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    Home»संपादकीय»युद्धों से भडक़ती महंगाई
    संपादकीय

    युद्धों से भडक़ती महंगाई

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inSeptember 16, 2026
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    अगस्त माह, 2026, में खुदरा मुद्रास्फीति 4.82 फीसदी रही, जबकि थोक मूल्य सूचकांक 9.9 फीसदी दर्ज किया गया। खाद्य महंगाई की यह स्थिति आठ माह में सर्वोच्च स्तर पर रही। भारतीय रिजर्व बैंक की तय सीमा से भी अधिक मुद्रास्फीति है। त्योहारों के मौसम में महंगाई और भी बढ़ सकती है। आम आदमी दर और प्रतिशत के इस अर्थशास्त्र को नहीं समझता। उसके लिए आटा, गेहूं, चावल, चीनी, दालें, खाद्य तेल, हरी सब्जियां, प्याज, टमाटर, अदरक, लहसुन और दूध आदि की कीमतें बढ़ती हैं, तो वह महंगाई की स्थिति है। उसकी जेब सीमित है, लिहाजा घर का बजट भी तय है। जब ये हदें टूटने लगती हैं, तो आम आदमी महंगाई से कराहने लगता है। एक वह महंगाई भी है, जो युद्ध हमें देते हैं और हम मजबूर हैं। बीते छह माह से अधिक समय से ईरान का होर्मुज जलडमरूमध्य या तो बाधित है अथवा बंद है या मिसाइल, ड्रोन के हमले जारी हैं। भारत का 50 फीसदी से अधिक कच्चा तेल, एलपीजी, खाद आदि इसी समुद्री मार्ग से आते रहे हैं। दुनिया में करीब 20 फीसदी तेल-गैस की आपूर्ति इसी मार्ग के जरिए की जाती रही है। अब लाल सागर और बाब-अल-मंदेब पर हूती लड़ाकों ने कब्जा कर लिया है। हालांकि उन्होंने ऐलान किया है कि वे सऊदी अरब के जहाजों को निशाना बनाएंगे। यहां से गुजरने नहीं देंगे। भारत समेत शेष विश्व के जहाज, तेल-टैंकर आदि की आवाजाही निर्बाध रहेगी। दुनिया की करीब 12 फीसदी आपूर्ति इस जल-मार्ग के जरिए होती रही है। सऊदी अरब जिस ‘ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन’ के जरिए यूरोप और एशिया में कच्चे तेल का निर्यात कर रहा था, इस पर हूती लड़ाकों ने मिसाइल हमले कर उसका एक हिस्सा तबाह कर दिया है। सोमवार, 14 सितंबर, की रात तक पाइपलाइन धू-धू कर जल रही थी, लिहाजा उसे बंद करना पड़ा है। इस पेट्रोलाइन से 40-50 लाख बैरल कच्चा तेल रोजाना सप्लाई किया जाता था।

    जाहिर है कि भारत सहित कई एशियाई और यूरोपीय देशों की तेल आपूर्ति प्रभावित हुई है। कच्चे तेल का एक और निश्चित रास्ता ठप हो गया है। चूंकि महत्वपूर्ण जल-मार्गों से आपूर्ति बाधित या ठप है, नतीजतन कच्चे तेल की कीमत भी 108 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गई है। बीती 11 सितंबर को भारत के लिए कच्चे तेल की औसत कीमत 119 डॉलर से अधिक थी। इस क्षेत्र के विशेषज्ञों के आकलन हैं कि कच्चा तेल जल्द ही 121 डॉलर प्रति बैरल को छू लेगा। यदि सभी मोर्चों पर युद्ध जारी रहे, तो कच्चा तेल 150 डॉलर तक उछल सकता है। दुनिया की अर्थव्यवस्था का कबाड़ा निकल जाएगा! भारत 2.4 लाख मीट्रिक टन तेल का आयात करता है, लिहाजा उसका बिल 19 लाख करोड़ रुपए तक जा सकता है। यह बीते साल के आयात बिल से 8 लाख करोड़ रुपए अधिक होगा। अर्थव्यवस्था पर यह अनावश्यक बोझ समझना चाहिए, नतीजतन रोजमर्रा की हरेक वस्तुएं, सेवाएं, परिवहन आदि सभी महंगे हो जाएंगे। तेल कंपनियों के घाटे का रुदन तो शुरू हो चुका है। बताया जा रहा है कि भारत की तेल कंपनियों को पेट्रोल पर 5 रुपए, डीजल पर 23 रुपए प्रति लीटर और एलपीजी के एक सिलेंडर पर 200 रुपए का घाटा उठाना पड़ रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, ईरान में युद्धविराम (17 अगस्त, 2026) के खत्म होने के बाद 100 देशों में पेट्रोल-डीजल औसतन 5-7 फीसदी तक महंगे हो गए हैं। कच्चा तेल 17-20 फीसदी तक और एलपीजी, एलएनजी 20-25 फीसदी तक महंगी हुई हैं। भारत क्या कर सकता है? उसे 88 फीसदी कच्चा तेल आयात करना पड़ता है। अमरीका तो तेल-गैस का निर्यातक देश है, फिर भी वहां पेट्रोल-डीजल के दाम ऐसे स्तर पर पहुंच गए हैं कि जनता सडक़ों पर आंदोलित हो गई है। बहरहाल भारत के संदर्भ में यदि तेल-गैस, उर्वरक आदि के संकट घनीभूत होते रहे और महंगाई भडक़ती रही, तो हमारी मुद्रा ‘रुपए’ का अवमूल्यन भी चिंता के स्तर पर पहुंच सकता है। आश्चर्य है कि भारत सरकार मुद्रास्फीति और ऊर्जा-संकट पर बिल्कुल मौन है, मानो आम भारतीय ‘मौज’ में है! जीडीपी की विकास दर पर देश को भ्रमित भी नहीं करना चाहिए, क्योंकि इस विकास में मुद्रास्फीति भी निहित है। यदि उसे घटा दिया जाए, तो विकास दर 2.5 फीसदी के आसपास होगी। क्या यही हमारा यथार्थ है? महंगाई के कारण गरीबों का जीना कठिन हो रहा है। इससे मध्यम वर्ग भी प्रभावित हो रहा है। सरकार का कहना है कि उसने कई करोड़ लोगों को गरीबी रेखा से ऊपर उठाया है। यानी गरीबी अब कम हो गई है। लेकिन धरातल पर यह सत्य भी है कि कई करोड़ लोगों को सस्ता अनाज उपलब्ध करवा कर उनका पोषण किया जा रहा है। इसे हम विकास नहीं मान सकते। विकास के लिए समूह नागरिकों का आत्मनिर्भर होना जरूरी है। जब कई करोड़ हाथ कमाने लग जाएंगे, तो ही वास्तव में विकास दिखेगा। केवल भोजन की कमी को दूर कर देनेे और सस्ता राशन बांट कर गरीबी रेखा से बाहर नहीं निकला जा सकता।

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