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    Home»लेख-आलेख»परिवर्तन से गुजरती परंपरा: भारतीय हस्तशिल्प गढ़ रहे हैं आधुनिक डिजाइन की पहचान- श्री पबित्रा मार्गेरिटा -आर्टिकल
    लेख-आलेख

    परिवर्तन से गुजरती परंपरा: भारतीय हस्तशिल्प गढ़ रहे हैं आधुनिक डिजाइन की पहचान- श्री पबित्रा मार्गेरिटा -आर्टिकल

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inDecember 10, 2025
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    परिवर्तन को दर्ज करने वाला क्षण
    ग्रामीण असम में शिल्पकारों की एक बस्ती की हाल की यात्रा के दौरान एक सामान्य से दृश्य में भारत के हस्तशिल्प तंत्र में आ रहे गहरे बदलाव की झलक दिखाई दी। अनेक शिल्पकार सूखी हुई जलकुंभी को बुन रहे थे। लेकिन ये शिल्पकार वे परंपरागत टोकरियां नहीं बना रहे थे जिन्हें उनका समुदाय सदियों से बुनता आ रहा है। इसके बजाय वे कॉरपोरेट बैठकों के लिए खूबसूरत ऑफिस फोल्डर बना रहे थे। उनके हाथ पीढ़ियों से जारी कला को आगे बढ़ाते हुए चिरपरिचित लय में चल रहे थे। लेकिन उनके उत्पाद और उद्देश्य, दोनों ही पूरी तरह से बदल चुके हैं।
    हम 08 से 14 दिसंबर, 2025 तक राष्ट्रीय हस्तशिल्प दिवस मना रहे हैं। ऐसे में, यह दृश्य भारत के हस्तशिल्प परिदृश्य में एक मूक क्रांति का प्रतीक है। हमारी जीवंत हस्तशिल्प परंपराओं में एक महत्वपूर्ण बदलाव आ रहा है। उनका नई जगहों, नए बाजारों और नूतन भविष्य में विस्तार हो रहा है। मूल विशेषताओं की शुद्धता बरकरार रहने के बावजूद माध्यमों और स्वरूपों में जो विकास हो रहा है उसकी कल्पना एक दशक पहले शायद ही की जा सकती थी।
    जीवंत ज्ञान प्रणाली के रूप में हस्तशिल्प
    इस विकास को समझने के लिए यह स्वीकार करना महत्वपूर्ण है कि भारतीय हस्तशिल्प सिर्फ सुंदरता की वस्तु नहीं रहे हैं। वे सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक परंपराओं में गहराई से रची-बसी जीवंत ज्ञान प्रणालियां हैं। मधुबनी में महिलाएं परंपरागत तौर पर त्यौहारों, शादियों और जीवन संस्कारों के दौरान ताजा लेपी गई दीवारों पर चावल के पेस्ट से पेंटिंग बनाती थीं। इन चित्रों में मछली को जनन क्षमता और मोर को प्रेम का प्रतीक माना जाता था। चित्रण अपने मूल में व्यक्तिगत के बजाय सामूहिक हुआ करता था। गोंड समुदाय के लिए पेंटिंग उसके जीव संबंधी विश्वासों तथा जंगलवासी प्राकृतिक शक्तियों और रक्षा करने वाली आत्माओं से जुड़ी है। उनकी कला सिर्फ सुंदर ही नहीं, बल्कि वाचक परंपरा में जड़ों वाला अनुष्ठानिक ब्रह्मांड विज्ञान भी है।
    स्वरूपों को हमेशा उपयोग ने गढ़ा है। असम में जलकुंभी को सुखाने के बाद बुन कर घर में काम आने वाली टोकरियां बनाई जाती हैं। कर्नाटक में लाख के लेप वाले चन्नपटना काष्ठ खिलौने बच्चों के खेलने के काम आते हैं। उन्हें पीढ़ियों से खराद पर बनाया जाता रहा है। माध्यम, स्वरूप और आकृति को एकदूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। वे विशिष्ट अनुष्ठानिक और कार्यात्मक संदर्भों से आबद्ध हैं।
