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    Home»BREKING NEWS»प्राकृतिक खेती एवं देशी किस्मों को अपनाने से किसान होंगे खुशहाल : कृषि मंत्री श्री रामविचार नेताम
    BREKING NEWS

    प्राकृतिक खेती एवं देशी किस्मों को अपनाने से किसान होंगे खुशहाल : कृषि मंत्री श्री रामविचार नेताम

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inAugust 29, 2025
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    भगवान श्री बलराम जयंती एवं किसान दिवस पर कृषक संगोष्ठी संपन्न

    राजधानी सहित प्रदेश के सभी कृषि विज्ञान केन्द्रों में मनाया गया किसान दिवस

    प्राकृतिक एवं गौ आधारित कृषि पर कार्यशाला भी आयोजित

    भगवान श्री बलराम जयंती एवं किसान दिवस के उपलक्ष्य में “प्राकृतिक खेती, गौ कृषि वाणिज्य एवं तिलहन उत्पादन” विषय पर एक दिवसीय कृषक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम कृषि विकास एवं कृषक कल्याण विभाग, छत्तीसगढ़ शासन, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर, महात्मा गांधी उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, सांकरा, पाटन तथा भारतीय किसान संघ, छत्तीसगढ़ प्रदेश के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया। इस संगोष्ठी में रायपुर जिले के विभिन्न ग्रामों से आए कृषक पुरुष एवं महिलाएँ, कृषक संगठन, वैज्ञानिक, छात्र-छात्राएँ तथा कृषि विभाग के अधिकारी सम्मिलित हुए। प्रतिभागियों की संख्या 1500 से अधिक रही। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि माननीय कृषि मंत्री श्री रामविचार नेताम एवं माननीय कौशल विकास मंत्री श्री गुरु खुशवंत साहेब थे।


    कृषि विकास एवं किसान कल्याण मंत्री श्री राम विचार नेताम आज भगवान श्री बलराम जयंती (कृषक दिवस) के अवसर पर इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर के कृषक सभागार में आयोजित कृषक सम्मेलन में शामिल हुए। उन्होंने किसानों एवं प्रदेशवासियों को भगवान श्री बलराम जयंती की बधाई और शुभकामनाएं दी। मंत्री श्री नेताम ने कहा कि भगवान श्री बलराम खेती किसानी के देवता है। किसान भाइयों के लिए यह अवसर ऐतिहासिक और गौरव का क्षण है। उन्होंने कहा कि किसान समृद्ध, संपन्न और सक्षम होंगे तो निश्चित ही देश और प्रदेश खुशहाल होगा। उन्होंने किसानों को जैविक खेती करने और देशी किस्मों को बचाने की अपील की। उन्होंने कार्यक्रम के दौरान उन्नत किसानों को विभागीय योजनाओं के तहत अनुदान राशि का चेक एवं उपकरण प्रदान किए। सम्मेलन में प्राकृतिक खेती, गो कृषि वाणिज्यम एवं तिलहन उत्पादन पर भी विचार मंथन किया गया।
    कृषि मंत्री श्री नेताम ने कहा कि आज देश में प्राकृतिक एवं जैविक खेती के लिए अच्छा माहौल बन रहा है और पढ़े लिखे युवा भी अच्छी नौकरियां छोड़कर प्राकृतिक खेती को ओर अग्रसर हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व नीतिगत फैसलों और कार्यों से प्रदेश के किसान आज सामर्थ्यवान बन रहे है। किसान अब खेती-किसानी को व्यवसाय के रूप में अपना रहे हैं। भगवान श्री बलराम जी की जयंती के मौके पर राजधानी सहित प्रदेश के सभी कृषि विज्ञान केन्द्रों में किसान दिवस का आयोजन किया गया। इस अवसर पर माननीय कृषि मंत्री जी द्वारा किसानों को खेती में उपयोग होने वाले आदानों का वितरण किया गया।


