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    Home»लेख-आलेख»बंगाल ने खुद को फिर से ढूंढ़ लिया-हरदीप सिंह पुरी
    लेख-आलेख

    बंगाल ने खुद को फिर से ढूंढ़ लिया-हरदीप सिंह पुरी

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inMay 11, 2026
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    हावड़ा कभी एशिया का शेफील्ड कहलाता था। हुगली नदी के किनारे स्थित जूट मिलें इस उपमहाद्वीप के संगठित उद्योग का सबसे बड़ा केन्द्र हुआ करती थीं। कोलकाता भारत की वाणिज्यिक राजधानी हुआ करती थी। बिड़ला एवं टाटा घरानों के साथ-साथ आईटीसी, ब्रिटानिया, कोल इंडिया, हिंदुस्तान मोटर्स और गार्डन रीच शिपबिल्डर्स के मुख्यालय भी यहीं स्थित थे। बर्नपुर स्थित इस्को की स्थापना 1918 में हुई थी, जबकि दुर्गापुर इस्पात संयंत्र द्वितीय पंचवर्षीय योजना का हिस्सा था। वर्ष 1950-51 में, बंगाल ने देश के कुल मैन्यूफैक्चरिंग उत्पादन में लगभग 27 प्रतिशत हिस्से का योगदान किया था। मैं उस कलकत्ता को जानता था। विदेश सेवा में शामिल होने से पहले, मेरी शुरुआती नौकरियों में से एक इसी शहर में हिंदुस्तान लीवर में थी। कलकत्ता तब भी एक ऐसी जगह थी, जहां अपने संदूक के साथ आने वाला एक युवक इस बात के लिए आश्वस्त हो सकता था कि वह उस जगह पर आ गया है जहां से इस देश का वाणिज्य संचालित होता है। बत्तियां जलती रहीं। ट्रामें चलती रहीं। कंपनियों ने भर्तियां जारी रखीं।
    जिस चीज को बनाने में एक सदी लगी थी, उसे आर्थिक कुप्रबंधन से कहीं बढ़कर सोची-समझी साजिश के जरिए ध्वस्त कर दिया गया। वाम मोर्चा ने 1977 में सत्ता संभाली। यह मोर्चा चौंतीस वर्षों तक सत्ता पर काबिज रहा। श्रमिक वर्ग के हितों की नारेबाजी का आड़ में, एक संगठित समानांतर राज्य ने जड़ें जमा लीं। मकान बनाने से लेकर दुकान चलाने, भट्टी स्थापित करने, परिवहन मार्ग को पंजीकृत कराने और पंचायत की बैठक आयोजित करने तक के लिए इजाजत लेनी होती थी। ये इजाजतें एक चंदे की एवज में मिलती थीं। कार्यकर्ता ये चंदा इकट्ठा करते थे। सत्तारूढ़ पार्टी में उसे अपने खाते में जमा करती थी। पूंजीपतियों को राज्य से निकाल बाहर करने वाली ट्रेड यूनियनबाजी इसका प्रत्यक्ष पहलू थी। जबरन वसूली से त्रस्त आम नागरिकों के वहां से निकल जाने की परिघटना तो खैर कैमरों में कैद ही नहीं हुई। वर्ष 2000 के दशक में, जब वाम मोर्चा ने खुद अपना रुख बदलने और टाटा मोटर्स को सिंगूर लाने की कोशिश की, तो विपक्ष में बैठी तृणमूल कांग्रेस ने भूख हड़ताल शुरू कर दी। परिणामस्वरूप, यह परियोजना 2008 में गुजरात चली गई। माफिया ने अपना चोला बदल लिया; वह खत्म नहीं हुआ।
