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    Home»लेख-आलेख»आखिर पहले की सरकारों ने नेताजी के पराक्रम को क्यों छिपाया?…
    लेख-आलेख

    आखिर पहले की सरकारों ने नेताजी के पराक्रम को क्यों छिपाया?…

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inJanuary 24, 2026
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    पराक्रम दिवस केवल एक स्मृति दिवस नहीं, बल्कि भारत की उस चेतना का उत्सव है जिसने गुलामी को स्वीकार करने से इंकार कर दिया था। यह दिन उस विचार का प्रतीक है कि स्वतंत्रता भीख में नहीं मिलती, उसे संघर्ष से प्राप्त किया जाता है।

    नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम भारतीय इतिहास में केवल एक महान स्वतंत्रता सेनानी के रूप में दर्ज नहीं है, बल्कि वह शौर्य, साहस और राष्ट्र के लिए सर्वस्व अर्पण करने की जीवंत चेतना हैं। गुलामी के कालखंड में जब पूरा देश भय, समझौते और याचना की राजनीति में उलझा था, तब नेताजी ने पराधीनता की जंजीरों को तोड़ने के लिए सशस्त्र संघर्ष का मार्ग चुना था। उनका जीवन स्वयं में पराक्रम की परिभाषा था। इसी पराक्रम, इसी अदम्य साहस और इसी ज्वलंत राष्ट्रभक्ति को स्मरण करने के लिए उनकी जयंती को पराक्रम दिवस के रूप में मनाया जाता है।

    पराक्रम दिवस केवल एक स्मृति दिवस नहीं, बल्कि भारत की उस चेतना का उत्सव है जिसने गुलामी को स्वीकार करने से इंकार कर दिया था। यह दिन उस विचार का प्रतीक है कि स्वतंत्रता भीख में नहीं मिलती, उसे संघर्ष से प्राप्त किया जाता है। नेताजी ने आजाद हिंद फौज का गठन कर यह सिद्ध कर दिया था कि भारतीय अपने बलबूते साम्राज्यवादी ताकतों को चुनौती दे सकते हैं। उनका उद्घोष तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा केवल शब्द नहीं थे, बल्कि वह संकल्प था जिसने हजारों युवाओं को बलिदान के लिए तैयार कर दिया था।

    इतिहास का यह कटु सत्य है कि आजादी के बाद लंबे समय तक नेताजी के योगदान को वह स्थान नहीं दिया गया जिसके वे अधिकारी थे। उनकी वीरता, उनकी वैकल्पिक सरकार और उनके सैन्य संघर्ष को असुविधाजनक मानकर हाशिये पर डाल दिया गया। ऐसे में पराक्रम दिवस का औपचारिक और राष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाना केवल सम्मान नहीं बल्कि ऐतिहासिक सुधार है। यह उस अन्याय के खिलाफ घोषणा है जो दशकों तक नेताजी के साथ किया गया।

    आज पराक्रम दिवस भारत को यह याद दिलाता है कि उसकी आजादी की नींव केवल वार्ताओं और प्रस्तावों पर नहीं, बल्कि रणभूमि के संकल्प, सैनिक अनुशासन और सर्वोच्च बलिदान पर रखी गई थी। नेताजी का शौर्य आज भी भारत की नसों में दौड़ता है और पराक्रम दिवस उस चेतना को पुनः जागृत करने का राष्ट्रीय अवसर है।

    सारा देश आज पराक्रम दिवस पर नेताजी को नमन कर रहा है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि नेताजी का अदम्य साहस, अडिग संकल्प और राष्ट्र के लिए उनका अतुलनीय योगदान आज भी हर भारतीय को मजबूत भारत के निर्माण के लिए प्रेरित करता है। प्रधानमंत्री ने कहा कि नेताजी निर्भीक नेतृत्व और प्रखर राष्ट्रभक्ति के ऐसे प्रतीक हैं जिनकी चमक समय के साथ और तेज होती गई है। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस उनके जीवन की प्रेरणा रहे हैं।

    उन्होंने 23 जनवरी 2009 को गुजरात में ई ग्राम विश्वग्राम योजना के शुभारंभ को याद किया। यह योजना गुजरात के सूचना प्रौद्योगिकी परिदृश्य को बदलने की दिशा में एक क्रांतिकारी पहल थी। प्रधानमंत्री ने बताया कि इस योजना का शुभारंभ हरिपुरा से किया गया था, जिसका नेताजी के जीवन में विशेष स्थान रहा है। उन्होंने हरिपुरा की जनता द्वारा दिए गए स्नेहपूर्ण स्वागत और उसी मार्ग पर निकाले गए जुलूस को भी स्मरण किया जिस मार्ग से कभी नेताजी गुजरे थे।

