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    Home»लेख-आलेख»भाजपा का आक्रामक अभियान के सामने क्या कांग्रेस टिक पाएगी?
    लेख-आलेख

    भाजपा का आक्रामक अभियान के सामने क्या कांग्रेस टिक पाएगी?

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inJune 24, 2026
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    नई दिल्ली की राजनीति इन दिनों किसी रणभूमि से कम नहीं दिखती। राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप और उंगलियां उठाने में व्यस्त हैं। जन-नैतिकता और व्यावहारिक राजनीति का ऐसा विचित्र मिश्रण देखने को मिल रहा है, जहां दल-बदल और टूटती निष्ठाएं राजनीति की नई पहचान बनती जा रही हैं। सत्ता की मंजिल तक पहुंचना ही लक्ष्य है, फिर रास्ता चाहे जैसा भी हो।

    हाल के विधानसभा चुनावों के परिणामों तथा तृणमूल कांग्रेस, शिवसेना और आम आदमी पार्टी में हुई टूट-फूट ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को अपनी प्रमुख प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस को और कमजोर करने का अवसर दिया है। 2024 के लोकसभा चुनावों में पुनर्जीवन के संकेत देने वाली कांग्रेस को भाजपा अब फिर से घेरने की रणनीति पर काम कर रही है। भाजपा के लिए ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ का लक्ष्य अभी भी राजनीतिक एजैंडे का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में कांग्रेस को ‘परजीवी पार्टी’ बताते हुए आरोप लगाया कि वह अपने सहयोगियों तक के साथ विश्वासघात कर सकती है।

    भाजपा की आक्रामकता के पीछे 2024 के चुनावों में अपेक्षा से कम प्रदर्शन और अप्रैल 2026 में लोकसभा में महिलाओं के आरक्षण को परिसीमन से जोडऩे वाले संविधान संशोधन (131वां) विधेयक को पर्याप्त समर्थन न मिल पाने जैसी परिस्थितियां भी मानी जा रही हैं। इन घटनाओं ने भाजपा को अपनी संसदीय ताकत और बढ़ाने के लिए प्रेरित किया है। इसी रणनीति के तहत भाजपा असंतुष्ट क्षेत्रीय दलों के सांसदों को अपने पक्ष में लाने, विपक्षी दलों में विभाजन को बढ़ावा देने तथा कांग्रेस को राजनीतिक रूप से अलग-थलग करने के प्रयासों में जुटी दिखाई देती है। इसके साथ ही विपक्ष के नेता राहुल गांधी की राजनीतिक स्वीकार्यता को सीमित करने और कांग्रेस के पारंपरिक समर्थन आधार को कमजोर करने की कोशिश भी जारी है।

    नि:संदेह, कांग्रेस की वर्तमान स्थिति एक दशक पहले की तुलना में बेहतर है। 2024 के लोकसभा चुनाव में 99 सीटें जीतकर उसने 2014 के बाद अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। वह अब भी राष्ट्रीय स्तर पर सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है और इंडिया गठबंधन की प्रमुख धुरी बनी हुई है, हालांकि तृणमूल कांग्रेस और द्रमुक से जुड़े घटनाक्रमों के बाद गठबंधन के भीतर तनाव बढ़ा है। राहुल गांधी के समर्थकों का मानना है कि उनके नेतृत्व में कांग्रेस ने अपनी राजनीतिक पहचान और सक्रियता को फिर से स्थापित किया है। उनका कहना है कि लगातार आलोचनाओं और सोशल मीडिया अभियानों के बावजूद राहुल गांधी अपने वैचारिक रुख पर अडिग रहे हैं।

    कांग्रेस के भीतर नेतृत्व परिवर्तन की मांग भी समय-समय पर उठती रही है। आलोचकों का तर्क है कि पार्टी को गांधी परिवार पर अत्यधिक निर्भरता से बाहर निकलना होगा। उनका कहना है कि पार्टी की कार्यप्रणाली अब भी नामांकन-आधारित संस्कृति और वफादारी की राजनीति से प्रभावित है, जहां असहमति को अक्सर विश्वासघात के रूप में देखा जाता है। कांग्रेस की एक और बड़ी चुनौती आंतरिक गुटबाजी है। कई राज्यों में दल-बदल और कमजोर संगठनात्मक ढांचे ने पार्टी को नुकसान पहुंचाया है। सहयोगी दलों के साथ रिश्तों में भी तनाव देखने को मिला है, जिसका ताजा उदाहरण द्रमुक के साथ विवाद रहा। हालांकि केवल नेतृत्व परिवर्तन से समस्या का समाधान नहीं होगा। पार्टी को राज्यों में मजबूत नेतृत्व विकसित करना होगा और युवा मतदाताओं तथा क्षेत्रीय सहयोगियों को आकॢषत करने के लिए नए राजनीतिक चेहरों को आगे लाना होगा। राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा को चुनौती देने की कांग्रेस की क्षमता क्षेत्रीय दलों की मजबूती और एकता पर भी निर्भर करती है। यदि क्षेत्रीय दल लगातार कमजोर होते हैं या उनके प्रभावशाली नेता भाजपा-नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एन.डी.ए) में शामिल होते हैं, तो कांग्रेस के सामने कई कठिनाइयां खड़ी हो सकती हैं। 

    जब विभिन्न दल राष्ट्रीय रणनीति की बजाय राज्य-स्तरीय हितों को प्राथमिकता देते हैं, तब सांझा विपक्षी मोर्चे को बनाए रखना कठिन हो जाता है। यही कारण है कि इंडिया गठबंधन समय-समय पर तनाव का सामना करता रहा है। यदि क्षेत्रीय दलों का विखंडन जारी रहता है और वे भाजपा की ओर झुकते हैं, तो कांग्रेस की राष्ट्रीय सत्ता में वापसी का रास्ता और कठिन हो सकता है। 

    राहुल गांधी के नेतृत्व को लेकर भी आलोचकों का कहना है कि उनकी अगुवाई अभी तक कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर निर्णायक पुनरुत्थान दिलाने में सफल नहीं रही। पार्टी कई राज्यों में अपना जनाधार बढ़ाने में विफल रही है। इतिहास बताता है कि सफल राजनीतिक दल समय-समय पर नेतृत्व परिवर्तन, संगठनात्मक सुधार और मजबूत क्षेत्रीय नेतृत्व के उदय के माध्यम से स्वयं को पुनर्जीवित करते हैं। कांग्रेस आज भी प्रासंगिक है और पुनरुत्थान की प्रक्रिया में दिखाई देती है लेकिन उसे अभी पुनर्जागरण की अवस्था में नहीं कहा जा सकता। पार्टी को यह समझना होगा कि स्वस्थ राजनीतिक व्यवस्था का आधार नियमित, स्वतंत्र और निष्पक्ष आंतरिक चुनाव होते हैं। दीर्घकाल में वंशवादी राजनीति पार्टी के लिए नुकसानदेह सिद्ध हो सकती है। अब समय कांग्रेस के लिए आत्ममंथन का है।-पूनम आई. कौशिश 

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