि कल हम भी बुजुर्ग होंगे और इसी दौर से गुजरेंगे। क्या हम सहमत हैं कि जो बच्चे अपने बुजुर्ग मां-बाप के नहीं हो सकते हैं, तो किसी के भी नहीं हो सकते…
बुजुर्गों, खास तौर पर मां-बाप के प्रति संवेदनहीनता की एक घटना सोशल मीडिया पर काफी चर्चा में है और लोग इसे बच्चों और मां-बाप के रिश्तों में आती कड़वाहट और आधुनिक समाज की संवेदनहीनता के उदाहरण के रूप में देख रहे हैं। यह मामला हरियाणा के सोनीपत में स्थित एक वृद्धाश्रम से जुड़ा है जहां शिवचरण गुप्ता नाम के एक बुजुर्ग की मृत्यु के बाद उनकी बेटियों ने आने के बजाय 5100 रुपए ऑनलाइन ट्रांसफर कर वीडियो कॉल पर अंतिम संस्कार देखने को कहा। कारोबार में करोड़ो के घाटे के बाद, शिवचरण गुप्ता करीब डेढ़ साल से अपनी पत्नी के साथ सोनीपत के एक वृद्धाश्रम में रह रहे थे। बुजुर्ग की तीन बेटियां हैं। पिता के निधन के बाद जब वृद्धाश्रम संचालकों ने उनसे संपर्क किया, तो वे अंतिम विदाई के लिए खुद नहीं आईं। इस असंवेदनशील व्यवहार से आहत होकर वृद्धाश्रम प्रबंधन ने बेटियों द्वारा भेजे गए 5100 रुपए को वापस लौटा दिया और खुद अपने खर्च पर बुजुर्ग का सम्मानजनक अंतिम संस्कार संपन्न कराया। आखिर समाज में ऐसा क्यों हो रहा है? यह एक कड़वा सामाजिक सच है कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में कुछ लोग वृद्ध माता-पिता को बोझ मानने लगे हैं, लेकिन नैतिक, मानवीय और सांस्कृतिक रूप से यह पूरी तरह गलत है।
आज की युवा पीढ़ी पर अपने बच्चों और करियर का इतना दबाव होता है कि वे बुजुर्गों को समय नहीं दे पाते। कई बार बच्चों में नैतिक मूल्यों और बड़ों के प्रति आदर की कमी हो जाती है। मां-बाप ने बिना किसी स्वार्थ के हमें चलना, बोलना और जीना सिखाया है। जब माता-पिता को सबसे ज्यादा प्यार और सहारे की जरूरत होती है, तब उनका साथ देना हर संतान का पहला धर्म होना चाहिए। माता-पिता बोझ नहीं, बल्कि घर की छांव और अनुभव की पूंजी होते हैं। जब बच्चे अपने माता-पिता को बोझ समझने लगते हैं, तो यह उस रिश्ते की पवित्रता पर एक गहरा आघात है। बढ़ता एकल परिवार, महिलाओं द्वारा धन अर्जन में प्रत्यक्ष भागीदारी, अच्छे संस्कारों का अभाव, बुजुर्गों द्वारा अपने जीवनकाल में अपने स्वास्थ से अधिक दूसरे कार्यों को महत्व देना, बुजुर्गों द्वारा अपने यौवनकाल में अपने बुजुर्गों की खुशी से समुचित देखभाल न करना, भौतिक उपलब्धियों को ही एकमात्र जीवन में सफलता समझना, दोहरे मापदंड, हर क्षेत्र में सफलता पाने के लिए अत्यधिक प्रतियोगिता होना, असंतुष्ट मानव स्वभाव हमारी संस्कृति पर आघात है। आज के बच्चे तर्क देते हुए कहते हैं कि घर चलाने के लिए धन कमाने के काम में लंबा समय व्यतीत करने के बाद इतनी ऊर्जा नहीं रहती कि घर की दूसरी जिम्मेदारियों को भी खुशी से पूरा किया जाए। माता-पिता हर मुश्किल के बीच अपनी संतान को बहुत प्यार से पालते हैं, जबकि आज की संतान ऐसा खुशी से नहीं कर पाती। इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि 21वीं सदी में सामाजिक रिश्ते काफी दबाव से गुजर रहे हैं। लेकिन निराशाजनक बात यह है कि माता-पिता और बच्चे का पवित्र रिश्ता उथल-पुथल का शिकार हो गया है और आज कई बच्चे अपने बूढ़े माता-पिता को बोझ समझते हैं। बच्चों के लिए उनके माता-पिता आर्थिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से बोझ बन जाते हैं। आज के बच्चे बेहद कैरियर उन्मुख लोग हैं। वे अपने कार्यालयों में या क्लबों और सामाजिक समारोहों के माध्यम से व्यावसायिक संबंध बनाए रखने में बहुत समय बिताते हैं। बाजार में मौजूद गलाकाट प्रतिस्पर्धा को देखते हुए आज की कार्य संस्कृति अत्यधिक मांग वाली है। यह तनाव उन्हें अपने जीवनसाथी या बच्चों पर ध्यान केंद्रित करने नहीं देता। अपने माता-पिता की बढ़ती उम्र की समस्याओं के कारण, बच्चे अपने कंधों पर अतिरिक्त जिम्मेदारियां महसूस करते हैं।