    परंपरा का आधुनिक अभिव्यक्ति में विस्तार
    आज जो हो रहा है, वह परंपरा से अलग नहीं, बल्कि उसका विस्तार है। मूलभाव, पैटर्न और तकनीकें अभी भी पहचानी जा सकती हैं, लेकिन उनके प्रयोग आश्चर्यजनक रूप से समकालीन हो गए हैं। यह बदलाव केवल एक आयामी नहीं, बल्कि बहु-आयामी है। मधुबनी की मछली, जो कभी एक बड़ी प्रजनन कथा का हिस्सा हुआ करती थी, अब तकिए, टोट बैग और फोन कवर पर दिखाई देती है, जिसे आज के समय के अनुसार इस्तेमाल के लिए नया रूप दिया गया है। गोंड के गहरे रंगों वाले जानवर और पौधे और ज्यामिति डिज़ाइन आज अपने पौराणिक संदर्भ से बाहर भी सराहे जाते हैं।
    हालांकि, सबसे बड़ा परिवर्तन माध्यम में आया है। जलकुंभी आज कॉर्पोरेट फ़ोल्डर और डिज़ाइनर हैंडबैग का रूप ले रही है। मधुबनी कला मिट्टी की दीवारों से हटकर लकड़ी के फर्नीचर, वस्त्रों और चमड़े के सहायक उपकरणों पर की जाने लगी है। चन्नपटना शिल्प, जो कभी केवल खिलौनों में ही दिखता था, अब सजावटी नक्शों, झूमरों, गृह सज्जा और डिज़ाइनर फ़र्नीचर में दिखाई देता है। पारंपरिक लाख का अभी भी इस्तेमाल हो रहा है लेकिन उसका रूप पूरी तरह आधुनिक हो गया है। यह बदलाव आज के अनुकूल है, न कि उसका कमजोर पड़ना।
    भारतीय शिल्प पर आधारित फैशन की वैश्विक स्तर पर एक प्रमुख पहचान बन गयी है, जिसमें पारंपरिक कढ़ाई को ‘पेरिस हौते कॉउचर वीक’ में प्रदर्शित किया गया था। नेशनल गैलरी ऑफ विक्टोरिया जैसे संग्रहालयों में अब “ट्रांसफ़ॉर्मिंग वर्ल्ड्स” जैसी प्रदर्शनियाँ गोंड और मधुबनी कला और उनके आधुनिक रूपों को उनकी संस्कृति या समाज के संदर्भों के बजाय समकालीन कला के तौर पर चित्रित कर रही हैं।
    नेतृत्व और सरकारी हस्तक्षेप परिवर्तन को गति दे रहे हैं
    इस परिवर्तन को राष्ट्रीय नेतृत्व और रणनीतिक सरकारी हस्तक्षेपों से महत्वपूर्ण समर्थन मिला है। माननीय प्रधानमंत्री के नेतृत्व ने इस आंदोलन को असाधारण गति दी है। उनका ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘लोकल टू ग्लोबल’ का बार-बार किया गया आह्वान कारीगरों के प्रति उनके गहरे लगाव को दर्शाता है। वह हमेशा नागरिकों से स्थानीय उत्पाद खरीदने का आग्रह करते हैं, जैसा कि उन्होंने स्वयं कहा है कि: “जब हम ऐसा करते हैं, तो हम केवल सामान नहीं खरीदते हैं; हम एक परिवार के लिए आशा लाते हैं, एक कारीगर की कड़ी मेहनत का सम्मान करते हैं, और एक युवा उद्यमी के सपनों को पंख देते हैं।” उन्होंने अपने नवीनतम “मन की बात” संबोधन में बताया कि वह विश्व के नेताओं के साथ मुलाकातों के दौरान जानबूझकर हाथ से बने भारतीय उत्पादों को ही उपहार के रूप में क्यों देते हैं। ऐसा करके वह यह सुनिश्चित करते हैं कि वह जहाँ भी जाएँ उनके साथ साथ भारत की समृद्ध शिल्प विरासत भी जाये। उन्होंने कहा की कि यह केवल प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि यह उनकी ओर से भारत की कलात्मक विरासत को प्रदर्शित करने का एक तरीका है ताकि हमारे कारीगरों की प्रतिभा को दुनिया भर के सामने लाया जा सके।
