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    Home»राष्ट्रीय»कारगिल युद्ध मे 16000 फीट पर फहराया था तिरंगा, ‘लद्दाख के शेर’ महावीर चक्र विजेता कर्नल सोनम वांगचुक का निधन
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    कारगिल युद्ध मे 16000 फीट पर फहराया था तिरंगा, ‘लद्दाख के शेर’ महावीर चक्र विजेता कर्नल सोनम वांगचुक का निधन

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inApril 10, 2026
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    श्रीनगर। लद्दाख के शेर का आज निधन हो गया। भारतीय सेना के कारगिल युद्ध के वेटरन और महावीर चक्र पाने वाले कर्नल सोनम वांगचुक (रिटायर्ड) ने आज सुबह हार्ट अटैक से आखिरी सांस ली।

    कर्नल (तब मेजर) सोनम वांगचुक को ऑपरेशन विजय (कारगिल युद्ध) के दौरान उनकी ज़बरदस्त हिम्मत और शानदार लीडरशिप के लिए महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था।

    कर्नल वांगचुक कारगिल युद्ध के सच्चे नायक थे। उन्होंने 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान लद्दाख स्काउट्स की 4वीं बटालियन का नेतृत्व किया था। लोगों उन्हे लद्दाख का शेर इसलिए कहते थे क्योंकि उन्होंने हाई-एल्टीट्यूड ऑपरेशन में 40 सैनिकों की एक यूनिट को लीड करने के बाद, कर्नल वांगचुक ने बहुत खराब हालात में, गहरी बर्फ में तीन दिन की लड़ाई में 136 पाकिस्तानी सैनिकों को सफलतापूर्वक खदेड़ दिया।

    उन्होंने लगभग 18,000 फीट की ऊंचाई पर किए गए मिशन में अहम भूमिका निभाई और इसके लिए उन्हें महावीर चक्र मिला। इस मिशन को लड़ाई के दौरान भारतीय सेना की शुरुआती बड़ी सफलताओं में से एक माना जाता है।

    पूर्व कमांडर कर्नल जोशी ने जताया शोक

    भारतीय सेना के पूर्व कमांडर कर्नल योगेंद्र कुमार जोशी यह खबर सबसे पहले शेयर की, जिन्होंने देश को हुए नुकसान पर गहरा दुख जताया। उन्होंने एक्स पर शोक संदेश लिखते हुए कहा कि कर्नल सोनम वांगचुक, MVC के अचानक निधन के बारे में जानकर बहुत दुख हुआ, जिन्होंने आज सुबह हार्ट अटैक से आखिरी सांस ली। बहादुर सैनिक को मेरी गहरी श्रद्धांजलि! महावीर चक्र पाने वाले कर्नल वांगचुक कारगिल युद्ध के सच्चे हीरो थे। उनकी लगन, बहादुरी, बिना किसी स्वार्थ के सेवा को हमेशा याद रखा जाएगा।

    वांगचुक ने 30 वर्ष से अधिक की सेना में सेवा

    कर्नल वांगचुक का जन्म 11 मई, 1964 को लद्दाख के लेह जिले के शंकर गांव में हुआ था। उन्होंने अपनी ज़िंदगी के 30 से ज़्यादा साल मिलिट्री सर्विस को दिए और 2018 में रिटायर हुए। कर्नल वांगचुक ने कारगिल युद्ध के दौरान चोरबाट ला दर्रे पर कब्जा कर भारत को महत्वपूर्ण रणनीतिक जीत दिलाई थी।

    उन्होंने लद्दाख स्काउट्स के जवानों का नेतृत्व किया और बेहद दुर्लभ और खतरनाक मौसम और परिस्थितियों में पाकिस्तानी सैनिकों को पीछे धकेल दिया और ऊंचाई पर स्थित दुश्मन की चौकियों पर कब्जा किया। जिसके लिए ही उन्हें भारत के दूसरे सर्वोच्च सैन्य सम्मान ‘महावीर चक्र’ से सम्मानित किया गया.

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