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    Home»लेख-आलेख»गुरु रविदास जी के किए गए प्रयोग…
    लेख-आलेख

    गुरु रविदास जी के किए गए प्रयोग…

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inApril 24, 2026
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    असल प्रश्न तो मतान्तरण का सामना करने का था। उसके खिलाफ सामान्य जन को कैसे जागृत किया जाए? विदेशी शासक तुर्कों ने भी रणनीति बदली थी। समाज के बड़े महापुरुषों को ही पहले मतान्तरित किया जाए, ताकि आम आदमी विरोध का साहस ही छोड़ दे। शायद यही कारण था कि सिकन्दर लोधी ने रविदास जी को भी इस्लाम में मतान्तरित करने की बहुत कोशिश की लेकिन उसे निराशा ही हाथ लगी। रविदास जी की साधना, उनका ज्ञान और समाज के भीतर जाति भेद की दीवारों को समतल करने के प्रयोग ही थे जिसके कारण राज परिवारों ने उनको अपना गुरु स्वीकार किया। उनके ये प्रयोग आज इक्कीसवीं शताब्दी में भी प्रासंगिक हैं…

    मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन में कबीर, गुरु रविदास और गुरु नानकदेव जी की वाणी कालजयी मानी जाती है। गुरु रविदास जी की 650वीं जयन्ती के कार्यक्रम साल भर देश भर में किए जाएंगे। काशी में रहकर जिन्होंने जीवन भर श्रम, भक्ति और ज्ञान साधना की, ऐसे गुरु रविदास जी की 650वीं जयन्ती के अवसर पर, आज का भारत जिन समस्याओं से जूझ रहा है, उनको लेकर उनका का संदेश क्या हो सकता है, यह बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न है। इतिहास भूतकाल को इंगित करता है। इतिहास को भूतकाल और वर्तमान का संवाद भी कहा जाता है। इसी संवाद से वर्तमान की समस्याओं को सुलझाने का रास्ता निकलता है। वर्तमान काल में उसकी प्रासंगिकता तभी होती है, यदि उनका मार्ग वर्तमान की समस्याओं के समाधान में सहायक हो सके। गुरु रविदास जी के योगदान के बारे में सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र के चिन्तक दत्तात्रेय होसबोले ने इसका संकेत दिया है। उनका कहना है, ‘वर्तमान समय में जब विविध विभाजनकारी शक्तियां जनमानस को वर्ग और जाति के आधार पर बांटने का प्रयास कर रही हैं, तब गुरु रविदास जी के जीवन-संदेश के मर्म को समझकर हम सभी को देश और समाज की एकात्मता के लिए कार्य करने का संकल्प लेने की आवश्यकता है।’ होसबोले के अनुसार मोटे तौर पर भारतीय समाज को बांटने वाले दो मुख्य कारक हैं। पहला कारक वर्ग है और दूसरा जाति है।

    इन दोनों कारकों से देश और समाज की एकात्मता भंग होती रही है। होसबोले ने बीमारी की पहचान तो सही की है। जब तक सही बीमारी पहचान में न आए, तब तक उसका इलाज सम्भव नहीं है। लेकिन भारतीय समाज को घुन की तरह लग गई इस बीमारी का जिम्मेदार कौन है? इसकी खोज भी जम्बू द्वीप में ही करनी होगी। इसका उल्लेख दत्तात्रेय होसबोले ने भी जिक्र किया है। दत्तात्रेय लिखते हैं, ‘मुस्लिम आक्रमणकारियों के आतंक के उस कठिन काल में भक्ति की निर्मल धारा को प्रवाहित करते हुए संत श्री रविदास जी ने धर्म की श्रेष्ठता की उद्घोषणा की और लोगों से धर्मपालन का आग्रह किया। सद्गुरु संत श्री रविदास जी को भी इस्लाम में मतान्तरित करने के अनेक प्रयास हुए, किन्तु उनकी भक्ति और आध्यात्मिक साधना से प्रभावित होकर उन्हें मतांतरित करने वाले ही उनके अनुयायी बन गए।’ इस्लाम पंथ के अनुयायी मुसलमानों का भारत से क्या संबंध है और उसका भारत में क्या परिणाम हुआ, इसको समझना जरूरी है। छठी शताब्दी में जम्बू द्वीप के अरब क्षेत्र में इस्लाम पंथ का उदय हुआ था। उससे पहले उसी क्षेत्र के आसपास याहोबा मत और ईसाई मत का उदय हुआ था। इस्लाम पंथ का उदय सबसे अन्त में हुआ। यह पंथ ज्ञान और अध्यात्म के क्षेत्र में भी संवाद को आधार न बना कर तलवार को आधार बनाने का पक्षधर था और उसका व्यावहारिक रूप में प्रयोग भी करता था। सातवीं शताब्दी के अन्त में अरबों ने सप्त सिन्धु क्षेत्र से भारत पर आक्रमण किया। सिन्ध को जीतने के बाद अरबों ने वहां अपने इलाके के नए इस्लाम पंथ का सिन्ध में प्रचार करने के लिए तलवार का प्रयोग किया। आधिभौतिक क्षेत्र के प्रश्नों पर विचार करने के लिए भारत में संवाद की प्रचलित सनातन परम्परा थी। इसलिए अरबों की भौतिक चुनौती का मुकाबला तो किया जा सकता था और अरबों के हमलों से पहले भी यूनान और शक-हूणों के हमलों का मुकाबला भारतीयों ने किया ही था। लेकिन अध्यात्म के क्षेत्र में तलवार का प्रयोग भारतीयों ने पहली बार देखा था। भारत के विभिन्न समुदाय अपने अपने खोल में सिमट गए। कर्मकांड और सख्त कर दिए गए। निराशा के इस वातावरण में पाखंडी लोगों ने चमत्कारों से सामान्य जन के भय का दोहन शुरू कर दिया।

