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    Home»लेख-आलेख»परिसीमन बिल मानसून सत्र में बहेगा या तैरेगा
    लेख-आलेख

    परिसीमन बिल मानसून सत्र में बहेगा या तैरेगा

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inJuly 18, 2026
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    संसद का मॉनसून सत्र 20 जुलाई से शुरू हो रहा है। यह 13 अगस्त तक चलेगा। कुल 25 दिन, शनिवार , रविवार हटा दिए जाएं तो 19 दिन संसद बैठेगी। 3 दिन प्राइवेट मैंबर बिल के होंगे तो कुल मिलाकर 16 दिन ही असली काम हो पाएगा। इन 16 दिनों में मोदी सरकार आधा दर्जन बिल पास कराने की कोशिश करेगी। उधर विपक्ष जोर देगा कि आधा दर्जन मुद्दों पर बहस हो। यानी हंगामा होना तय है। इस बीच लोकसभा में तस्वीर बदली-बदली नजर आएगी। 

    द्रमुक के 22 सांसद कांग्रेस से दूरी बनाकर बैठे दिखाई देंगे। टी.एम.सी. के 20 सांसद सत्ता पक्ष के साथ नजर आएंगे। उद्धव ठाकरे के 6 सांसद भी एकनाथ शिंदे की शिवसेना के साथ होंगे। टी.एम.सी. के चूंकि अब 8 सांसद ही बचे हैं, लिहाजा उन्हें पीछे के बैंचों पर जाना पड़ सकता है। सवाल उठता है कि क्या कम होती संख्या के कारण विपक्ष की आवाज में वह आक्रामकता नहीं दिखेगी, जो पिछले बजट सत्र में दिखाई दी? क्या इसका असर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर भी पड़ेगा? पिछले 12 सालों में शायद यह पहला मौका होगा, जब विपक्ष के पास मुद्दों की कोई  कमी नहीं रहेगी। राम मंदिर चढ़ावा चोरी, नीट आदि पेपर लीक और उससे जुड़े शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की मांग, वन मंत्री भूपेन्द्र यादव के निजी स्टाफ को हटाया जाना, कृषि राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी का खीरा सबसिडी कांड, बढ़ती महंगाई, खाड़ी युद्ध से जुड़ी विदेश नीति, चीन और बंगलादेश के बीच बढ़ती नजदीकियां, ट्रम्प प्रशासन से होने वाली संभावित व्यापार डील आदि-आदि। उधर सत्ता पक्ष ने विपक्ष में सेंधमारी कर उस एकता को तोडऩे की कोशिशें तेज कर दी हैं जिसकी वजह से पिछली बार परिसीमन बिल तीन-चौथाई बहुमत न होने के कारण गिर गया था। 

    इस बार राज्य सभा में तो दो-तिहाई बहुमत का लगभग जुगाड़ हो गया है। वहां भाजपा को 161 सांसद चाहिएं। मोदी सरकार के पास 155 हैं; इनमें बंगाल से 3 सांसद शामिल हैं, जो 24 जुलाई को निॢवरोध विजेता घोषित कर दिए जाने वाले हैं। अगर गैर एन.डी.ए., गैर इंडिया फ्रंट के कुछ सांसद साथ आ जाते हैं या वोटिंग से नदारद हो जाते हैं तो परिसीमन बिल पास हो सकता है। लेकिन लोकसभा में यह आंकड़ा 320 के आसपास झूल रहा है, जबकि दो-तिहाई बहुमत के लिए 360 की जरूरत पड़ेगी। सब कुछ द्रमुक के 22 सांसदों के रुख पर निर्भर करता है। मनाने-समझाने की कोशिश चल रही है।

