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    Home»संपादकीय»‘निष्कलंक’, इस्तीफा क्यों?
    संपादकीय

    ‘निष्कलंक’, इस्तीफा क्यों?

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inJuly 8, 2026
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    अंतत: राम मंदिर ट्रस्ट को अपने महासचिव रहे चंपत राय बंसल और ट्रस्टी अनिल मिश्रा के इस्तीफे स्वीकार करने पड़े। इस निर्णय में ‘मजबूरी’ झलकती रही, क्योंकि ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरि ने चंपत राय को ‘महापुरुष’ और ‘संत-साधु’ करार दिया। ट्रस्ट ने चंपत को ‘आरोपित’ ही नहीं किया। ट्रस्ट ने बैठक में यह जरूर स्वीकार किया कि राम मंदिर के प्रबंधन में कई खामियां थीं, लिहाजा चंदा-चढ़ावे की चोरी-डकैती संभव हो सकी। कई अनियमितताएं और विसंगतियां थीं, लिहाजा ‘चोर’ ही दान का धन गिनते रहे और 70 बार चोरी करते रहे। यह विशेष जांच दल का शुरुआती निष्कर्ष बताया गया है। इस ‘महापाप’ से सभी आहत, दुखी और लज्जित हैं। राम मंदिर की प्रतिष्ठा पर सवाल उठे हैं, भव्य राम मंदिर की छवि धूमिल, कलंकित हुई है, उसकी भरपाई सिर्फ इस्तीफों से नहीं की जा सकती। चंपत राय और अनिल मिश्रा समेत समूचा ट्रस्ट परोक्ष रूप से दोषी है, आरोपित है, लिहाजा ट्रस्ट को भंग करके नई व्यवस्था तय करनी चाहिए थी। यह प्रतिबद्धता प्रधानमंत्री मोदी और केंद्रीय गृह मंत्रालय की थी, लेकिन जो अंतिम निष्कर्ष सामने आया है, उससे स्पष्ट है कि ट्रस्ट संघ परिवार की ‘बपौती’ है, उसकी प्रशासनिक, धार्मिक ईकाई ही बना रहेगा। वर्चस्व आरएसएस, विहिप और संघवादी संतों का ही रहेगा, लिहाजा संघ के बुनियादी प्रचारक रहे दो चेहरे बाहर करने पड़े, तो उनका विकल्प भी संघवादी कृष्ण मोहन को चुना गया। भारतीय वन सेवा अधिकारी रहे कृष्ण मोहन 2012 से ही आरएसएस में सक्रिय हैं और प्रचारक भी रहे हैं। अब उन्हें राम मंदिर का पवित्र दायित्व सौंपा गया है। अभी उन्हें ‘अंतरिम महासचिव’ कहा जा सकता है। ट्रस्ट ने यह विमर्श नहीं किया कि आखिर चंपत राय और अनिल मिश्रा को इतना निरंकुश और ताकतवर किसने और क्यों बनने दिया गया? उनकी मनमानियां कैसे चलती रहीं? करीब 114 करोड़ रुपए के भूमि-सौदे उन्हें ही क्यों करने दिए गए, जबकि इन जमीनों की कीमत 20-25 करोड़ रुपए आंकी जा रही है? क्या यह बड़ा घोटाला नहीं है?

    ट्रस्ट ‘सामूहिक जिम्मेदारी’ का संगठन होता है, लिहाजा समूचा ट्रस्ट ही बदलना चाहिए था। जो साधु-संत किस्म के चेहरे ट्रस्ट में हैं, उन्हें प्रशासन, प्रबंधन, वित्तीय अंकुश और निगरानी का कोई अनुभव नहीं है, तो फिर करोड़ों रुपए के दान, चंदे, चढ़ावे का दायित्व उन्हें क्यों सौंपा गया? राम मंदिर आंदोलन के दौरान असंख्य लोगों ने योगदान दिया था, ‘राम-राम’ के उद्घोष किए थे, बलिदान भी दिए थे, उनमें से अधिकतर मंदिर की सीमा से बाहर ही हैं। वे भी आज पीडि़त, व्यथित होंगे! आंदोलन की सक्रियता ट्रस्ट में शामिल होने की गारंटी नहीं है। संविधान में तो यह प्रावधान नहीं है कि ट्रस्ट में सिर्फ संघ परिवार की ही सदस्यता होगी। ‘हिंदू’ तो गैर-संघी भी हो सकता है और प्रशासनिक अनुभव का धनी भी हो सकता है, लेकिन राम मंदिर पर संघ का ही ‘अघोषित कब्जा’ है। सवाल यह भी गंभीर है कि चंपत राय को ट्रस्ट से बाहर किया जा रहा था, तो बैठक में उनका अभिनंदन क्यों गाया गया? कोषाध्यक्ष गोविंद देव ने उन्हें ‘निष्कलंक’ और ‘निरापराधी’ माना है। उन्होंने कहा है कि राम मंदिर आंदोलन के दौरान और उसके बाद चंपत राय की सेवाओं, कार्यों, तप-त्याग और भूमिका को भुलाया नहीं जा सकता। चंपत राय से ‘असावधानी’ में भूल हो गई, लिहाजा उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। क्या गोविंद देव कोई ‘न्यायाधीश’ हैं, जो ऐसा फैसला सुनाया है? क्या ट्रस्ट के स्तुतिगान के बाद अब चंपत राय के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज नहीं की जाएगी, उनके खिलाफ केस नहीं बनेगा और वह निष्कलंक होकर अयोध्या से विदा हो सकेंगे? क्या विहिप में वह उपाध्यक्ष के पद पर बने रहेंगे? ऐसे पाक-साफ व्यक्ति का ट्रस्ट ने इस्तीफा क्यों मंज़ूर किया? दरअसल हमें तो ट्रस्ट की बैठक ही प्रायोजित और लीपापोती वाली ज्यादा लगी। हालांकि गोविंद देव ने कुछ बेशकीमती वस्तुएं ही सार्वजनिक की हैं। ऐसी 2926 वस्तुएं बताई जा रही हैं। कानून तो यह भी कहता है कि चांदी को गलाने, दान की गई वस्तुओं का स्वरूप बदलने का अधिकार ट्रस्ट को नहीं है। फिर ऐसा क्यों किया गया? ट्रस्ट ने भारत सरकार की ‘मिंट’ से अनुबंध क्यों किया? ऐसे कई सवाल अब भी अनुत्तरित हैं। देखते हैं कि नई व्यवस्था क्या फैसले लेती है? जहां तक विपक्ष का संबंध है, वह इस मामले पर आंदोलित है और कड़ी से कड़ी कार्रवाई की मांग कर रहा है।

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