    विभिन्न सरकारी पहलें इस परिवर्तन को गति दे रही हैं। वस्त्र मंत्रालय, विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) के माध्यम से, राष्ट्रीय हस्तशिल्प विकास कार्यक्रम के तहत कारीगरों को कौशल विकास, क्लस्टर-आधारित प्रशिक्षण कार्यक्रम, विपणन सहायता, अवसंरचना और प्रौद्योगिकी सहायता और ऋण उपलब्ध कराकर सीधे सहायता प्रदान कर रहा है। राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान(निफ्ट) ने भारत भर में अपने 19 परिसरों के माध्यम से, शिल्पकारों और समकालीन डिजाइनरों के बीच सेतु का निर्माण किया है ताकि आधुनिक डिजाइनों में हमारी परम्परा की झलक भी मिल सके। भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री ने 366 से अधिक हस्तशिल्पों को संरक्षित किया है। इससे सामुदायिक प्रतिभा की सुरक्षा सुनिश्चित होती है और उन्हें सही में मान्यता मिलती है।
    मैं असम राज्य से हूँ, वहां के कई पारंपरिक हस्तशिल्पों जैसे कि सर्थेबारी मेटल क्राफ्ट, माजुली मास्क, बिहू ढोल, जापी, पानी मेतेका, आशारिकांदी टेराकोटा और बोडो समुदाय के कई अन्य हस्तशिल्पों को हाल ही में भौगोलिक संकेत (जीआई टैग) पंजीकरणों की मान्यता मिली है जो कि बहुत लंबे समय से अपेक्षित थी। प्रत्येक पंजीकरण यह दर्शाता है कि कैसे असम या पूरे भारत के हर कोने में विविधता की झलक मिलती है जो दशकों तक उपेक्षित रहने के बाद, आज राष्ट्रीय मंच पर एक नया स्थान पा रही है।
    विकसित भारत के लिए एक गतिशील और विकसित होती विरासत
    भारत के हस्तशिल्प विकास में सबसे बड़ा सबक यह है कि परंपरा स्थिर नहीं है बल्कि यह अनुकूलित होती है, अवशोषित होती है और आगे बढ़ती है। जलकुंभी की घरेलू टोकरियों से लेकर अन्य वैश्विक सामानों तक की यात्रा हमारे कारीगर समुदायों के व्यवहारिकता और रचनात्मकता का प्रतीक है। जैसे-जैसे भारत 2047 तक विकसित भारत के अपने दृष्टिकोण को साकार करने की ओर बढ़ रहा है, वैसे ही हस्तशिल्प क्षेत्र विरासत और नवोन्मेष, ग्रामीण आजीविका और वैश्विक आकांक्षा, पहचान और आधुनिकता के एक शक्तिशाली चौराहे पर खड़ा है।
    यह आंदोलन जैसे-जैसे मज़बूत होता जा रहा है, हम सबकी भी ज़िम्मेदारी बनती है कि हर कारीगर को सशक्त बनाया जाए और हमारी प्रत्येक परंपरा फलती-फूलती रहे। भारत की हस्तशिल्प विरासत सिर्फ़ एक याद बनकर नहीं रहनी चाहिए, बल्कि हमारी पहचान एक जीवित अभिव्यक्ति के रूप में फलनी-फूलनी चाहिए। हर बार जब कोई परिवार स्थानीय चीज़ें चुनता है या हर बार जब कोई डिज़ाइनर किसी हस्तशिल्प समूह के साथ भागीदारी करता है, तो वह आत्मनिर्भर भारत की भावना को ही आगे बढ़ाता है। ये वही सधे हुए सृजनशील और सदियों की समझदारी से संजोये हुए हाथ है जो भारत की आने वाली पीढ़ियों का मार्ग दर्शन करेंगे।

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