संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने ओपेक और ओपेक प्लस से अलगाव की घोषणा की है, तो भारत के लिए कच्चे तेल की आपूर्ति का एक और निश्चित मार्ग खुल गया है। यदि 1 मई को यूएई ओपेक से अलग हो जाता है, तो अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में प्रतिस्पद्र्धा की नई शुरुआत होगी, नतीजतन तेल की कीमतें भी गिरेंगी। ओपेक तेल उत्पादक और निर्यातक देशों का संगठन है। फिलहाल सऊदी अरब उसका नेतृत्व कर रहा है। करीब 59 साल उसका हिस्सा बने रहने के बाद यूएई ने अलग होने का फैसला किया है। उसके कई कारण हैं। ईरान युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग पर ईरान की नाकेबंदी ने खासकर एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमरीका के देशों में गंभीर ऊर्जा-संकट पैदा कर दिया है। ऐसे में यूएई का फैसला कमोबेश भारत के लिए वरदान-सा है। फिलहाल भारत करीब 140 अरब डॉलर का तेल सालाना खरीदता है। यदि तेल के दाम 1 डॉलर कम होते हैं, तो भारत का आयात बिल 10,000 करोड़ रुपए कम हो जाता है। यूएई के फैसले पर अमल किया जाता है, तो भारत सालाना 50,000 करोड़ रुपए से 1 लाख करोड़ रुपए तक की बचत कर सकता है। यह कोई सामान्य राशि नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि यूएई स्वतंत्र रूप से, तेल की कितनी भी मात्रा, भारत को निर्यात कर सकेगा और वह आपूर्ति निर्बाध भी होगी, क्योंकि रास्ता होर्मुज से अलग होगा। भारत अभी सबसे अधिक 15.7 लाख बैरल तेल हररोज रूस से खरीद रहा है। हमारी तेल की जरूरतों में यह रूस की 38 फीसदी से अधिक की हिस्सेदारी है। सऊदी अरब से औसतन 6.22 लाख बैरल कच्चा तेल और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) से 4.35 लाख बैरल तेल हररोज खरीदा जा रहा है। भारत इतना विशाल देश है और उसकी आबादी 147 करोड़ से अधिक, विश्व में सर्वाधिक, है, लिहाजा हमारी तेल-जरूरतें भी व्यापक हैं। रूस, सऊदी, यूएई के अलावा, भारत को अमरीका, अल्जीरिया, अंगोला, कनाडा आदि देशों से भी कच्चा तेल आयात करना पड़ रहा है।
भारत 35-50 फीसदी तेल होर्मुज के रास्ते आयात करता रहा है। करीब 42 फीसदी एलएनजी और 88 फीसदी एलपीजी का आयात भी होर्मुज के रास्ते ही होता रहा है। ईरान युद्ध के बावजूद होर्मुज के रास्ते करीब 40 लाख बैरल ईरानी तेल और अन्य टैंकर भारत पहुंचे हैं। भारत को निरंतर और निर्बाध तेल के आयात की जरूरत है, लिहाजा यूएई ओपेक से अलगाव के बाद जैसे ही अपनी तेल-नीति तय करती है, तो उसमें भारत जैसे ‘रणनीतिक साझेदार’ देश के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता होगी। भुगतान की शर्तें भी लचीली हो सकती हैं और खरीद भारतीय मुद्रा ‘रुपए’ में हो सकती है। ईरान युद्ध के दौरान जब यूएई के तेल ठिकानों और रिफाइनरियों पर हमले किए गए और होर्मुज बंद किए जाने से सप्लाई चेन बाधित हुई, तो उस दौर में ओपेक यूएई के लिए ‘सुरक्षा-कवच’ साबित नहीं हो पाया। सऊदी के साथ तीखी बहसें जारी रहीं, क्योंकि यूएई अपना कोटा बढ़ाने की लगातार मांग कर रहा था और सऊदी उसे खारिज करता रहा था। ओपेक में रहते हुए यूएई अपनी क्षमता का 60-65 फीसदी ही तेल बेच पा रहा था। उत्पादन काफी था और भंडारण सीमित था। अब अलगाव के बाद यूएई अधिक तेल बेच पाएगा और ज्यादा कमाई कर मुनाफा भी हासिल कर सकेगा। भारत के लिए यह शुभ और सीधा-सपाट रास्ता है, क्योंकि अब अबू धाबी क्रूड ऑयल पाइपलाइन से होते हुए सीधा फुजैरा बंदरगाह तक पहुंचेगा। फुजैरा ओमान खाड़ी के तट पर है। वहां से तेल टैंकर सीधे अरब सागर में जाएंगे। होर्मुज पार करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। वहां से भारत के पश्चिमी तट की बंदरगाह बहुत दूर नहीं है। यह वैश्विक ऊर्जा राजनीति के लिए भी सकारात्मक संकेत है। दरअसल ओपेक एक ‘कार्टेल’ है, जो तेल की सप्लाई घटा कर कीमतें ज्यादा रखता है। अमरीकी राष्ट्रपति टं्रप लंबे समय से इसकी आलोचना करते रहे हैं। उनका आरोप है कि ओपेक तेल महंगा कर दुनिया को लूट रहा है। अब यूएई के इससे अलग होने के बाद तेल की कीमतें 5-10 डॉलर प्रति बैरल कम भी हो सकती हैं। यूएई से आपूर्ति बढऩे पर भारत के विकल्प भी बढ़ सकते हैं और वह किसी भी स्थिति में, किसी एक देश, के दबाव में नहीं रहेगा। बहरहाल, तेल की कीमतें बढऩे पर अन्य वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ जाती हैं।