    वर्ष 2011 में, तृणमूल कांग्रेस ‘परिवर्तन’ के वादे पर सत्ता में आई। इसके बाद जो कुछ हुआ, वह नए रूप में पुरानी ही व्यवस्था के लौट आने जैसा था। चंदा, अब एवजी-रकम बन गया। कार्यकर्ता सिंडिकेट बन गए। राष्ट्रीय स्तर पर मैन्यूफैक्चरिंग में बंगाल की 27 प्रतिशत की हिस्सेदारी घटकर 5 प्रतिशत से भी नीचे आ गई है। कभी राष्ट्रीय औसत का 127 प्रतिशत रहने वाली, प्रति व्यक्ति आय लुढ़कर 84 प्रतिशत पर आ गई है। छह हजार से अधिक पंजीकृत कंपनियों ने अपने मुख्यालय कोलकाता से बाहर स्थानांतरित कर दिए हैं। कभी हावड़ा या साल्ट लेक में काम करने वाले बंगाल के बच्चे, अब बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे में रहते हैं। अपनी नौकरी और अपने पैसों को राज्य से बाहर जाता देखने वाले, मतदाताओं को अपना हिसाब बराबर करना था और उनके हाथ में हिसाब बराबर करने का जरिया एक मतपत्र ही था।
    इस बदले के केन्द्र में महिलाओं से जुड़ा एक ऐसा रिकॉर्ड था, जिसका बचाव आजाद भारत के किसी भी सत्ताधारी को नहीं करना पड़ा। एक महिला मुख्यमंत्री के शासनकाल में राज्य की महिलाओं पर निर्मम अत्याचार हुए और उनकी हत्याएं हुईं। अगस्त 2024 में आरजी कर मेडिकल कॉलेज में एक स्नातकोत्तर प्रशिक्षु डॉक्टर के साथ बलात्कार हुआ और उसकी हत्या कर दी गई। रात भर घटनास्थल पर एक भीड़ द्वारा तोड़फोड़ की गई। कोलकाता पुलिस ने इस भीड़ को तितर-बितर करने की कोई कोशिश नहीं की। कलकत्ता उच्च न्यायालय ने इस निष्कर्ष के आधार पर जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपने का आदेश दिया कि कोलकाता पुलिस की जांच भरोसेमंद नहीं है। जूनियर डॉक्टरों की 42 दिनों की हड़ताल हुई। इस हड़ताल में कई महिला डॉक्टर शामिल रहीं।
    जनवरी 2024 में, संदेशखाली की घटना हुई। सुंदरबन के एक द्वीप की महिलाएं तृणमूल के एक जिला परिषद सदस्य के खिलाफ सड़कों पर उतर आईं। तृणमूल का वह नेता पचपन दिनों तक फरार रहा। जबकि, राज्य की पुलिस चुपचाप बैठी रही और उसके खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं किया। कभी अपने आंदोलनों के दौरान ‘परिवर्तन’ की बात करने वाली, एक मुख्यमंत्री ने एक ऐसे शासन का नेतृत्व किया जिसमें उनके राज्य की महिलाओं को उनके ही कार्यकर्ताओं के खिलाफ अदालतों व केन्द्रीय एजेंसियों की शरण लेनी पड़ी और सड़कों पर उतरना पड़ा। यह बेहद निंदनीय है। और घोर अन्यायपूर्ण भी।
    बंगाल की महिलाओं को जो पीड़ा सहनी पड़ी, उसकी बराबरी केवल राज्य के युवाओं द्वारा उठाए गए नुकसान से ही की जा सकती है। प्रवर्तन निदेशालय द्वारा की गई पहली छापेमारी की रात सॉल्ट लेक के एक बंद फ्लैट से 21 करोड़ रुपये नकद बरामद किए गए। संबंधित संपत्तियों से हुई बरामदगी के बाद कुल राशि 50 करोड़ रुपये से अधिक की हो गई। तत्कालीन कैबिनेट मंत्री पार्थ चटर्जी की गिरफ्तारी हुई। उन्होंने शिक्षा मंत्री के रूप में पश्चिम बंगाल स्कूल सेवा आयोग की अध्यक्षता की थी। अप्रैल 2024 में, कलकत्ता उच्च न्यायालय ने एक भर्ती के तहत 25 हजार सात सौ तिरपन शिक्षकों, ग्रुप-सी और ग्रुप-डी कर्मचारियों की नियुक्तियों को रद्द कर दिया। इन नियुक्तियों को भर्ती प्रक्रिया के शुरुआती दौर से ही अवैध पाया गया था। इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में ले जाया गया और देश की सर्वोच्च अदालत ने 2025 में इसे बरकरार रखा।
