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    Home»लेख-आलेख»भारतीय राजनीति में राष्ट्रीय व क्षेत्रीय दलों, दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका
    लेख-आलेख

    भारतीय राजनीति में राष्ट्रीय व क्षेत्रीय दलों, दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inJune 15, 2026
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    भारत दुनिया के सबसे विविध लोकतंत्रों में से एक है। हर राज्य की अपनी भाषा, संस्कृति, परम्पराएं और प्राथमिकताएं हैं। इसलिए, स्वाभाविक ही है कि स्थानीय आकांक्षाओं और चिंताओं का प्रतिनिधित्व करने के लिए पिछले कुछ वर्षों में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का उदय हुआ है। इनमें से कई दलों ने उन मुद्दों को उजागर करके एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिन पर शायद राष्ट्रीय नेताओं का पर्याप्त ध्यान नहीं गया हो। साथ ही, भारतीय राजनीति का इतिहास दिखाता है कि कई क्षेत्रीय दल किसी विशेष मुद्दे, किसी लोकप्रिय स्थानीय नेता या किसी मजबूत भावनात्मक आंदोलन से पैदा होते हैं। कुछ क्षेत्रीय पहचान के इर्द-गिर्द उठते हैं, कुछ भाषा के इर्द-गिर्द और अन्य इसलिए क्योंकि लोगों को लगता है कि उनके राज्य या समुदाय की उपेक्षा की गई है। एक बार जब मूल मुद्दा फीका पड़ जाता है या नेतृत्व बदल जाता है, तो उनका प्रभाव धीरे-धीरे कम हो सकता है।

    क्षेत्रीय दल भारत के लोकतांत्रिक ढांचे का एक अनिवार्य हिस्सा हैं। उनकी सबसे बड़ी ताकत स्थानीय जरूरतों को समझने और अपने राज्यों के हितों की रक्षा करने में है। वे अक्सर बड़े संगठनों की तुलना में अधिक फुर्तीले होते हैं क्योंकि वे लोगों के करीब रहते हैं और राज्य-विशिष्ट चुनौतियों का तुरंत जवाब देने में सक्षम होते हैं। लेकिन क्षेत्रीय राजनीति की प्रकृति ही ऐसी है कि इसका दायरा सीमित होता है और ज्यादातर यह बहुत परिवार-उन्मुख होती है। भारत जैसे बड़े और जटिल देश के भविष्य को आकार देने की जिम्मेदारी के लिए कहीं अधिक व्यापक दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि मजबूत राष्ट्रीय राजनीतिक दल इतने महत्वपूर्ण हैं। 

    राष्ट्रीय पार्टियां ऐसी संस्थाएं हैं, जो टिके रहने के लिए बनी हैं। जब केंद्र के पास रक्षा, विदेश नीति, आॢथक सुधार, प्रौद्योगिकी और प्रमुख बुनियादी ढांचा परियोजनाओं जैसे राष्ट्रीय प्राथमिकताओं पर ध्यान केंद्रित करने की स्थिरता होती है, तो क्षेत्रीय दल उस काम पर ध्यान केंद्रित करने के लिए स्वतंत्र होते हैं, जो वे सबसे अच्छा करते हैं-अपने राज्यों के कल्याण और विकास की देखभाल करना। वे स्कूलों, अस्पतालों, उद्योगों, कृषि और स्थानीय बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए काम कर सकते हैं। सबसे अच्छे परिणाम तब मिलते हैं जब राष्ट्रीय सरकार और राज्य लगातार राजनीतिक टकराव में उलझने की बजाय मिलकर काम करते हैं। भारत की सबसे बड़ी विकास परियोजनाओं को ठीक इसी तरह के सहयोग की आवश्यकता होती है। राजमार्ग, रेलवे, हवाई अड्डे, बंदरगाह, औद्योगिक गलियारे, डिजिटल बुनियादी ढांचा और कल्याणकारी कार्यक्रम, ये सभी केंद्र सरकार और राज्यों के बीच करीबी समन्वय पर निर्भर करते हैं। 