    कौशल विकास मंत्री श्री गुरु खुशवंत साहेब ने कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए किसानों से जैव विविधता के संरक्षण का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि किसान ऊर्जावान और ज्ञानवान है, फिर भी जहां जरूरत पड़े किसानों को कौशल विकास एवं तकनीक के क्षेत्र में राज्य सरकार द्वारा हर संभव मदद दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि परिश्रम से ही समृद्धि है धरती मां की सेवा करने की प्रेरणा भगवान श्री बलराम जी से मिलती है। उन्होंने प्राकृतिक एवं जैविक कृषि के क्षेत्र में और अधिक अनुसंधान करने की आवश्यकता जताई। मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में हमारी सरकार छत्तीसगढ़ के किसानों से वाजिब दाम पर धान की खरीदी कर किसान को सम्मान दिया हैं। उन्होंने अपने मंत्रालय द्वारा किसानों के कौशल विकास हेतु योजनाओं का विवरण भी साजा किया।
    श्री आलोक सिंह ठाकुर, प्रदेश अध्यक्ष-किसान मोर्चा, छत्तीसगढ़ ने संबोधित करते हुए कहा कि भगवान बलराम को कृषि एवं शक्ति का प्रतीक माना जाता है। वे कृषकों के संरक्षक एवं ग्रामीण जीवन के प्रेरणास्रोत हैं। वर्तमान में बढ़ती उत्पादन लागत और घटती मृदा उर्वरता जैसी चुनौतियों का समाधान प्राकृतिक एवं गौ-आधारित खेती से ही संभव है। किसानों से अपील की गई कि वे जैविक उपाय अपनाकर खेती की लागत घटाएँ और अपनी आय में वृद्धि करें।


    श्री मनीश शर्मा, संगठन मंत्री, भारतीय किसान संघ, छत्तीसगढ़ प्रदेश ने संबोधित करते हुए कहा कि किसानों को गौ-आधारित प्राकृतिक खेती के संबंध में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि आज जैविक एवं प्राकृतिक खेती की जरूरत है। मांग के अनुरूप प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमें जैविक और प्राकृतिक खेती के लिए वैचारिक रूप से परिपक्व होना चाहिए। उन्होंने कहा गौ पालन के लिए भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं गौपालन कर लोगों को प्रेरित किया है।
    इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. गिरीश चंदेल ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय ने प्राकृतिक एवं जैवक कृषि के क्षेत्र में काफी कार्य किये गये हैं। इसके अलावा विश्वविद्यालय में एक हेक्टेयर क्षेत्र में गौ आधारित का जैविक समन्वित कृषि प्रणाली मॉडल विकसित किया गया है। कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा छत्तीसगढ़ की प्रमुख फसलें जैसे धान, चना, सोयाबीन, मक्का (स्वीटकार्न) आदि फसलों की गौ आधारित जैविक खेती करने की पद्धति विकसित की गई है। सुगंधित धान एवं चना की विभिन्न किस्मों की पहचान की गई जो जैविक खेती में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रही है। कृषकों को प्राकृतिक खेती के स्तंभ बीजामृत, घनजीवामृत, जीवामृत, नीमास्त्र, ब्रम्हास्त्र आदि बनाने के लिए प्रशिक्षित करने हेतु निरंतर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। साथ ही प्रत्येक कृषि विज्ञान केन्द्र द्वारा कृषकों हेतु पांच दिवसीय प्रशिक्षण एवं उनके खेतों में प्राकृतिक खेती का प्रदर्शन डाला जा रहा है। प्राकृतिक खेती के प्रचार-प्रसार हेतु विश्वविद्यालय के अनुसंधान प्रक्षेत्र एवं कृषि विज्ञान केन्द्र में विकसित जैविक व प्राकृतिक खेती के मॉडल में कृषकों, छात्रों को भ्रमण कराया जाता है।


    डॉ. रवि रतन सक्सेना, माननीय कुलपति, महात्मा गांधी उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, दुर्ग ने श्री बलरम जयंती की शुभकामनाएं देते हुए प्रदेश में उद्यानिकी एवं वानिकी फसलों के क्षेत्र विकास का महत्व बताया एवं कहा कि भविश्य में छत्तीसगढ़ को उद्यानिकी फसलों के प्रचुर उत्पादन हेतू जाना जाएगा।
    कार्यक्रम में श्री माधों सिंह, अध्यक्ष, भारतीय किसान संघ, छत्तीसगढ़ प्रदेश, कृषि उत्पादन आयुक्त श्रीमती शहला निगार, संचालक कृषि श्री राहुल देव, प्रबंध संचालक श्री अजय अग्रवाल, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के प्रबंध मण्डल सदस्य श्रीमती जानकी चन्द्रा, कृषि एवं संबंध विभाग के अधिकारी, भारतीय किसान संघ के सदस्य, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय एवं महात्मा गांधी उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय के शिक्षक, छात्र-छात्राओं सहित बड़ी संख्या में किसान उपस्थित थे। संगोष्ठी का संचालन डॉ. राकेश बनवासी द्वारा किया गया। यह आयोजन किसानों के बीच आत्मनिर्भर, टिकाऊ एवं लागत-कटौती आधारित कृषि पद्धति को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हुआ।

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