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    Home»राजनीति»BSP के पारंपरिक वोटों को छिटकने से रोकने की जद्दोजहद में जुटीं मायावती
    राजनीति

    BSP के पारंपरिक वोटों को छिटकने से रोकने की जद्दोजहद में जुटीं मायावती

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inMay 28, 2026
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    लखनऊ: उत्तर प्रदेश में चार बार सत्ता में रही बहुजन समाज पार्टी (बसपा) अब अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही है। अगले साल की शुरुआत में देश में पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव होने की संभावना है। इनमें से तीन राज्य ऐसे हैं जहां बसपा की मौजूदगी है। बसपा के कोर वोटर दलित, पिछड़े वर्गों के लोग और मुस्लिम, बौद्ध आदि अल्पसंख्यक रहे हैं। उत्तर प्रदेश में अब इस सबसे बड़े मतदाता वर्ग पर समाजवादी पार्टी की नजर है। बसपा प्रमुख मायावती ने अपने पारंपरिक वोट बैंक को पार्टी के साथ जोड़े रखने की कोशिशें शुरू कर दी हैं।

    उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब वे तीन राज्य हैं जहां बहुजन समाज पार्टी की मौजूदगी है। इन राज्यों में अगले साल फरवरी-मार्च में विधानसभा चुनाव हो सकते हैं। बहुजन समाज पार्टी अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। बसपा का कोई भी लोकसभा सांसद नहीं है। राज्यसभा में उनके एक मात्र सांसद रामजी गौतम हैं। किसी समय उत्तर प्रदेश में मजबूत राजनीतिक वर्चस्व रखने वालीं मायावती की पार्टी के अब तीन राज्यों में सिर्फ 4 विधायक हैं।

    बसपा के तीन राज्यों में 4 विधायक

    बसपा के उत्तराखंड में दो विधायक मोहम्मद शहजाद (लक्सर विधानसभा क्षेत्र) और सर्वत करीम अंसारी (मंगलौर विधानसभा क्षेत्र) हैं। उत्तर प्रदेश में बसपा के एक मात्र विधायक बलिया की रसड़ा सीट से उमाशंकर सिंह हैं। पंजाब में भी बसपा के एक मात्र विधायक डॉ नछत्तर पाल (नवांशहर सीट) हैं।

    मुस्लिमों को बीएसपी से जोड़ने की कोशिश

    बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने गुरुवार को ईद-उल-अजहा पर मुस्लिम समुदाय को बधाई दी। उन्होंने इस पर्व पर मुस्लिम समुदाय से बसपा के जुड़ाव की बात याद दिलाई और साथ ही सत्ता पक्ष पर वार भी किया।

    मायावती ने अपने संदेश में कहा कि कुर्बानी का यह पाक त्योहार हमें त्याग, भाईचारे और इंसानियत का पैगाम देता है। बसपा के चार बार के शासनकाल में हर घर में बरकत, हर दिल में अमन और हर बस्ती में खुशहाली थी। हमें एक बार फिर वैसा ही प्रदेश बनाना है। बसपा अपनी सर्वसमाज-हितैषी सरकार के लिए आज भी प्रतिबद्ध है। आज जब देश में नफरत की राजनीति हो रही है, भाई को भाई से लड़ाया जा रहा है ईद का यह पैगाम और भी जरूरी हो जाता है।

    बसपा की छोटे समूहों के साथ बैठकों पर जोर

    इसके साथ मायावती बसपा संगठन को मजबूत करने और पार्टी कार्यकर्ताओं के लक्ष्य समुदायों के साथ छोटी-छोटी बैठकें करने पर जोर दे रही हैं। वे उत्तर प्रदेश के साथ उत्तराखंड में भी बसपा संगठन को मजबूत करने के प्रयास में जुटी हैं। उन्होंने बीते रविवार को उत्तर प्रदेश और मंगलवार को उत्तराखंड के बसपा नेताओं के साथ बैठक करके संगठन का जायजा लिया। माना जाता है कि वे आने वाले दिनों में पंजाब में भी इसी तरह की बैठक कर सकती हैं।

    तय समुदायों पर खास ध्यान

    मायावती इन बैठकों में अपने पार्टी कार्यकर्ताओं से बहुजन समुदायों से संपर्क मजबूत करने के लिए कहा। मायावती दलित, ओबीसी, मुस्लिम और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ सवर्ण जातियों के गरीब लोगों से संपर्क बढ़ाने पर जोर दे रही हैं।

    मायावती ने बसपा कार्यकर्ताओं को चेताते हुए विपक्षी दलों से सतर्क रहने को कहा। उनका कहना है कि विपक्षी दल बीएसपी के वोट बैंक को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि कैडर कैंप और छोटे स्तर की बैठकों के जरिए मतदाताओं को भी विपक्ष से सावधान रहने के लिए कहा जाना चाहिए।

    बसपा की उत्तराखंड इकाई में फेरबदल

    बताया जाता है कि मायावती ने उत्तराखंड विधानसभा चुनाव के लिए बसपा संगठन को मजबूत करने और पार्टी के प्रत्याशी के चयन में खास सतर्कता बरतने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने लखनऊ में पार्टी की उत्तराखंड इकाई की समीक्षा बैठक की जिसमें उन्होंने मोहित आनंद को पार्टी का प्रदेश प्रभारी और अनिल कुमार चौधरी को पार्टी संगठन का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया।

    मायावती ने कहा कि उत्तराखंड में मजबूत और साफ छवि वाले उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारना है। उन्होंने पार्टी संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करने पर जोर दिया। मायावती दलित, आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यक समाज के लोगों के बीच संगठन को मजबूत करने की रणनीति पर भी चर्चा की।

    ‘दलित, पिछड़ा, अल्पसंख्यक और गरीब सवर्ण’

    मायावती ने संकेत दिए हैं कि बसपा अगले विधानसभा चुनाव में उसी बहुजन सोशल इंजीनियरिंग मॉडल को अपनाएगी जिसे वह पहले भी अपनाती रही है। उसके इस मॉडल में दलित, पिछड़ा वर्ग, मुस्लिम सहित अन्य धार्मिक अल्पसंख्यक और आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण समुदाय के मतदाता शामिल हैं।

    मायावती की रणनीति इन समुदायों के बीच यह संदेश देन की है कि वे सिर्फ वोट बैंक नहीं हैं। वे सत्ता चलाने वाला वर्ग भी बन सकते हैं। मायवती पार्टी के नेताओं, कार्यकर्ताओं से बड़ी जनसभाएं करने के बजाय छोटे स्तर की बैठकें करने के लिए कह रही हैं।

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