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    Home»लेख-आलेख»अर्थव्यवस्था का एक नया नजरिया: भारत के जीडीपी के आधार में संशोधन को समझना-श्री सौरभ गर्ग
    लेख-आलेख

    अर्थव्यवस्था का एक नया नजरिया: भारत के जीडीपी के आधार में संशोधन को समझना-श्री सौरभ गर्ग

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inFebruary 26, 2026
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    आर्टिकल- सकल घरेलू उत्पाद या जीडीपी किसी देश की अर्थव्यवस्था के आकार और उसकी सेहत को आंकने का एक तरीका है। यह एक राष्ट्र का वह रिपोर्ट कार्ड है, जो हमें बताता है कि वह देश वस्तुओं और सेवाओं के लिहाज से कितना उत्पादन कर रहा है। जब जीडीपी बढ़ रही होती है, तो आमतौर पर इसका मतलब होता है कि कारोबार जगत वस्तुओं एवं सेवाओं का अधिक उत्पादन कर रहा है, अधिक संख्या में लोगों को रोजगार मिल रहा है और आय बढ़ रही है। वैश्विक स्तर पर भी जीडीपी का बेहद महत्व होता है। वर्तमान में भारत विश्व की शीर्ष पांच अर्थव्यवस्थाओं में शुमार है और अनुमान है कि 2030 तक यह तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगी।
    अर्थव्यवस्था को मापने के एक साधन के रूप में, जीडीपी को अर्थव्यवस्था की सही नब्ज को पहचानने के उद्देश्य से नियमित रूप से संशोधित करते रहने की जरूरत होती है। इस काम को बदलती अर्थव्यवस्था के साथ तालमेल बनाए रखने के इरादे से जीडीपी के आधार वर्ष को नियमित अंतराल पर अद्यतन करके पूरा किया जाता है। जैसे- जैसे अर्थव्यवस्था के स्वरूप बदलता जाता है और नए उद्योग उभरते हैं, उपभोग के पैटर्न बदलते हैं तथा आंकड़ों के नए स्रोत विकसित होते हैं, इन संशोधनों से आधिकारिक आंकड़ों को असली हकीकतों के अनुरूप ढालने में मदद मिलती है और अनुमान अधिक सटीक व ठोस बन जाते हैं।
    आधार में पिछले संशोधन के बाद से आंकड़ों के नए स्रोतों की उपलब्धता ने हमें जीडीपी में अलग-अलग सेक्टरों और अलग-अलग क्षेत्रों के योगदानों को अधिक स्पष्ट रूप से देखने और बेहतर तरीकों को अपनाने में मदद की है। उदाहरण के लिए, अनौपचारिक क्षेत्र को भी व्यापक रूप से कवर करने वाले गैर-निगमित क्षेत्र द्वारा मूल्य वर्धन का अनुमान लगाने में संदर्भ में।
    जीडीपी के आधार में पिछले संशोधन के बाद से, कंपनियों के प्रबंधन एवं प्रशासन संबंधी आंकड़े (एमजीटी-7/7ए) जैसे कुछ नए किस्म के आंकड़े उपलब्ध हुए हैं। ये आंकड़े कंपनियों द्वारा की जाने वाली व्यावसायिक गतिविधियों की संख्या, एनआईसी 2008 के अनुसार व्यावसायिक गतिविधि के विवरण और प्रत्येक वर्ष प्रत्येक व्यावसायिक गतिविधि (उद्योग) से प्राप्त प्रतिशत कारोबार (टर्नओवर) की जानकारी प्रदान करते हैं। इसलिए, आधार का पुनर्निर्धारण करते समय बहु-गतिविधियों वाले उद्यमों के लिए मूल्यवर्धन को अब पहले की तरह पूरी तरह से मुख्य गतिविधि को आवंटित करने के बजाय नए उपलब्ध एमजीटी-7 के आंकड़ों के आधार पर विभिन्न गतिविधियों में आवंटित किया जाता है। इस बदलाव से हमें अलग-अलग सेक्टरों के योगदानों को अधिक सटीक रूप से समझने में मदद मिलती है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रत्येक व्यावसायिक गतिविधि अर्थव्यवस्था को किस प्रकार संचालित कर रही है।
    जिस प्रकार कंपनी स्तर के नए आंकड़े हमें अलग-अलग सेक्टरों के योगदानों को अधिक सटीक रूप से मापने में मदद करते हैं, ठीक वैसे ही नई श्रृंखला में जीएसटी आंकड़ों के बेहतर उपयोग से अन्य बातों के अलावा, निजी कॉरपोरेट सेक्टर से संबंधित क्षेत्रीय आवंटन में सुधार और राज्य स्तर पर व्यय-पक्ष के अनुमानों के बेहतर संकलन के जरिए जीडीपी में क्षेत्रीय योगदानों का अधिक सटीक और सूक्ष्म दृष्टिकोण हासिल होता है।
