टूटने के बाद अधिकांश वस्तुएं टुकड़ों में बंट कर बिखर जाती हैं। जब उनको किसी चिपकाने वाले पदार्थ से जोड़ा जाता है, तो वे अपना मूल स्वरूप बदल देती हैं, क्योंकि टूटने के बाद जुड़ने में ऐसा होना स्वाभाविक है। जिंदगी भी कुछ ऐसी ही होती है। जब अप्रत्याशित विश्वासघात या जीवन के संघर्षों के झंझावात किसी व्यक्ति को भीतर तक तोड़कर रख देते हैं, तो उस एक कमजोर क्षण में आात्मघात सबसे पहला और आसान उपाय लगता है। मगर क्या वास्तव में यह समाधान है? क्या किसी धोखेबाज, किसी विपरीत परिस्थिति या किसी कठिन दौर के आगे घुटने टेककर अपनी जीवन-लीला समाप्त कर लेना न्यायसंगत है? बिल्कुल नहीं। जब चोट पहुंचाने वाले, धोखा देने वाले लोग दुनिया में मुस्कुरा रहे हैं और खुश हैं, तब अपनी ही अनमोल जान को दांव पर लगा देना किसी भी समस्या का सही जवाब नहीं हो सकता। यह समय बिखरने का नहीं, बल्कि खुद को पहले से ज्यादा मजबूत बनाकर परिस्थितियों का डटकर मुकाबला करने का है।
जापान में एक पुरानी परंपरा है ‘किंत्सुगी’। जब मिट्टी या चीनी के बर्तन टूट जाते हैं, तो जापानी लोग उन्हें फेंकते नहीं हैं। वे उन टूटे हुए टुकड़ों को सोने, चांदी या प्लैटिनम मिश्रित लाख से जोड़ते हैं। परिणाम यह होता है कि वह बर्तन पहले से कहीं अधिक मजबूत हो जाता है और उसकी दरारें सोने की चमक से जगमगा उठती हैं। वह बर्तन अपनी कमियों को छिपाता नहीं, बल्कि उन्हें गर्व से दिखाता है। इंसानी जिंदगी भी ऐसी ही है। विश्वासघात या असफलता से जब हमारा दिल टूटता है, तो हमारे व्यक्तित्व में दरारें आती हैं। लेकिन जब हम धैर्य, आत्म-प्रेम और साहस के अवलेह से खुद को दोबारा जोड़ते हैं, तो हमारा नया स्वरूप पहले से कहीं ज्यादा निखर कर सामने आता है। हमारा मूल स्वरूप बदल जरूर जाता है- हम अधिक परिपक्व और संजीदा हो जाते हैं- लेकिन हमारी आंतरिक मजबूती कई गुना बढ़ जाती है।
मनोविज्ञान में एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत है, जिसे ‘पोस्ट-ट्रामेटिक ग्रोथ’ यानी आघात-पश्चात विकास कहा जाता है। मनोवैज्ञानिक डा रिचर्ड टेडेशी और लारेंस कैलहौन के शोध बताते हैं कि जीवन में गहरे संकट, मानसिक आघात या गंभीर विश्वासघात का सामना करने वाले अधिकतर लोग केवल अवसाद में ही नहीं डूबते, बल्कि एक समय के बाद वे मानसिक रूप से पहले से कहीं अधिक सुदृढ़ हो जाते हैं। इस संकट से गुजरने के बाद लोगों में रिश्तों की बेहतर समझ विकसित होती है, वे सही और गलत लोगों की पहचान करना सीख जाते हैं और उन्हें अपनी उस आंतरिक शक्ति का अहसास होता है, जिससे वे पहले अनजान थे। जब कोई हमें धोखा देता है, तो वह हमारे भरोसे को तोड़ता है। हमारा जीवन किसी एक व्यक्ति पर निर्भर नहीं हो सकता। मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक, आत्मघाती विचार एक ‘अस्थायी मानसिक कोहरा’ होते हैं। अगर उस एक कमजोर पल को धैर्य से पार कर लिया जाए, तो आगे की जिंदगी में सफलता की नई राहें खुलती हैं।
