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    Home»खानपान-सेहत»गुजरात में फिर लौटा जानलेवा चांदीपुरा वायरस, कितना खतरनाक
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    गुजरात में फिर लौटा जानलेवा चांदीपुरा वायरस, कितना खतरनाक

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inJuly 13, 2026
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    Chandipura Virus Cases In Gujarat 2026: गुजरात में एक बार फिर चांदीपुरा वायरस  के मामले सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग और डॉक्टरों की चिंता बढ़ गई है. रिपोर्ट्स के अनुसार, अब तक 3 बच्चों की मौत हो तुकी है. यह वायरस भले ही बहुत आम नहीं है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यह बच्चों में बेहद तेजी से गंभीर रूप ले सकता है. शुरुआत में इसके लक्षण सामान्य वायरल बुखार जैसे लगते हैं, लेकिन कुछ ही घंटों या दो-तीन दिनों के भीतर इंफेक्शन दिमाग तक पहुंचकर जानलेवा साबित हो सकता है. 

    मानसून के दौरान बढ़ता है इसका खतरा

    नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल के अनुसार, भारत में चांदीपुरा वायरस के प्रकोप पहले भी सामने आ चुके हैं. खासकर मानसून के दौरान इसका खतरा बढ़ जाता है, क्योंकि इस मौसम में इसे फैलाने वाली सैंडफ्लाई (रेतीली मक्खी) अधिक सक्रिय हो जाती है.  डॉ. मंजू केदारनाथ ने TOI को बताया कि यह इंफेक्शन रेयर जरूर है, लेकिन इसकी रफ्तार बेहद तेज होती है. इसलिए समय पर पहचान और इलाज सबसे जरूरी है. उनके मुताबिक, बीमारी की शुरुआत तेज बुखार, सिरदर्द, मतली और कमजोरी से होती है. इसके बाद वायरस तेजी से दिमाग पर असर डाल सकता है, जिससे उल्टी, बेचैनी, दौरे पड़ना और बेहोशी जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं. यदि समय पर इलाज न मिले तो 48 से 72 घंटे के भीतर मरीज कोमा में जा सकता है और जान का खतरा भी पैदा हो सकता है. 

    किन लोगों को इसका सबसे ज्यादा खतरा?

    डॉक्टरों के अनुसार, 15 साल से कम उम्र के बच्चों में इसका खतरा सबसे ज्यादा रहता है. बच्चों का विकसित हो रहा नर्वस सिस्टम और कमजोर इम्यून सिस्टम उन्हें गंभीर इंफेक्शन के प्रति अधिक संवेदनशील बना सकती है.  यदि बच्चे को 101 डिग्री फारेनहाइट/ 38.3 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा बुखार, बार-बार उल्टी, दौरे, व्यवहार में बदलाव, अत्यधिक सुस्ती या बेहोशी जैसे लक्षण दिखाई दें तो तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए. एक्सपर्ट का कहना है कि ऐसे मामलों में शुरुआती कुछ घंटे बेहद अहम होते हैं.

    क्या इसका इलाज मौजूद है?

    चिंता की बात यह भी है कि फिलहाल चांदीपुरा वायरस के लिए न तो कोई विशेष एंटीवायरल दवा उपलब्ध है और न ही कोई वैक्सीन. ऐसे में मरीज को केवल अस्पताल में सहायक उपचार दिया जाता है ताकि इंफेक्शन से होने वाली दिक्कतों को कंट्रोल किया जा सके। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस वायरस से होने वाली मृत्यु दर 56 से 75 प्रतिशत तक दर्ज की गई है, इसलिए लापरवाही भारी पड़ सकती है. 

    कैसे कर सकते हैं बचाव?

     यह वायरस संक्रमित सैंडफ्लाई के काटने से फैलता है, इसलिए बचाव ही सबसे प्रभावी उपाय माना जाता है. डॉ. मंजू केदारनाथ के अनुसार, बच्चों को पूरे बाजू के कपड़े पहनाएं, उनकी उम्र के अनुसार सुरक्षित इंसेक्ट रिपेलेंट का इस्तेमाल करें और जरूरत पड़ने पर कीटनाशक लगे मच्छरदानी में सुलाएं. इसके अलावा घर के आसपास साफ-सफाई रखें, कचरा जमा न होने दें और ऐसी जगहों को साफ रखें जहां सैंडफ्लाई पनप सकती हैं.

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