    बंगाल के युवाओं को जीवन में एक मजबूत आधार प्रदान करने के उद्देश्य से शुरू की गई स्कूली भर्ती की पूरी प्रक्रिया एक ऐसे अड्डे में तब्दील हो गई, जहां पदों को बेचा जा रहा था और वैध उम्मीदवार को भर्ती की कतार दिखाई ही नहीं दे रही थी। राशन घोटाला तो इस घोटाले से भी ऊपर था। इसमें एक और मौजूदा कैबिनेट मंत्री ज्योतिप्रिया मल्लिक फंस गईं। इसके ऊपर मवेशी घोटाला, रिश्वतखोरी का धंधा और सिंडिकेट का राज था। मतदाता इन सभी गठजोड़ों को समझ गया। माफिया द्वारा संचालित राज्य में रिश्वत देने से इनकार करने वाला नागरिक सबसे पहले पीड़ित होता है।
    इस रिकॉर्ड के सामने एक अलग ही तरह का रिकॉर्ड था। पिछले एक दशक में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत चार करोड़ इक्कीस लाख घरों का निर्माण पूरा हुआ। जल जीवन मिशन के तहत पंद्रह करोड़ नल-जल के कनेक्शन लगाए गए। जबकि, 2019 में यह आंकड़ा तीन करोड़ का था। आयुष्मान भारत योजना के तहत लगभग पचपन करोड़ लाभार्थियों को पांच लाख रुपये का वार्षिक कवरेज मिला। प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण ने बंगाल के हर कल्याणकारी कार्यक्रम में होने वाले भ्रष्टाचार को खत्म कर दिया। ये सभी काल्पनिक बातें नहीं हैं। बंगाल में भारतीय जनता पार्टी के हर कार्यकर्ता ने इन्हीं बातों को आधार बनाकर वोट मांगा।
    उस आधार के पीछे एक नेटवर्क खड़ा था। पार्टी के बूथ के स्तर के कार्यकर्ताओं, पन्ना प्रमुखों, और चुनावी चक्रों के दौरान धमकियों, डरा-धमकाने और शारीरिक हिंसा का सामना करने वाले कार्यकर्ताओं ने प्रतिकूल परिस्थितियों में मतदाताओं के पंजीकरण, परिवहन और मतदान कराने के उन गैर-आकर्षक कामों को पूरा किया जिन्हें अन्य पार्टियों ने छोड़ दिया था। प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के खिलाफ धमकियां, केन्द्रीय बलों के लौट जाने के बाद होने वाले हाल से जुड़ी घोषणाएं और चुनाव के बाद की हिंसा के पिछले दौरों में गई जानें, ये सब कार्यकर्ताओं के लिए हवाई बातें नहीं थी। वे इन सब अनुभवों से गुजर चुके थे। माननीय गृह मंत्री श्री अमित शाह खुद बंगाल के विभिन्न जिलों में घूम-घूम कर देख रहे थे। कभी-कभी तो कुछ ही हफ्तों के भीतर पुराने कस्बे में दुबारा आते थे, क्योंकि वे जानते थे कि उनके कार्यकर्ता क्या कर रहे हैं। वे जो करने की कोशिश कर रहे थे, वह महज चुनावी उलटफेर भर नहीं था। यह एक गढ़ को ढहाने जैसा था।
    इस अभूतपूर्व जीत का सिरमौर बने चेहरे खुद अपनी कहानी बयान करते हैं। आर.जी. कर हत्याकांड के पीड़िता की मां श्रीमती रत्ना देबनाथ, जिन्हें भारतीय जनता पार्टी ने पानीहाटी से उम्मीदवार बनाया था, ने 15 साल से चले आ रहे तृणमूल के गढ़ को ध्वस्त करते हुए भारी बहुमत से जीत हासिल की। ​​श्रीमती रेखा पात्रा, जिन्होंने संदेशखाली में अपनी ही धरती पर राज्य द्वारा ठुकराए गए अधिकार की मांग रखी और उसी मांग को लेकर हिंगलगंज में चुनाव लड़ा। कुल 30 वर्षों तक वामपंथ और 15 वर्षों से तृणमूल के गढ़ रहे जिलों के मतदाताओं ने पहली बार कमल के निशान को चुना। रविवार, 4 मई 2026 को बंगाल ने हिसाब चुकता कर दिया। भारतीय जनता पार्टी ने 293 सीटों में से 206 सीटें जीतीं। दो अलग-अलग दलों के 49 वर्षों के माफिया शासन का अंत हो गया। यह केवल एक चुनावी जनादेश भर नहीं, बल्कि एक नैतिक जनादेश भी था।