इस पीढ़ी के बच्चों के साथ एक और बड़ी समस्या यह भी है कि वे अपनी सफलता को बढ़ावा देते हैं और खुद को अपनी स्थिति का निर्माता मानते हैं। वे यह महसूस करना भूल जाते हैं कि उनकी सफलता में उनके माता-पिता सबसे बड़े हितधारक रहे हैं। बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा मिले और वे अपने करियर में एक कदम आगे बढक़र अच्छे मुकाम हासिल करें। यह सफलता कभी-कभी उनके सिर चढ़ जाती है और उनके जमीनी और विनम्र स्वभाव को भ्रष्ट कर देती है। उनमें अहंकारी और घमंडी चरित्र विकसित हो जाता है, जिसमें अपने माता-पिता को समर्थन देने की विनम्रता का अभाव होता है। पीढ़ी अंतराल, यानी जेनरेशन गैप के उभरते मुद्दे ने वृद्ध माता-पिता को छोड़ दिए जाने की समस्या में भी योगदान दिया है। अधिकतर लोग अपने स्वभाव से अधिक व्यक्तिवादी होते जा रहे हैं। ऐसी परिस्थितियों में, युवा पीढ़ी अपने माता-पिता और दादा-दादी, नाना-नानी के पारंपरिक विचारों को सुनने और समझने में कम रुचि रखती है। उन्हें बुजुर्गों की बातें प्रासंगिक नहीं लगती हैं। भारत की संस्कृति और परंपरा ने माता-पिता और बच्चों के रिश्ते के प्रति सम्मान और अखंडता को बनाए रखा है। हमारी संस्कृति में बच्चों के लिए माता-पिता ईश्वर के तुल्य होते हैं, जो हमारे कठिन और कोमल वर्षों में हमारा समर्थन और सहायता करते हैं। समय बीतने के साथ आधुनिकीकरण ने भारत के अधिकांश परिवारों में इस मजबूत सांस्कृतिक ताने-बाने को तोड़ दिया है। बच्चों को अपने प्रति संवेदनहीन बनाने में मां-बाप का भी कुछ कसूर है।
सोचें कि यदि आप अपने बच्चों को बोझ की तरह पालेंगे तो बच्चों से क्या उम्मीद करते हैं कि वे आपकी सेवा करेंगे? कदापि नहीं। संस्कार और प्यार तो दूर की बात है, स्त्री और पुरुष जब दोनों घर से बाहर धन कमाने को जाते हैं, तो उनके बच्चे पीछे कैसी कैसी यातनाएं सहते हैं, ऐसी परिस्थितियों का उनके मस्तिष्क में अपने माता-पिता के प्रति कड़वाहट उत्पन्न करना स्वाभाविक है। क्या यह सच नहीं है? क्या हमारे बच्चे समझते हैं कि कल हम भी बुजुर्ग होंगे और इसी दौर से गुजरेंगे। क्या हम सहमत हैं कि जो बच्चे अपने बुजुर्ग मां-बाप के नहीं हो सकते हैं, तो किसी के भी नहीं हो सकते। यदि मां-बाप से अनजाने में गलतियां हो जाती हैं, लेकिन वह कभी अब आपके खिलाफ सोच नहीं रख सकते। हमारे शिक्षा संस्थानों में छात्रों को सिखाया ही नहीं जाता कि बड़े होकर आपको बुजुर्ग मां-बाप के साथ संवेदनशीलता दिखानी है। यह हमारी शिक्षण व्यवस्था की एक बड़ी विफलता है। छात्रों को सिर्फ और सिर्फ पैसा कमाने के लिए तैयार करना शिक्षा का केंद्र बिंदु नहीं होना चाहिए। बच्चों के लिए कहना होगा कि मॉडर्न आधुनिक शिक्षा जरूर ग्रहण करिए, जीवन में उन्नति हासिल करिए, विकास करिए, लेकिन उम्रदराज बुजुर्ग माता-पिता के लिए वक्त जरूर निकालिए, उनका आशीर्वाद आपको आगे ही बढ़ाएगा, नीचे नहीं। मां-बाप जिन्होंने अपना पूरा जीवन बच्चों को पालने में लगा दिया, वे कभी भी संतान के लिए बोझ नहीं हो सकते।-डा. वरिंद्र भाटिया

