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    Home»लेख-आलेख»ईरान की ऐतिहासिक उथल-पुथल…
    लेख-आलेख

    ईरान की ऐतिहासिक उथल-पुथल…

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inMarch 6, 2026
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    1979 तक आते-आते मोहम्मद रजा पहलवी के खिलाफ विद्रोह बहुत तेज हो गया। ईरानियों की निगाह में अमेरिका ‘शैताने बुजुर्ग’, यानी सबसे बड़ा शैतान हो गया था। अब ईरान के पक्के दो दुश्मन हो गए। अमेरिका तो इसलिए कि वह ईरान को अपनी कालोनी बनाना चाहता है और आर्थिक साधनों का दोहन करना चाहता है। अरबों से दुश्मनी तो पुरानी है। ईरान इसलिए भी ताकतवर बनना चाहता है ताकि सभी अरबी उसकी ताकत को स्वीकार कर लें। सासानी ईरानी वंश को अरबों द्वारा हरा दिए जाने का बदला ले लिया जाएगा जब कमजोर अरब देश रक्षा के लिए ईरान की शरण में आएंगे…

    इस समय ईरान अपने दौर की ऐतिहासिक उथल पुथल का शिकार है। इस उथल पुथल के बीज ईरान के इतिहास में छिपे हुए हैं। ये बीज अंकुरित होकर बड़े वृक्ष बनने की ओर अग्रसर होते हैं। जब ज्यादा बड़े होने लगते हैं तो यूरोप की ताकतें उनसे अपने को खतरा महसूस करती हैं। पश्चिमी ताकतें मिलजुल कर अपनी शक्ति का प्रयोग करती हैं और वृक्षों को काट देती हैं। लेकिन बीज कभी सूखता नहीं। फिर अंकुरित हो जाता है। यदि बहुत पीछे जाना जरूरी हो तो अरबों और ईरानियों की प्रतिद्वन्द्विता इस्लाम के आने से भी पूर्व की है। पहले खलीफा और दूसरे खलीफा के नेतृत्व में अरबों ने ईरानियों को पराजित तो कर दिया था और वहां अपना राज भी स्थापित कर लिया। इतना ही नहीं, उन्हें किसी न किसी तरह इस्लाम में मतान्तरित भी कर लिया था। लेकिन ईरान के मन में अरबों से पराजित हो जाने की टीस कभी गई नहीं। इसलिए जब करबला के मैदान में मुसलमानों ने हजरत मोहम्मद के दामाद हुसैन को धोखे से घेर कर सभी सगे संबंधियों समेत कत्ल कर दिया था, तब अली के अनुयायियों ने एक नया शिया पंथ बना लिया था। ईरान मौका पाकर शिया पंथ में खिसक गया। अब अरबों का इस्लाम पंथ हुआ और ईरानियों का शिया पंथ हुआ। लेकिन ईरान का पश्चिमी ताकतों से वैर कब से है? जब पता चला कि ईरान के नीचे तेल है। लेकिन यहां हम बहुत पीछे नहीं जाएंगे। 1906 में ईरानियों ने मोर्चा संभाल लिया कि देश में राजशाही की जगह लोकतांत्रिक व्यवस्था हो। उस समय ईरान में कजार वंश का शासन था। राजा ने संसद की स्थापना कर दी जिसे मजलिस कहा गया। उसके लिए बाकायदा चुनाव होने लगे। प्रधानमंत्री तक बनने लगा। लेकिन राजशाही बनी रही। मजलिस बनने पर लोगों का राजशाही से विरोध भी खत्म हो गया था। राजशाही का विरोध चाहे उतना न रहा हो, लेकिन ब्रिटेन और रूस का प्रभाव बढ़ता जा रहा था।