इतिहास और वर्तमान ऐसे नायकों की कहानियों से भरा पड़ा है, जिन्होंने गहरे विश्वासघात और जीवन के झंझावातों को सहा, लेकिन हार मानने के बजाय इतिहास रच दिया। इस बात पर गहराई से विचार करना चाहिए कि जिसने हमें धोखा दिया, विश्वास का कत्ल किया, वह अपनी जिंदगी में मुस्कुरा रहा है, पार्टियां कर रहा है और आगे बढ़ चुका है। ऐसे में हमारे द्वारा उठाया गया कोई भी आत्मघाती कदम उसे दंड नहीं देगा, बल्कि उसे हमारे जीवन के अध्याय को हमेशा के लिए बंद करने का एक बहाना दे देगा। हमारी मृत्यु से सबसे ज्यादा दुख हमारे माता-पिता, सच्चे मित्रों और शुभचिंतकों को होगा, जिनका कोई दोष नहीं था। दोषी व्यक्ति को इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। इसलिए सबसे बड़ा प्रतिशोध यह नहीं है कि हम खुद को मिटा दें। सबसे बड़ा और खूबसूरत प्रतिशोध यह है कि हम खुद को इतना कामयाब, खुश और मजबूत बना लें कि हमें चोट पहुंचाने वाले लोग हमारी ऊंचाई को देखकर खुद अपनी नजरों में बौने साबित हो जाएं।
अगर कोई वर्तमान में किसी ऐसे ही दौर से गुजर रहा है, जहां सब कुछ बिखरा हुआ लग रहा है, तो कुछ बातों को अपने जीवन का मंत्र बना लेना चाहिए। सबसे पहले, उस एक कमजोर पल को टाल दिया जाए, क्योंकि आत्महत्या का विचार अक्सर एक तीव्र और क्षणिक आवेग होता है। जब भी ऐसा महसूस हो, किसी विश्वसनीय मित्र, परिवार के सदस्य या हेल्पलाइन से बात करने की जरूरत है। जैसे शरीर बीमार होने पर हम डाक्टर के पास जाते हैं, वैसे ही मन के बीमार होने या टूटने पर मनोचिकित्सक या काउंसलर की मदद लेना पूरी तरह सामान्य और जरूरी है। अपने भीतर की पीड़ा, गुबार, गुस्से और दुख को किसी रचनात्मक कार्य, करिअर या समाज सेवा में झोंक देना चाहिए। इतिहास गवाह है कि महानतम कला और सफलताएं गहरे दर्द की कोख से ही पैदा हुई हैं। इस बात को स्वीकार कर लेना चाहिए कि टूटने के बाद हमारा पुराना स्वरूप शायद वापस न आए, लेकिन यह नया रूप अधिक सतर्क, अधिक समझदार और कहीं अधिक शक्तिशाली होगा।
जिंदगी एक अनमोल उपहार है, जिसे किसी भी विश्वासघाती या कठिन परिस्थिति की भेंट नहीं चढ़ाया जा सकता। टूटना अंत नहीं है, बल्कि यह एक नए और अधिक मजबूत स्वरूप के निर्माण की शुरुआत है। जब चीनी मिट्टी का बर्तन सोने से जुड़कर पहले से ज्यादा कीमती बन सकता है, तो हम हाड़-मांस के जीवित इंसान हैं, जिसके भीतर अदम्य इच्छाशक्ति का वास है। याद रखना चाहिए कि झंझावात पेड़ की सूखी पत्तियों को गिराते हैं, उसकी जड़ों को मजबूत करते हैं। खुद को समेट कर, उठने, अपनी दरारों को अपने तजुर्बे का सोना बनाने और दुनिया को दिखा देने की जरूरत है कि हम बिखरने के लिए नहीं, बल्कि निखरने के लिए बने हैं।–आकांक्षा दीक्षित