    प्रधानमंत्री ने 2012 में अहमदाबाद में आयोजित आजाद हिंद फौज दिवस के भव्य कार्यक्रम को भी याद किया। उन्होंने कहा कि इस कार्यक्रम में देश भर से वे लोग एकत्र हुए थे जो नेताजी से प्रेरणा लेते हैं। इस अवसर पर तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष पीए संगमा भी उपस्थित थे। प्रधानमंत्री ने कहा कि लंबे समय तक देश पर शासन करने वालों के एजेंडे में नेताजी के गौरवशाली योगदान को स्मरण करना शामिल नहीं था। इसलिए योजनाबद्ध ढंग से उन्हें भुलाने के प्रयास किए गए। लेकिन वर्तमान सरकार का विश्वास इससे अलग है। प्रधानमंत्री ने कहा कि हर संभव अवसर पर नेताजी के जीवन और उनके आदर्शों को जन जन तक पहुंचाने का कार्य किया गया है। उन्होंने कहा कि इसी क्रम में नेताजी से संबंधित फाइलों और दस्तावेजों को सार्वजनिक करना एक ऐतिहासिक कदम रहा।

    प्रधानमंत्री ने 2018 को भी ऐतिहासिक वर्ष बताया। उन्होंने कहा कि लाल किले पर आजाद हिंद सरकार की स्थापना की पचहत्तरवीं वर्षगांठ मनाई गई और तिरंगा फहराने का उन्हें सौभाग्य मिला। उसी वर्ष अंडमान निकोबार में श्रीविजयपुरम में भी नेताजी द्वारा तिरंगा फहराने की पचहत्तरवीं वर्षगांठ मनाई गई और तीन द्वीपों के नाम बदले गए जिनमें रास द्वीप का नाम नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वीप रखा गया। प्रधानमंत्री ने लाल किले में स्थापित क्रांति मंदिर संग्रहालय का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां नेताजी और आजाद हिंद सेना से जुड़ी अमूल्य धरोहरें सुरक्षित रखी गई हैं। उन्होंने कहा कि नेताजी की जयंती को पराक्रम दिवस घोषित करना और इंडिया गेट के पास उनकी भव्य प्रतिमा स्थापित करना राष्ट्र के लिए गर्व के क्षण हैं।

    देखा जाये तो आजादी के बाद सत्ता की राजनीति ने चुन चुन कर नायकों को गढ़ा और कुछ नायकों को मिटाने की कोशिश की। नेताजी की विरासत को पाठ्यपुस्तकों में सीमित कर दिया गया था लेकिन मोदी सरकार ने इस चुप्पी को तोड़ा। नेताजी से जुड़ी फाइलों का सार्वजनिक होना केवल कागजों का खुलना नहीं था बल्कि इतिहास पर जमी धूल को हटाना था। साथ ही लाल किले पर आजाद हिंद सरकार की वर्षगांठ मना कर यह संदेश दिया गया था कि भारत की आजादी केवल एक रास्ते से नहीं आई बल्कि बलिदान, संघर्ष और सशस्त्र प्रतिरोध से भी आई है। इंडिया गेट के पास नेताजी की भव्य प्रतिमा स्थापित करना भी एक ऐतिहासिक निर्णय रहा। वर्षों तक वहां एक औपनिवेशिक प्रतीक खड़ा रहा। अब उसकी जगह वह सेनानी खड़ा है जिसने ब्रिटिश साम्राज्य को सबसे बड़ी चुनौती दी। यह प्रतिमा आने वाली पीढ़ियों को बताएगी कि भारत का आत्मसम्मान किन कंधों पर टिका है।

    मोदी सरकार के इन निर्णयों में एक स्पष्ट विचारधारा दिखाई देती है। यह विचारधारा है आत्मगौरव की, इतिहास से सच निकालने की और राष्ट्रनायकों को उनका हक दिलाने की। नेताजी का सम्मान केवल उनका सम्मान नहीं बल्कि उन लाखों गुमनाम सेनानियों का सम्मान है जिन्होंने आजाद हिंद फौज की वर्दी पहनकर जान की बाजी लगाई। आज जब पराक्रम दिवस मनाया जाता है तो यह केवल अतीत की पूजा नहीं बल्कि वर्तमान को झकझोरने का अवसर है। नेताजी हमें सिखाते हैं कि राष्ट्र के लिए साहसिक निर्णय कैसे लिए जाते हैं। मोदी सरकार ने उनके नाम पर लिए गए फैसलों से यह स्पष्ट कर दिया है कि अब भारत समझौतावादी स्मृतियों से बाहर निकल चुका है। नेताजी की वीरता, उनका त्याग और उनका स्वप्न अब केवल भाषणों में नहीं बल्कि राष्ट्रीय चेतना में जीवित है। यही सच्ची श्रद्धांजलि है और यही इतिहास का न्याय। -नीरज कुमार दुबे

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