    इतना ही नहीं जिन समुदायों ने आक्रमणकारी अरबों, तुर्कों व मुगलों का डट कर मुकाबला किया था, उनके दुर्भाग्य से जीत आक्रमणकारियों की हुई थी। स्वाभाविक ही जीता हुआ राजा पराजित सेना के साथ जैसा व्यवहार करता है, यह भली प्रकार समझा जा सकता है। फिर यहां तो जीतने वाले राजा विदेशी ही नहीं थे बल्कि हाथ में तलवार लेकर इस्लाम को भी पराजित लोगों पर थोप रहे थे। इस प्रकार की स्थिति में मुकाबला करने वाले समुदाय विदेशी शासकों द्वारा सामाजिक संरचना में नीचे ही नहीं धकेल दिए, बल्कि उनके आर्थिक साधन भी कब्जे में ले लिए गए। वर्ण व्यवस्था के अनुसार तो यही क्षत्रिय समाज था जिसे विदेशी विजेताओं ने गर्त में पहुंचा दिया था। अब क्षत्रिय समाज सामाजिक संरचना में नीचे चला गया। अंबेडकर ने सही पकड़ा कि शूद्र वास्तव में क्षत्रिय ही हैं। रविदास जी उस समाज से ताल्लुक रखते थे जो समाज विदेशी आक्रमणकारियों से लड़ते हुए हाशिए पर चला गया था। रविदास को अपनी यात्रा इस प्रकार के भारतीय, विशेषकर उत्तर भारतीय समाज में से शुरू करनी थी। इस क्षेत्र में रविदास जी के प्रयोगों की चर्चा करते हुए दत्तात्रेय लिखते हैं- ‘संत श्री रविदास जी भक्ति की भाव-धारा के महान संत थे, जिन्होंने समाज में एक नई चेतना प्रवाहित की। उन्होंने जन्म के आधार पर ऊंच-नीच के भेद को नकारते हुए आचरण को ही श्रेष्ठता की कसौटी माना। रूढिय़ों और कुरीतियों से समाज की मुक्ति तथा कालबाह्य परंपराओं को त्यागने और काल सुसंगत सामाजिक परिवर्तनों को अंगीकार करने हेतु समाज का मानस बनाने में उनकी ऐतिहासिक भूमिका रही है।

    उनके विचारों का महत्व समझकर श्री गुरुग्रंथ साहिब में उनकी 41 वाणियों को ‘शबद’ रूप में समाहित किया गया है।’ लेकिन असल प्रश्न तो मतान्तरण का सामना करने का था। उसके खिलाफ सामान्य जन को कैसे जागृत किया जाए? विदेशी शासक तुर्कों ने भी रणनीति बदली थी। समाज के बड़े महापुरुषों को ही पहले मतान्तरित किया जाए, ताकि आम आदमी विरोध का साहस ही छोड़ दे। शायद यही कारण था कि सिकन्दर लोधी ने रविदास जी को भी इस्लाम में मतान्तरित करने की बहुत कोशिश की लेकिन उसे निराशा ही हाथ लगी। रविदास जी की साधना, उनका ज्ञान और समाज के भीतर जाति भेद की दीवारों को समतल करने के प्रयोग ही थे जिसके कारण राज परिवारों ने उनको अपना गुरु स्वीकार किया। उनके ये प्रयोग आज इक्कीसवीं शताब्दी में भी प्रासंगिक हैं। दत्तात्रेय होसबोले ने इसका उल्लेख किया है। उनका कहना है कि ‘सामान्य पारिवारिक पृष्ठभूमि से आने वाले संत श्री रविदास जी का ईश्वर-भक्ति, सेवा भाव तथा समाज के प्रति निश्छल प्रेम के कारण काशी के विद्वतजनों सहित समाज के सभी वर्गों ने उनकी महानता को स्वीकृत किया। काशी नरेश, झाली रानी तथा मीराबाई जैसे राजपरिवारों के सदस्यों ने भी उनको अपना गुरु माना। गुरु और शिष्य के रूप में संत श्री रविदास जी और मीराबाई का नाता निर्गुण और सगुण भक्ति धाराओं का मिलन है, तथा जातिभेद मानने वालों के लिए अनुकरणीय सीख भी है।’-कुलदीप चंद अग्निहोत्री

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