    एएसयूएसई और पीएलएफएस जैसे सर्वेक्षणों से हासिल वार्षिक आंकड़ों की उपलब्धता, जिसकी सुविधा पहले नहीं थी, ने हमें गैर-निगमित क्षेत्र द्वारा वार्षिक रूप से मूल्यवर्धन का अनुमान लगाने की एक बेहतर पद्धति अपनाने में समर्थ बनाया है। पहले हम अन्य संकेतकों से अप्रत्यक्ष रूप से जीडीपी में इसके योगदान का अनुमान लगाते थे। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि लाखों घरेलू व्यवसायों, छोटी दुकानों और स्वरोजगार श्रमिकों से मिलकर बना यह सेक्टर अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा है और रोजगार एवं आजीविका में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
    जीडीपी के आधार में संशोधन महज आंकड़ों के नए स्रोतों के उपयोग से कहीं आगे की बात है। यह कार्यप्रणाली में सुधार से भी जुड़ा है और इस संदर्भ में, जीडीपी की नई श्रृंखला में कई कार्यप्रणालीगत सुधार देखे गए हैं।
    पहले, कीमतों में बदलाव के अनुसार जीडीपी को समायोजित करने की दोहरी अपस्फीति (डबल डिफ्लेशन) विस्तृत विधि सिर्फ कृषि क्षेत्र में ही लागू होती थी। वर्ष 2022-23 की नई श्रृंखला में दोहरी अपस्फीति विधि का विस्तार करके इसे मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र तक ले आया गया है, जहां अब पर्याप्त आंकड़े उपलब्ध हैं और अन्य सभी क्षेत्रों में एकल बहिर्वेशन (सिंगल एक्सट्रपलेशन)/ मात्रात्मक बहिर्वेशन (वॉल्यूम एक्सट्रपलेशन) विधि का उपयोग किया जाता है। यह दृष्टिकोण उपलब्ध आंकड़ों का सर्वोत्तम उपयोग करता है, जिससे अनुमान सटीक और विश्वसनीय बने रहते हैं। दोहरी अपस्फीति में बहुत अधिक आंकड़ों की आवश्यकता होती है, क्योंकि इसके लिए आउटपुट और इनपुट दोनों की कीमतों पर विस्तृत जानकारी की जरूरत होती है। जैसे-जैसे समय के साथ यह आंकड़ा और अधिक उपलब्ध होता जाएगा, हम इसके उपयोग का विस्तार और अधिक क्षेत्रों में कर सकेंगे।
    कार्यप्रणाली की दृष्टि से एक उल्लेखनीय सुधार यह है कि अर्थव्यवस्था के अनुमानों को उत्पादित वस्तुओं (उत्पादन पक्ष) और लोगों एवं कारोबार जगत द्वारा किए गए व्यय (खर्च पक्ष) के आधार पर ढाला गया है। ये दोनों पक्ष अक्सर पूरी तरह से मेल नहीं खाते, जो कि दुनिया के तमाम देशों में और खासकर तिमाही जीडीपी के मामले में, एक आम समस्या है। इस समस्या को दूर करने के उद्देश्य से नई श्रृंखला में ‘आपूर्ति एवं उपयोग सारणी’ के ढांचे का उपयोग किया जा रहा है ताकि प्रारंभिक अनुमानों में विसंगतियों को सीमित किया जा सके और अंतिम अनुमानों के समय पूरे आंकड़े उपलब्ध होने पर उन्हें पूरी तरह से दूर किया जा सके।
    जीडीपी के आंकड़ों को अद्यतन करना अर्थव्यवस्था को और भी स्पष्ट नजरिए से देखने जैसा है। हर आर्थिक गतिविधि, चाहे छोटी हो या बड़ी, स्पष्ट रूप से सामने आती है और राष्ट्र के विकास में उसके योगदान का सटीक तरीके से उजागर होता है। बेहतर आंकड़ों का उपयोग करके, विधियों को परिष्कृत करके और अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों के अनुरूप ढलकर, मंत्रालय ने अर्थव्यवस्था को और भी स्पष्ट रूप से पेश किया है। नागरिकों के लिए इसका मतलब यह है कि अब नीतियां एवं सार्वजनिक सेवाएं अर्थव्यवस्था की कार्यप्रणाली की सटीक समझ पर आधारित हैं, जिससे विकास का असर सिर्फ कागजों पर ही नहीं बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी में भी महसूस हो रहा है।

    (लेखक सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के सचिव हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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