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    Home»अंतर्राष्ट्रीय»जंग रुकने के बाद गाजा में आया पहला रमजान,जंग की तबाही में अपना बचपन खो चुके गाजा के बच्चों के चेहरों पर खुशी है और थोड़ी राहत भी…
    अंतर्राष्ट्रीय

    जंग रुकने के बाद गाजा में आया पहला रमजान,जंग की तबाही में अपना बचपन खो चुके गाजा के बच्चों के चेहरों पर खुशी है और थोड़ी राहत भी…

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inFebruary 19, 2026
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    रमजान का पाक महीना गाजा के लोगों के लिए एक उम्मीद लेकर आया है, उम्मीद इस बात की कि वक्त बदलेगा, उम्मीद इस बात की कि उपर वाले का करम होगा और गाजा तबाही का पर्याय भर नहीं रह जाएगा. पाक महीना के शुरू होने के साथ गाजा सिटी में ढही हुई इमारतों और मलबे के ढेरों से सजी सड़कों पर छोटे-छोटे लालटेन और स्ट्रिंग लाइट्स दिखाई देने लगी हैं. जंग की तबाही में अपना बचपन खो चुके गाजा के बच्चों के चेहरों पर खुशी है और थोड़ी राहत भी. हो भी क्यों नहीं, बीते साल अक्टूबर में हुए युद्धविराम के बाद का यह पहला रमजान जो है.

    एएफफी की रिपोर्ट के अनुसार ओमारी मस्जिद में दर्जनों नमाजियों ने रमजान की पहली सुबह फज्र की नमाज अदा की. कालीन पर उनके पैर नंगे थे, लेकिन सर्दी से बचने के लिए उन्होंने भारी जैकेट पहन रखी थीं. गाजा सिटी के रहने वाले अबू आदम भी नमाज पढ़ने आए थे. उन्होंने एएफपी से कहा, “कब्जे, मस्जिदों और स्कूलों के विनाश और हमारे घरों को गिराए जाने के बावजूद… हम इन कठिन हालात में आए हैं.”

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    उन्होंने कहा, “बीती रात भी, जब इस इलाके को निशाना बनाया गया, तब भी हम अल्लाह की इबादत के लिए मस्जिद जाने के अपने इरादे पर कायम रहे.”

    गाजा के एक सुरक्षा सूत्र ने बुधवार को एएफपी को बताया कि उस सुबह गाजा सिटी के पूर्वी इलाकों में तोपों से हमले किए गए थे. सूत्र ने यह भी कहा कि मध्य गाजा के एक शरणार्थी शिविर को भी तोपों से निशाना बनाया गया. बता दें कि इजरायल अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों को गाजा पट्टी में प्रवेश की अनुमति नहीं देता. इसकी वजह से मरने वालों के आंकड़ों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो पाती है.

    अक्टूबर 2025 में अमेरिका की मध्यस्थता से हुए युद्धविराम (सीजफायर) के बाद भी गाजा के दक्षिण में हजारों लोग अभी तक टेंट और अस्थायी सेल्टर में रह रहे हैं. उन्हें इंतजार है कि उनके इलाके में पुनर्निर्माण किया जाएगा. अल-मवासी इलाके में एक टेंट में रहने वाली निविन अहमद ने एएफपी से कहा कि युद्ध के बिना यह पहला रमजान है और यह हमारे लिए “मिले-जुले और अलग-अलग एहसास” लेकर आया है.

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    उन्होंने कहा, “खुशी दब गई है. हमें उन लोगों की याद आती है जो शहीद हो गए, अब भी लापता हैं, हिरासत में हैं या कहीं चले गए हैं.” 50 साल के निविन अहमद ने कहा, “पहले रमजान के वक्त टेबल हर तरह के स्वादिष्ट पकवानों से भरा रहता था. हमारे सभी अपने लोग साथ होते थे. लेकिन आज मैं मुश्किल से एक मेन डिश और एक साइड डिश बना पाती हूं. सब कुछ महंगा है. मैं न तो इफ्तार पर और न ही सहरी पर किसी को बुला सकती हूं.”

    उन्होंने बताया कि उनका परिवार और पड़ोसी सहरी के लिए खाना तैयार करते समय और रमजान की सजावट लगाते हुए खुशी के पल साझा कर पा रहे हैं. “हर कोई रमजान के माहौल को तरस रहा है. सजावट और बाजारों की चहल-पहल देखकर हमें स्थिरता की वापसी की उम्मीद मिलती है.”

    वहीं मध्य गाजा के देर अल-बलाह के समुद्र तट पर, फिलिस्तीनी कलाकार यजीद अबू जराद ने अपनी कला से रमजान का माहौल बनाया. भूमध्य सागर के पास रेत में उन्होंने अरबी में सुंदर से “वेलकम रमजान” उकेरा, जिसे पास के तंबू शिविर के बच्चे उत्सुकता से देख रहे थे.

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    बता दें कि इजरायल और हमास के बीच दो साल से अधिक समय तक चले युद्ध के दौरान, गाजा के करीब 22 लाख निवासियों में से लगभग सभी लोग कम से कम एक बार विस्थापित हुए. यह युद्ध 7 अक्टूबर को हमास के हमले के बाद शुरू हुआ था.

    43 साल के मोहम्मद अल-मधून भी गाजा सिटी के पश्चिम में एक तंबू में रहते हैं और बेहतर दिनों की उम्मीद करते हैं. उन्होंने कहा, “मुझे उम्मीद है कि यह आखिरी रमजान होगा जो हम तंबुओं में बिताएं. जब मेरे बच्चे मुझसे लालटेन खरीदने को कहते हैं और अपनी पसंदीदा चीजों से भरी इफ्तार की मेज का सपना देखते हैं, तो मैं खुद को उनके सामने बेबस महसूस करता हूं.”

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