राजेश अग्रवाल
‘विकसित भारत’ का विज़न हासिल करने के लिए अगले दो दशकों तक आर्थिक विकास की उच्च दर बनाए रखना ज़रूरी है। भारत का विशाल घरेलू बाजार इस विकास के लिए एक महत्वपूर्ण इंजन है, लेकिन केवल इसी पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। वैश्विक प्रतिस्पर्धी पैमाने और वास्तविक तकनीकी परिवर्तन हासिल करने के लिए, भारत मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) के नेटवर्क के माध्यम से वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ मजबूती से एकीकृत हो रहा है। जहां डब्ल्यूटीओ समझौते नियम-आधारित वैश्विक व्यापार प्रणाली के लिए आधारशिला प्रदान करते हैं, वहीं एफटीए इच्छुक साझेदारों को डब्ल्यूटीओ आधारशिला पर आगे बढ़ाते हुए रुचि के अन्य क्षेत्रों में अधिक गहराई से एकीकरण करने में सक्षम बनाते हैं। आर्थिक एकीकरण और साझेदार देशों के अनुसार नियम बनाने के महत्वपूर्ण चालक के रूप में वर्तमान में लागू 384 अधिसूचित एफटीए अपनी उपयोगिता रेखांकित करते हैं। ये एफटीए महत्वपूर्ण बाजार तक पहुंच बनाने और भारतीय व्यवसायों को वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल के अनिश्चित हालात से बचाने के लिए संस्थागत रूपरेखा (ब्लूप्रिंट) हैं।
वैश्विक आर्थिक अवसरों तक पहुंच भी उन भारतीय व्यवसायों के लिए जरूरी है, जो बड़े पैमाने पर काम करके वैश्विक चैम्पियन के तौर पर उभरना चाहते हैं। लेकिन फायदा केवल बड़े व्यवसायों तक सीमित नहीं है; एफटीए स्टार्ट-अप, एमएसएमई, किसानों, मछुआरों और भारतीय प्रतिभा के लिए भी महत्वपूर्ण अवसर के द्वार खोलते हैं, जो अपनी क्षमताओं का विश्व स्तर पर लाभ उठाना चाहते हैं। ये बाध्यकारी प्रतिबद्धताएँ टैरिफ, सेवा बाजार तक पहुंच और पारदर्शी व्यापार नियमों को शामिल करती हैं, जिससे भारतीय व्यवसायों को लंबी अवधि के निवेश के लिए भरोसेमंद वातावरण मिलता है।
भारत की व्यापार बातचीत की रणनीति काफी विकसित हो चुकी है, और इसका ध्यान उन पूरक अर्थव्यवस्थाओं पर है, जो वस्तु और सेवाओं के लिए मुख्य निर्यात बाजार के रूप में काम करती हैं। हाल के मुक्त व्यापार समझौतों का एक मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भारतीय निर्यातकों को यूरोपीय संघ, यूके और ऑस्ट्रेलिया जैसे महत्वपूर्ण बाजारों में समान अवसर प्राप्त हों। यह समानता विशेष रूप से वस्त्र, परिधान और जूते जैसे श्रम-गहन क्षेत्रों के लिए जरूरी है, जहां ऐतिहासिक रूप से भारतीय उत्पादों पर भारी टैरिफ लगता रहा है, जबकि प्रतिस्पर्धियों को शुल्क मुक्त पहुँच मिलती है। कनाडा, इज़राइल और ईएईयू और एमईआरसीओएसयूआर जैसे समूहों के साथ भी भारत व्यापार समझौतों पर बातचीत कर रहा है।
सेवाएँ भारत की निर्यात रणनीति और इसके एफटीए वार्ताओं के केंद्र में हैं। सीमापार डिजिटल डिलीवरी पर पक्के वादे करके, हाल के एफटीए, तेजी से बढ़ते वैश्विक क्षमता केंद्र (जीसीसी) इकोसिस्टम, तकनीकी स्टार्टअप्स और डिजिटल नवोन्मेषियों के बीच निवेशकों के भरोसे को बढ़ाने में मदद करते हैं।
डिजिटल डिलीवरी सेवाओं के अलावा, एफटीए ने भारत को वार्ताओं में नए तरीके अपनाने का मौका दिया है, जिससे ऐसी बाध्यकारी प्रतिबद्धताएँ हासिल हुई हैं, जो भारतीय प्रतिभा, खासकर युवाओं के आवागमन को बढ़ाती हैं। मुख्य उपलब्धियों में शामिल हैं – छात्र और पेशेवरों के लिए आवागमन प्रावधान और साइड-लेटर, भारत-यूके दोहरा योगदान समझौता (डीसीसी) जैसे फ्रेमवर्क, जो अस्थायी कार्य के लिए दोहरी सामाजिक सुरक्षा कराधान को रोकते हैं, और योग जैसे खास क्षेत्रों में आवागमन अधिकार।