    रूस वैसे भी कहीं न कहीं से ईरान का पड़ोसी था। ब्रिटेन का कभी सूरज नहीं डूबता था। 1921 में ईरान की सेना के एक अधिकारी रजा शाह ने विद्रोह कर दिया। राजा ने उसे शांत करने के लिए युद्ध मंत्री बना दिया। वह प्रधानमंत्री भी बन गया। लेकिन उसने संसद में ही प्रस्ताव पारित करवा कर कजार वंश के राजा को 1925 में हटा दिया और स्वयं राजा बन गया और उसने अपना नाम रखा रजा शाह पहलवी। इस प्रकार पहलवी वंश के शासन की शुरुआत हुई। कहा जाता है कि रजा शाह भी तुर्की के कमाल पाशा अता तुर्क की तरह ईरान को गणतंत्र घोषित करना चाहता था, लेकिन इंग्लैंड ने और मौलवियों ने इसका विरोध किया। अलबत्ता 1906 में बनी संसद चलती रही। बाकायदा चुनाव होते थे, लेकिन ताकत राजा के हाथों में सिमटती गई। इतना कहना पड़ेगा कि रजा शाह ने ईरान के आधुनिकीकरण में एक नया युग शुरू किया। वह मुल्ला मौलवियों के बहुत खिलाफ था। 1941 में विश्व युद्ध शुरू हो गया। रूस और ब्रिटेन ने ईरान पर हमला कर दिया। सबसे पहले रजा शाह पहलवी को गद्दी से उतारा और उसके बेटे मोहम्मद रजा पहलवी को नया राजा बनाया। इसमें कोई शक नहीं कि पहलवी वंश ईरान का आधुनिकीकरण कर रहा था लेकिन अब तक दुनिया को पता चल चुका था कि ईरान और अरेबिया के नीचे तेल है और आने वाले समय में तेल के बिना काम चलने वाला नहीं है। द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में सब जानते हैं कि मित्र राष्ट्रों का पलड़ा भारी हो गया था। इसलिए उन्होंने अपनी सुविधा और हितों के अनुसार कई नए देश बनाए और कई खत्म किए। नए देश बनाने में यह ध्यान जरूर रखा कि ये देश पश्चिमी ताकतों के हितों की पूर्ति करते रहें। पर ईरान तो नया देश नहीं था। सभ्यता के लिहाज से वह बहुत ही पुराना देश था। सभ्यता और चिन्तन के मामले में भी पश्चिम से आगे ही था। लेकिन अब तो अरब और ईरान में तेल की एक नई सभ्यता निकल आई थी। विश्व युद्ध ने छोटे मोटे कई अरब देश भी बना दिए थे। ब्रिटेन और अमेरिका ने तेल के लिहाज से इन सभी देशों में अपना वर्चस्व बनाए रखना जरूरी समझा। इस जरूरी समझने में एक समझ यह भी थी कि इन सभी देशों में राजशाही बनी रहे। राजा को काबू करना आसान होता है।

    लोकतांत्रिक व्यवस्था में तो नित प्रधानमंत्री बदलते हैं। नए वाला पुराने के विरोध में ही होता है। किस किस को पटाते रहेंगे। जाहिर है इसके खिलाफ सबसे पहला मोर्चा ईरान में ही लगता। 1951 में राष्ट्रवादी ताकतों ने जोर पकड़ा और मुसद्दिक प्रधानमंत्री चुने गए। मुसद्दिक ने एंग्लो ईरानी आयल कम्पनी का राष्ट्रीयकरण कर लिया। यह कम्पनी इंग्लैंड की थी। ईरान का तेल ले जाती थी और राजस्व के नाम पर थोड़ा ही ईरान को देती थी। मुसद्दिक ने घोषणा कर दी, तेल ईरान का है, इंग्लैंड को नहीं ले जाने देंगे। स्वाभाविक ही इससे इंग्लैंड और अमेरिका को चिन्ता हुई। इस प्रकार की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक हवा बहने लगी तो कल अरब देश भी हत्थे से उखड़ जाएंगे। उधर अरब देशों के बादशाहों को भी चिन्ता हुई कि ईरान की यह हवा हमारे देश में भी आ गई तो उनके सिंहासन उखड़ जाएंगे। संकट के इस काल में अमेरिका और इंग्लैंड दोनों इक_े हुए। सीआईए सक्रिय हुआ। मुल्ला मौलवियों को भी काफी पैसा दिया गया। ईरान में सीआईए की सहायता से मुल्ला मौलवियों का भी एक सशक्त संगठन खड़ा हो गया। उन्होंने हवा फैलाई कि मुसद्दिक शिया पंथ के खिलाफ है। तब जाकर 1953 में मुसद्दिक को बंदी बना लिया गया। मोहम्मद शाह पहलवी को फिर से सारी ताकत मिली। उसने मजलिस की शक्तियों को भी अपने में ही सोख लिया। मजलिस केवल नाम की रही। पहलवी वंश 1979 तक चला।

    अब तक पहलवी वंश की पहचान बन गई थी कि उसने ईरान जैसी पुरानी सभ्यता को अमेरिका का उपनिवेश बना कर रख दिया है। 1979 तक आते आते मोहम्मद रजा पहलवी के खिलाफ विद्रोह बहुत तेज हो गया। ईरानियों की निगाह में अमेरिका ‘शैताने बुजुर्ग’, यानी सबसे बड़ा शैतान हो गया था। अब ईरान के पक्के दो दुश्मन हो गए। अमेरिका तो इसलिए कि वह ईरान को अपनी कालोनी बनाना चाहता है और आर्थिक साधनों का दोहन करना चाहता है। अरबों से दुश्मनी तो पुरानी है। ईरान इसलिए भी ताकतवर बनना चाहता है ताकि सभी अरबी उसकी ताकत को स्वीकार कर लें। सासानी ईरानी वंश को अरबों द्वारा हरा दिए जाने का बदला ले लिया जाएगा जब कमजोर अरब देश रक्षा के लिए ईरान की शरण में आएंगे। अमेरिका ईरान को इतना ताकतवर बनने नहीं देगा कि अरब देश अमेरिका का रक्षा कवच छोड़ कर ईरान का रक्षा कवच ले लें। रहा इजराइल, उसे तो अपने अस्तित्व के लिए अरबों से भी लडऩा है और ईरानियों से भी, क्योंकि दोनों आपस में चाहे लड़ते रहें, लेकिन इजराइल को दुनिया के नक्शे से मिटाने की दोनों कसमें खाते हैं।-कुलदीप चंद अग्निहोत्री

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