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    Home»अजब गजब»वो दौर, जब डाक से भेजे जाते थे बच्चे! चिट्ठी की तरह पोता-पोती डिलीवर करता था डाकिया
    अजब गजब

    वो दौर, जब डाक से भेजे जाते थे बच्चे! चिट्ठी की तरह पोता-पोती डिलीवर करता था डाकिया

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inApril 30, 2026
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    आजकल हम ऑनलाइन शॉपिंग करते हैं और घर बैठे सामान मंगवाते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि 100 साल पहले अमेरिका में लोग अपने बच्चों को भी डाक से भेज दिया करते थे? हां, ये बिल्कुल सच है. 1913 में जब अमेरिकी पोस्टल सर्विस ने पार्सल पोस्ट सेवा शुरू की, तो कुछ परिवारों ने इसका अनोखा फायदा उठाया.

    लोगों ने अपने बच्चों को चिट्ठी या पार्सल की तरह पैक करके दूसरे शहर या गांव भेजना शुरू कर दिया. ज्यादातर लोग अपने बच्चों को पोस्ट से दादी या नानी घर भेजते थे. इसका सबसे पहला रिकार्डेड मामला जनवरी 1913 का है, जब ओहियो के जेसी और मैथिल्डा बीगल दंपति ने अपने 8 महीने के बेटे जेम्स को अपनी दादी के घर भेजा था. बच्चे का वजन सिर्फ 10 पाउंड था. माता-पिता ने 15 सेंट के स्टांप लगाए और 50 डॉलर का बीमा भी करा लिया. रूरल मेल कैरियर ने बच्चे को सुरक्षित उसके दादी के घर पहुंचा दिया, जो सिर्फ एक मील दूर था.

    सामने आए कई मामला
    बच्चों को पार्सल करने का सबसे प्रसिद्ध मामला 19 फरवरी 1914 का है. इडाहो की 5 वर्षीय शार्लोट मेय पियरस्टॉर्फ (May Pierstorff) को उसके माता-पिता ने दादी के घर भेजा था. ग्रेंजविले से लेविस्टन तक की दूरी लगभग 73 मील थी. ट्रेन टिकट महंगा पड़ रहा था, इसलिए उन्होंने पार्सल पोस्ट का सहारा लिया. मेय के कोट पर 53 सेंट (कुछ रिपोर्ट्स में 32 सेंट) के स्टांप लगाए गए. उसे “बेबी चिक” के रूप में क्लासिफाई किया गया. मेय की मां के कजिन, जो रेलवे मेल क्लर्क थे, पूरे रास्ते उसके साथ रहे और उसे सुरक्षित दादी के घर पहुंचाया. मेय का वजन उस समय 48.5 पाउंड था, जो पार्सल पोस्ट की 50 पाउंड की लिमिट के अंदर था. पूरा सफर मेल कार में हुआ. वह डाकिया के साथ बैठी रही, खाना शेयर किया और बिना किसी समस्या के पहुंच गई. इस घटना पर बाद में बच्चों की किताब “Mailing May” भी लिखी गई. ये मामले दुर्लभ नहीं थे. 1913 से 1915 के बीच कम से कम 7-8 ऐसे दस्तावेजी मामले सामने आए.

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