भारत के नई पीढ़ी के एफटीए की एक विशेषता व्यापार और निवेश के बीच गहरे संबंध को मान्यता देना है। प्रमुख वैश्विक बाजारों तक पहुंच प्रदान करके और प्रमुख निर्माण सामग्री के आयात को आसान बनाकर, यह नेटवर्क बढ़ती मांग के साथ मिलकर भारत को निर्माण और निवेश के लिए बेहद आकर्षक गंतव्य बनाता है।
हाल के समझौते और आगे बढ़ते हुए बाजार तक पहुंच को निवेश परिणामों से सीधे जोड़ते हैं। इसका प्रमुख उदाहरण है, भारत-ईएफटीए समझौता, जिसमें यह शर्त रखी गयी है कि ईएफटीए देशों को भारतीय बाजार तक पहुंच तभी मिलेगी, जब वे 100 बिलियन डॉलर के एफडीआई का वादा करेंगे और भारत में दस लाख नौकरियां पैदा करेंगे। भारत-न्यूजीलैंड एफटीए में भी ऐसे ही प्रावधान हैं, जिनके तहत लंबे समय के निवेश के वादे के बदले भारत के विशाल उपभोक्ता बाजार तक पहुंच की सुविधा दी गयी है।
आधुनिक व्यापार अब केवल टैरिफ तक सीमित नहीं है; इसके लिए 21वीं सदी के आयामों को समझना और नियमों पर ध्यान देना जरूरी है, जैसे व्यापार में तकनीकी बाधाएं (टीबीटी), स्वच्छता और पादप-स्वच्छता से जुड़े उपाय (एसपीएस), और व्यापार सुगमता (टीएफ)। भारत के अगली पीढ़ी के एफटीए इन रूपरेखाओं के साथ सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं।
अक्सर, टैरिफ़ की तुलना में उत्पाद मानक और अन्य नियामक आवश्यकताएँ बाजार तक पहुँचने में ज़्यादा बड़ी रुकावटें पैदा करती हैं। भारत के एफटीए में नियामक समन्वय और सहयोग के प्रावधान भारतीय निर्यातकों के संदर्भ में इन बाधाओं को कम करने के लिए व्यवस्थित व संस्थागत तरीके प्रदान करते हैं।
पर्यावरण और श्रम मानक व्यापार में संभावित बाधाओं के रूप में उभर रहे हैं और इनके लिए उपाय न करना अब कोई विकल्प नहीं है। भारत के नए एफटीए इन चिंताओं को दूर करने के लिए ऐसी सहयोगात्मक व्यवस्था पेश करते हैं, जिससे भारतीय हितों को नुकसान न पहुंचे। ये वैश्विक साझेदारों को भरोसा दिलाते हैं कि भारत मानकों के मामले में “सबसे निचले स्तर पर पहुँचने की होड़” से बचते हुए, वास्तविक नवाचार और बड़े पैमाने पर काम करके प्रतिस्पर्धी बढ़त हासिल करना चाहता है।
भारत की एफटीए नीति टुकड़ों में नहीं है, या देश-दर-देश नहीं है। यह जानबूझकर ऐसी पूरक अर्थव्यवस्थाओं को लक्षित करती है, जिनकी वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में दो-तिहाई और वैश्विक आयात मांग में 75% की हिस्सेदारी है।
सबसे जरूरी बात यह है कि इन एफटीए पर बातचीत हितधारकों की निरंतर भागीदारी और संपूर्ण सरकार दृष्टि पर निर्भर करती है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि व्यापार नीति भारत के औद्योगिक विकास, नवाचार और सामाजिक-आर्थिक प्रगति जैसी व्यापक प्राथमिकताओं के अनुरूप है और समझौते इस तरह से बनाए जाएँ कि संवेदनशील क्षेत्र और आबादी सुरक्षित रहें।
खास तौर पर, एफटीए में ऐसे मज़बूत प्रावधान शामिल किये जाते हैं, जिनसे यह सुनिश्चित होता है कि भारतीय बाजार को खोलने से घरेलू हितधारकों को नुकसान नहीं होगा। संवेदनशील और रणनीतिक क्षेत्र में उदारीकरण लंबे समय में धीरे-धीरे किया जाता है, ताकि स्थानीय उद्योगों को तालमेल बिठाने का समय मिल सके। कृषि जैसे कई प्रमुख क्षेत्रों को एमएसएमई और किसानों की सुरक्षा के लिए बाहर रखा गया है, साथ ही अचानक आयात बढ़ने की स्थिति से निपटने के लिए सुरक्षा उपाय भी मौजूद हैं।
अंतिम लक्ष्य एक सुदृढ़ और तालमेल व नियम-आधारित व्यापार इकोसिस्टम है, जिसमें भारत के अंतरराष्ट्रीय व्यापार का बड़ा हिस्सा शामिल हो। जमीनी स्तर पर निवेश करने और मूल्य-श्रंखला लिंक बनाने के जरिए, रणनीतिक एफटीए भारतीय व्यवसायों को उस चीज़ पर ध्यान केंद्रित करने की स्वतंत्रता देंगे, जो वास्तव में मायने रखती है: नीतिगत अनिश्चितता और नियामक बाधाओं की परेशानी से मुक्त होकर विस्तार करना, नवाचार करना और विपणन करना।
(लेखक वाणिज्य मंत्रालय के सचिव हैं।)

