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    Home»संपादकीय»भागवत को ‘रावण’ का डर!
    संपादकीय

    भागवत को ‘रावण’ का डर!

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inOctober 22, 2026
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    ‘विजयादशमी’ पर्व पर रावण, मेघनाद, कुंभकर्ण के पुतले इस बार भी जलाए गए। खुशफहमी पाल ली गई कि यह अधर्म पर धर्म, बुराई पर अच्छाई, असत्य पर सत्य, अहंकार पर मर्यादा की जीत है, लेकिन रावण तो हर साल जिंदा हो उठता है। आज भी जिंदा, हमारे बीच है। क्या रावण अजेय, अमर है? उसका दहन नहीं किया जा सकता! दुनिया भर में अशांति, उपद्रव, दंगे, युद्ध, मारकाट, आगजनी और अंतत: विध्वंस का ‘रावण’ वाकई जिंदा है! जिस यूरोप को अपनी सभ्यता, संस्कृति, सम्पन्नता पर गुरूर होता था, आज उसी के देशों-फ्रांस, अल्बानिया, स्पेन, इटली, बेल्जियम-में जंग और लूटपाट के हालात हैं। अल्बानिया में सुप्रीम कोर्ट को ही आग की लपटों के हवाले कर दिया गया। वे दंगई, हिंसाई ‘रावण’ नहीं, तो कौन हैं? बेशक आरोप थे कि कोर्ट कथित भ्रष्ट प्रधानमंत्री की मदद कर रही थी। बेशक यह ‘रावणत्व’ भारत के लिए भी चेतावनी है, लेकिन हमारी सर्वोच्च अदालत पर ऐसा कोई धब्बा नहीं है। हालांकि सात दशकों के स्वतंत्र भारत में मजदूरों, किसानों, शिक्षकों, आदिवासियों आदि ने अनगिनत आंदोलन किए हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ, ‘नर्मदा बचाओ’ पर, जल-संकट को लेकर भी आंदोलन किए गए हैं। लोकतंत्र में आंदोलन अनिवार्य और अपरिहार्य हैं, लेकिन आज तक किसी स्थानीय, जिला अदालत को भी आग के हवाले करने का ‘रावणत्व’ सामने नहीं आया है। सरसंघचालक मोहन भागवत ने ‘दशहरा’ पर अपने परंपरागत उद्बोधन में इसी ‘रावण’ का मुद्दा उठाया है और साफ कहा है कि आसुरी ताकतें भारत का भी विखंडन चाहती हैं। भारतीयता को नष्ट करने की कोशिशें भी जारी हैं। दरअसल वे ताकतें भारत का प्रभुत्व, विकास, उभार देखना ही नहीं चाहतीं। कौन हैं वे आसुरी ताकतें? न तो सरसंघचालक ने नामों का खुलासा किया है और न ही सरकार बताना चाहती है। सरकार और उसके पैरोकार ‘भेडिय़ा आया’ ही चिल्लाते रहते हैं। क्या भागवत भी ‘रावणत्व’ से डरते हैं? आखिर कौन हैं वे ‘रावणत्व’ वाली ताकतें, जो भारत को तोडऩे में जुटी हैं? सरसंघचालक भागवत ने यह भरोसा जरूर जताया है और विश्व को साफ संदेश दिया है कि भारत को कभी भी फ्रांस, अल्बानिया, इटली अथवा नेपाल, बांग्लादेश नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि भारत हमारी आत्मा में बसा है।

    भारत में व्यापक विविधता है, फिर भी राष्ट्र के तौर पर एकता, अखंडता है। यह एकजुटता निस्वार्थ है, लेकिन देश में संजय राउत सरीखे ‘रावण’ भी हैं। उन्होंने अल्बानिया की जलती सुप्रीम कोर्ट का संदर्भ साझा किया और कहा कि खासकर भारत को सबक सीखना चाहिए। क्या उद्धव ठाकरे की शिवसेना का यह राज्यसभा सांसद हमारी सर्वोच्च अदालत और उसके जरिए भारत की मोदी सरकार को धमकी दे रहा है? वैसे संजय राउत एक कुंठित, बेलगाम, दुराग्रही नेता हैं, लिहाजा उनके बयान का जिक्र ही काफी है। बहरहाल भारत और यूरोपीय देशों की तुलना नहीं की जा सकती। पूरे यूरोप की आबादी करीब 74.35 करोड़ है। अल्बानिया मात्र 27.5 लाख की आबादी का छोटा-सा, बौना देश है। फ्रांस हमारे उप्र का एक चौथाई देश है। अलबत्ता वहां औसतन 27 लाख रुपए प्रति छात्र की शिक्षा पर सरकार खर्च करती है, जबकि भारत में यह औसत 27,000 रुपए भी नहीं है। यदि फिर भी फ्रांस धधक, लुट रहा है, हिंसाग्रस्त है, तो उसके राजनीतिक कारण भी संभव हैं। यूरोपीय देशों में शरणार्थियों की समस्या अत्यंत भीषण, हिंसक है। आस्तीन में सांप उन्होंने ही पाले थे। हालांकि भारत में भी स्कूल और शिक्षा व्यवस्थाओं की बदहाली है, बेरोजगारी, महंगाई, गरीबी और आर्थिक असमानताएं हैं। उन्हें लेकर आंदोलन भी किए जाते रहे हैं, लेकिन भारत कभी भी ‘रावण’ नहीं बना, क्योंकि औसत भारतीय के संस्कार और सोच देश-विरोधी नहीं हैं। बहरहाल संघ-प्रमुख ने जो मुद्दे उठाए हैं, उनके जो कथन हैं, वे इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वह मोदी सरकार के भी संरक्षक हैं।

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