    दुर्भाग्य से, हाल के वर्षों में राजनीति रचनात्मक होने की बजाय अधिक टकराववादी हो गई है। प्रमुख राष्ट्रीय दलों और क्षेत्रीय दलों के बीच का आदान-प्रदान कई बार अनावश्यक रूप से कड़वा हो गया है और राजनीतिक नेताओं द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा अक्सर कठोर और व्यक्तिगत रही है, असहनीय। लोकतंत्र में निश्चित रूप से मजबूत बहस की आवश्यकता होती है लेकिन बहस का रूप अनादर में नहीं बदलना चाहिए। जनता नेताओं से नीति पर असहमत होने की उम्मीद करती है लेकिन फिर भी गरिमा और शिष्टाचार बनाए रखने की चाह रखती है। एक और चुनौती, जिससे भारतीय राजनीति को पार पाना है, वह है जाति, पंथ, धर्म और पहचान-आधारित वोट बैंकों पर निरंतर निर्भरता। यह संकीर्ण रूप से केंद्रित क्षेत्रीय या वर्गीय दलों के उभरने के लिए उपजाऊ जमीन तैयार करता है। जब लोगों को लगता है कि उन्हें केवल जाति या धर्म के चश्मे से संबोधित किया जा रहा है, तो वे स्वाभाविक रूप से उन दलों की ओर आकॢषत होते हैं, जो अस्थायी रूप से उन पहचानों का प्रतिनिधित्व करने का वादा करते हैं। और यही फिर क्षेत्रीय दलों का मजबूत पक्ष बन जाता है, जो थोड़े समय के लिए उनके बहुत फायदे का होता है। 

    बड़े राष्ट्रीय दलों की यह विशेष जिम्मेदारी है कि वे राजनीति की इस शैली से ऊपर उठें। उन्हें मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जो लोगों को विभाजित करने की बजाय उन्हें जोड़ते हैं। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, सार्वजनिक सुरक्षा, बुनियादी ढांचा और आॢथक अवसर हर परिवार के लिए मायने रखते हैं, चाहे उनका धर्म, जाति या भाषा कुछ भी हो। यही कारण है कि भारत को दो मजबूत राष्ट्रीय राजनीतिक शक्तियों और एक स्वस्थ विपक्ष के होने से लाभ मिलता है। एक जीवंत लोकतंत्र को एक ऐसी सरकार की आवश्यकता होती है जो निर्णय ले सके और एक ऐसे विपक्ष की, जो उनसे सवाल कर सके। विपक्ष की भूमिका राजनीति के लिए हर कदम का विरोध करना नहीं, बल्कि सरकार को जवाबदेह बनाना, रचनात्मक विकल्प पेश करना और उन नीतियों का समर्थन करना है, जो स्पष्ट रूप से राष्ट्रीय हित में हों। 

    भारत आज अपने इतिहास के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। पिछले कई वर्षों में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में, भारत को एक उभरती हुई आॢथक और रणनीतिक शक्ति के रूप में वैश्विक मानचित्र पर मजबूती से स्थापित करने का एक दृढ़ और सफल प्रयास हुआ है। बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे, डिजिटल परिवर्तन, विनिर्माण, अंतर्राष्ट्रीय सांझेदारियों और वैश्विक मंचों पर भारत की आवाज को बुलंद करने पर दिए गए जोर ने एक आत्मविश्वासी और महत्वाकांक्षी राष्ट्र की छवि बनाने में मदद की है। चाहे कोई हर नीति से सहमत हो या न हो, इस बात की व्यापक मान्यता है कि भारत की वैश्विक स्थिति के निर्माण के लिए निरंतरता, स्थिरता और दीर्घकालिक योजना की आवश्यकता होती है। जो देश दुनिया की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनने की इच्छा रखता है, वह लगातार राजनीतिक अनिश्चितता या खंडित शासन को सहन नहीं कर सकता। इसे मजबूत राष्ट्रीय संस्थानों की आवश्यकता है जो सक्षम राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम करते हुए दीर्घकालिक लक्ष्यों को पूरा कर सकें।

    यदि भारत मजबूत राष्ट्रीय दलों, सक्रिय क्षेत्रीय नेतृत्व, एक जिम्मेदार विपक्ष और जाति, पंथ, धर्म एवं व्यक्तिगत हमलों से ऊपर उठने वाली राजनीति के साथ एक राजनीतिक संस्कृति का निर्माण कर सकता है, तो यह न केवल दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बना रहेगा, बल्कि दुनिया के सबसे मजबूत और सम्मानित देशों में से एक बनने की अपनी यात्रा को भी जारी रखेगा, जैसा कि मोदी सरकार सफलतापूर्वक कर रही है।-देवी एम. चेरियन  

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