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    Home»संपादकीय»आर्थिक आपातकाल के आसार
    संपादकीय

    आर्थिक आपातकाल के आसार

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inMay 13, 2026
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    क्या भारत आर्थिक संकट की ओर बढ़ रहा है? क्या आर्थिक आपातकाल के आसार हैं और भारत सरकार कुछ कड़े और बड़े फैसले ले सकती है? क्या कुछ पाबंदियां भी चस्पां की जा सकती हैं? क्या प्रधानमंत्री मोदी की अपील देश के आम आदमी के लिए ही है? नेताओं की जमात के लिए ‘बचत’ अपरिहार्य क्यों नहीं है? हमने प्रधानमंत्री की अपील और हिदायतों का विश्लेषण किया था। उसका दूसरा पक्ष यह है कि देश की आर्थिक सेहत का मूल्यांकन करने वाली संस्थाओं-रिजर्व बैंक, मूडीज, एसएंडपी, विश्व बैंक, फिच और एशियन डवलपमेंट बैंक-ने भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की विकास दर घटा दी है। जाहिर है कि हमारी अर्थव्यवस्था में संकुचन आया है। वैसे भी भारत अब विश्व की चौथी नहीं, छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। इसमें और भी गिरावट के आसार हैं। यह मूल्यांकन आसन्न आर्थिक संकट का पहला संकेत है। खुद प्रधानमंत्री ने माना है कि कोरोना महामारी वैश्विक संकट थी, तो ईरान युद्ध इस दशक का सबसे बड़ा संकट है। प्रधानमंत्री मोदी ने आर्थिक संकट और पेट्रो उत्पादों की कमी के कारण देश से अपील नहीं की है। वह न ही किसी तरह के ‘दान’ के पक्ष में हैं, जैसा कि जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री कालों के दौरान किया गया था। प्रधानमंत्री आयात कम करने के पक्षधर हैं, ताकि विदेशी मुद्रा को बचाया जा सके। ईरान युद्ध की शुरुआत में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 720 अरब डॉलर का था, लेकिन युद्ध के करीब 75 दिन के बाद यह भंडार घट कर 690 अरब डॉलर हो गया है, लिहाजा प्रधानमंत्री ने उन खर्चों को कम करने की अपील की है, जिनमें डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। करीब 80 फीसदी कच्चे तेल और 70 फीसदी से अधिक सोने के आयात डॉलर में ही किए जाते हैं।

    डॉलर के मुकाबले भारतीय मुद्रा ‘रुपए’ में 95.28 तक की ऐतिहासिक गिरावट ने संकट को गहरा दिया है। इस समय ‘रुपया’ दुनिया की दूसरी सबसे कमजोर मुद्रा है, जिसमें 12 फीसदी अवमूल्यन हुआ है। प्रधानमंत्री ने एक साल तक सोना न खरीदने की अपील की है, लेकिन भारत सरकार ने विदेशों से 168 टन सोना खरीदा है। अब भारत के पास सोने का कुल भंडार 880 टन का है। इसे ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ से जोड़ कर आंका जा रहा है। दरअसल हमारा बुनियादी सवाल सरकारी व्यवस्था और नेताओं की जमात से है। देश में प्रधानमंत्री, मंत्री, मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और आम अति विशिष्ट चेहरे भी लंबे-चौड़े काफिलों के साथ चलते हैं। यदि वाकई संकट के हालात हैं, तो मुख्यमंत्री और मंत्री सरकारी हेलीकॉप्टर पर सवार क्यों रहते हैं? क्या हवाई उड़ानें ‘पानी’ से चलती हैं? हमारे जन-प्रतिनिधि रेलगाड़ी के विशेष कक्ष में सफर क्यों नहीं कर सकते? यदि सार्वजनिक परिवहन नेताओं के लिए ‘असुरक्षित’ हैं, तो रेलवे में असंख्य यात्रियों की सुरक्षा दांव पर क्यों लगा रखी है? हम प्रधानमंत्री को अपवाद के तौर पर छोड़ देते हैं, क्योंकि वह देशहित में, देश के लिए ही, सर्वोच्च कार्यकारी अधिकारी के तौर पर ‘विशेष वाहन’ का इस्तेमाल करते हैं और अब मई में ही 5 देशों की यात्रा पर जाएंगे, लेकिन हम प्रधानमंत्री के ‘रोड शो’ पर सवाल और आपत्ति जरूर करेंगे। हमारा राजनीतिक नेतृत्व पहल करे, बचत के नए आयाम स्थापित करे, आम जन-प्रतिनिधि बने, तो यह देश भी उसका अनुसरण करेगा। दरअसल युद्ध और होर्मुज जलमार्ग बंद होने के कारण ऊर्जा-संकट दुनिया भर में है। कच्चा तेल महंगा मिलने के कारण भारत को हररोज 1619 करोड़ रुपए अतिरिक्त खर्च करने पड़ रहे हैं। आयात बिल में खाद्य तेल पर 1.86 लाख करोड़ और खाद पर 1.38 लाख करोड़ रुपए खर्च करने पड़ते हैं। बाजार में यूरिया, डीएपी की कीमतें दोगुनी बढ़ा दी गई हैं। इसके अलावा, सरकार को खाद पर करीब 2 लाख करोड़ रुपए की सबसिडी किसानों को देनी पड़ रही है। नतीजतन बुनियादी ढांचे और विकास पर किया जाने वाला पूंजीगत खर्च कम करना पड़ रहा है। चालू खाते का घाटा बढ़ सकता है। तमाम आयातों पर विदेशी मुद्रा खर्च होती है। यह ‘अकाल’ हम 1990-92 के दौर में झेल चुके हैं, जब देश का 67 टन सोना गिरवी रखना पड़ा था।

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