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    Home»संपादकीय»छात्रों का प्रदर्शन : पुलिस कार्रवाई पर सवाल
    संपादकीय

    छात्रों का प्रदर्शन : पुलिस कार्रवाई पर सवाल

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inJuly 28, 2026
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    एक स्वस्थ लोकतंत्र में जनता को किसी मसले पर शांतिपूर्ण विरोध और असहमति जाहिर करने का अधिकार होता है और सरकार को इसे सकारात्मक नजरिए से देखना चाहिए। जब भी जनता के किसी हिस्से में सरकार के रुख की वजह से असंतोष पैदा हो, तो यह जिम्मेदारी सरकार की ही होती है कि वह संवाद के जरिए समस्या का समाधान निकाले।

    मगर इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि अगर सरकार की उदासीनता की वजह से लोग अपनी बात कहने सड़क पर उतरें, तो उन्हें रोकने के लिए बातचीत की गुंजाइश निकालने के बजाय दमन का रास्ता अख्तियार किया जाए। नीट 2026 के प्रश्नपत्र लीक के मुद्दे पर जब विद्यार्थियों ने दिल्ली के जंतर मंतर पर विरोध प्रदर्शन की शुरुआत की, तो सरकार के पास वक्त था कि वह संवाद के जरिए एक आदर्श समाधान सामने रखे।

    अगर इस दौरान स्थिति बिगड़ने की आशंका होती, तो उसे नियंत्रित करने के लिए भी हर वह विकल्प आजमाए जाने चाहिए थे, जिससे प्रदर्शन बेलगाम न हो और न ही पुलिस को हिंसक बलप्रयोग करने की जरूरत पड़े। मगर अपनी मांगों के साथ ‘संसद मार्च’ का आह्वान करने वाले विद्यार्थियों के खिलाफ पुलिस ने जैसी सख्ती दिखाई, उससे यह सवाल उठा है कि सरकार देश के लोकतांत्रिक ढांचे और जनता के संवैधानिक अधिकारों को कैसे देखती है।

    गौरतलब है कि नीट प्रश्नपत्र लीक होने पर तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग के साथ दिल्ली में प्रदर्शन करने वालों पर पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े और बेरहमी से लाठीचार्ज किया था। मगर इस क्रम में ज्यादा गंभीर आरोप यह सामने आया कि आंदोलनकारियों पर पुलिस की ओर से पेलेट गन भी चलाया गया। वहीं पुलिस के इस रवैये के विरोध में जब देश के अन्य हिस्सों में भी प्रदर्शन शुरू हुए, तो वहां भी गैरजरूरी तरीके से आक्रामक रुख अख्तियार किया गया।

    एक अन्य आरोप के मुताबिक, बिहार के सिवान में एक पुलिसकर्मी ने एके-47 राइफल से विद्यार्थियों पर गोलियां चलाई। सवाल है कि महज प्रश्नपत्र लीक होने के मसले पर अपना विरोध जताने वालों के खिलाफ घातक हथियार चलाने की हद तक जाकर पुलिस आखिर क्या संदेश देना चाहती है। क्या ऐसे आरोपों के बाद अनिवार्यता की दलील पर विद्यार्थियों के खिलाफ ऐसे बर्ताव को उचित ठहराया जा सकता है?

    यों आज के दौर में अमूमन हर सार्वजनिक गतिविधि की जीवंत तस्वीरें बहुत कुछ बयान कर जाती हैं, लेकिन अगर इस तरह के आरोप भी लगे, तो क्या यह संविधान और देश के लोकतांत्रिक ढांचे के प्रति सरकार की वचनबद्धता पर सवालिया निशान नहीं हैं? कायदे से अपनी लोकतांत्रिक और संवैधानिक जिम्मेदारियों को लेकर सरकार को खुद सजग रहना चाहिए था।

    मगर विचित्र है कि यह सुप्रीम कोर्ट को याद दिलाना पड़ रहा है कि शांतिपूर्ण और कानूनसम्मत प्रदर्शन का अधिकार संविधान के हाथों संरक्षित है और केवल आंदोलन करने के आधार पर लाठीचार्ज को सही नहीं ठहराया जा सकता। आंदोलन खत्म होने के बाद कई जगहों से ऐसी खबरें आर्इं कि हिंसा में शामिल होने का आरोप लगा कर कई विद्यार्थियों को गिरफ्तार किया जा रहा है और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा रही है।

    यह आंदोलनकारियों से किए गए वादे से सरकार के मुकरने की तरह है, जिसमें यह आश्वासन दिया गया था कि विद्यार्थियों के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी। यह बेवजह नहीं है कि विपक्ष को यह आरोप लगाने का मौका मिला है कि पूरा तंत्र विद्यार्थियों के खिलाफ जानलेवा तरीके से खड़ा है।

    एक स्वस्थ लोकतंत्र की यही खूबसूरती है कि अगर किसी मसले पर सरकार के रुख की वजह से जनता के बीच असंतोष और विरोध की भावना बढ़ रही हो, तो सरकार को इस पर विचार करना चाहिए। इस लिहाज से देखें तो पिछले कुछ समय से नीट 2026 में प्रश्नपत्र लीक होने के मसले पर लोगों के भीतर उभरे व्यापक क्षोभ और विरोध के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का आखिर इस्तीफा देना लोकतांत्रिक परंपरा की ही अगली कड़ी है।

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