    जनता के इस निर्णायक फैसले पर पहले से ही सवालिया निशान लगाए जा रहे हैं। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के तहत, 90 लाख अपात्र नाम हटा दिए गए। इन अपात्र नामों को 15 वर्षों से बनाए रखा गया था। अपात्र नामों को हटाने की कार्रवाई को हारने वाला पक्ष मतदाताओं का दमन बता रहा है। आंकड़े इस सवाल का जवाब देते हैं। जिन बीस निर्वाचन क्षेत्रों में संशोधन के दौरान सबसे अधिक नाम हटाए गए, उनमें से तृणूल कांग्रेस ने तेरह सीटें जीतीं। समसेरगंज, लालगोला, भगबानगोला, रघुनाथगंज और मेतियाबुरुज वैसे पांच निर्वाचन क्षेत्र हैं, जहां सबसे अधिक नाम हटाए गए। इन सभी में 2021 और 2026 के दोनों चुनावों में तृणूल के विधायक चुने गए। जीत का अंतर पुनरीक्षण के दौरान हटाए गए मतदाताओं की संख्या से कम रहने वाले उनतालीस निर्वाचन क्षेत्रों में से, छब्बीस सीटें भारतीय जनता पार्टी, इक्कीस सीटें तृणूल कांग्रेस और दो सीटें कांग्रेस ने जीतीं। लक्षित बहिष्करण से जीतने और हारने वाले दलों के बीच लगभग बराबर का बंटवारा नहीं होता। राज्य के इतिहास में सबसे अधिक 92.93 प्रतिशत मतदान ने इस सवाल का निपटारा कर दिया कि मतदाता सूची विश्वसनीय थी या नहीं। मतदाताओं के फैसले पर विवाद पैदा करके, पराजित दल केवल उस दादागिरी की ही पुष्टि कर रहा है जिसे मतदाताओं ने नकार दिया है। यह जनादेश मतदाताओं द्वारा किए जाए चयन के पीछे की बुद्धिमत्ता को भी साबित करता है।
    बंगाल ने मतदान कर दिया है और वहां के लोगों ने अपना चुनाव कर लिया है। मतदाताओं की चाहत को समझना बहुत मुश्किल नहीं है। शांति और सड़कों पर पसरी हिंसा से मुक्ति। समृद्धि और उनके शहरों में रोजगारों की वापसी। स्थिरता और एक ऐसा प्रशासन, जो जीने देने के एवज में उनसे कोई रकम न ले। उस राज्य में सांस्कृतिक और आर्थिक पुनर्जागरण, जिसने देश को पहला औद्योगिक क्षेत्र, उसकी वाणिज्यिक राजधानी और राष्ट्रीय प्रशासन के प्रारंभिक निर्माता दिए। जिस कलकत्ता में मैंने काम किया, उसे फिर से हासिल किया जा सकता है। वर्ष 2047 तक विकसित भारत की दिशा में अपना योगदान फिर से देने के लिए बंगाल बिल्कुल तैयार है। पिछले दशक में लिए गए हर कल्याणकारी और अवसंरचना संबंधी निर्णय के पीछे एक ऐसा प्रधानमंत्री रहा है, जो नागरिक को सर्वोपरि मानता है। उस नागरिक के प्रति विश्वास बनाए रखने के फल को अब दर्ज किया जा चुका है।

    (लेखक केन्द्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हैं)

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