    भले ही सुप्रिया सुले खंडन कर चुकी हों लेकिन उनकी पार्टी के 8 सांसदों के समर्थन की उम्मीद मोदी सरकार ने छोड़ी नहीं है। इतना तय है कि इस बार पूरा होमवर्क करने के बाद ही मोदी सरकार परिसीमन बिल को संशोधित रूप से पेश करेगी। संशोधन यह होगा कि इस बार सरकार बिल में लिख कर देगी कि सभी राज्यों की लोकसभा सीटों में 50 फीसदी का इजाफा होगा। परिसीमन में 170 लोकसभा सीटों का स्वरूप नए सिरे से तय किए जाने की बात की जा रही है। 69 वर्तमान लोकसभा सीटों के 2 और 111 सीटों के 3 टुकड़े कर दिए जाएंगे। विभाजन इस तरह होगा, जिससे विपक्ष का वोट बैंक 2 या 3 सीटों में विभाजित हो जाए। कुल सीटें 850 के आसपास करना और उनमें से एक-तिहाई महिलाओं के खाते में डालना 2029 की चुनावी गणित को बदलने की पूरा क्षमता रखता है।  अगर परिसीमन बिल पास हो जाता है तो उसका सीधा असर अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों पर पडऩा तय है।

    मानसून सत्र में एक अन्य विवादित बिल पेश होना है, जिस पर व्यापक हंगामा होना भी तय है। बिल कहता है कि अगर प्रधानमंत्री, उनके मंत्री, मुख्यमंत्री, उनके मंत्रियों पर गंभीर आपराधिक मामला दर्ज होता है और गिरफ्तारी के 30 दिन तक भी अगर जमानत नहीं मिलती है तो आरोपी अपने पद पर से अपने आप ही हटा हुआ माना जाएगा। संसद की संयुक्त समिति ने अपनी रिपोर्ट दे दी है। इसमें कुछ संशोधन किए गए हैं। अब सिर्फ उन्हीं मामलों को गंभीर माना जाएगा, जिनमें आरोप सिद्ध होने पर 5 साल या उससे ज्यादा की सजा हो। इसके अलावा अगर 30 दिन बाद पद से हटे व्यक्ति को मान लीजिए कि 35 या 40 दिन बाद जमानत मिल जाती है तो वह अपने पद पर फिर से बहाल किया जा सकता है? यह देखना दिलचस्प होगा कि संशोधन पर विपक्ष का सुर क्या रहता है। विपक्ष मनीष सिसोदिया, अरविंद केजरीवाल और हेमंत सोरेन का उदाहरण दे रहा है, जिन्हें जमानत मिलने में महीनों लग गए। 

    एक देश एक चुनाव का बिल भी क्या सरकार मानसून सत्र में रखने को उत्सुक है? एक देश एक चुनाव पर संसद की संयुक्त समिति की अंतिम रिपोर्ट 10 अगस्त को सदन में रखी जाएगी। उसके बाद सिर्फ 3 दिन ही बचेंगे। लिहाजा बिल रखा भी जाए और उस पर बहस भी हो जाए, ऐसा संभव नहीं लगता। वैसे भी इस बिल को पास कराने के लिए संविधान की कुछ धाराओं में परिवर्तन करना पड़ेगा, जिसके लिए फिर वही दो-तिहाई बहुमत की जरूरत पड़ेगी। अब यह भी जरूरी नहीं कि परिसीमन बिल पर सरकार का समर्थन करने वाले कुछ दल या संभावित दल एक देश एक चुनाव बिल पर भी समर्थन करें। लिहाजा लगता है कि सरकार इस बिल को संसद में सिर्फ पेश कर अगले शीतकालीन सत्र के लिए छोड़ देगी। कुल मिलाकर इस बार मानसून सत्र में विपक्ष की एकता कसौटी पर परखी जानी है। विपक्ष में टूट-फूट जरूर हुई है लेकिन अगर वह डटा रहा तो लोकसभा में सरकार को दो-तिहाई बहुमत के लाले पड़ सकते हैं। तय है कि बीच का रास्ता सरकार को ही निकालना होगा।-विजय विद्रोही

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