मनुष्य की एक विचित्र प्रवृत्ति है कि वह किसी वस्तु, व्यक्ति या उपलब्धि का मूल्यांकन आमतौर पर उसके वास्तविक गुणों के आधार पर नहीं, बल्कि अपनी अपेक्षाओं की कसौटी पर करता है। जब कोई वस्तु उसकी कल्पना के अनुरूप नहीं उतरती, तो वह उसके गुणों को देखने के बजाय उसकी कमियां गिनाने लगता है। लियोनार्दो दा विंची की विश्वविख्यात पेंटिंग ‘मोनालिसा’ को लेकर कुछ दर्शकों की नकारात्मक समीक्षाओं में शिकायतें मिलती हैं कि चित्र अपेक्षा से छोटा है, उसके चारों ओर सुरक्षा के कड़े प्रबंध हैं, बुलेटप्रूफ शीशे के घेरे के कारण उसे पर्याप्त निकटता से नहीं देखा जा सकता और उसके साथ एक अच्छी तस्वीर खिंचवाना भी आसान नहीं। इन शिकायतों में व्यावहारिक कठिनाइयां हो सकती हैं, लेकिन शिकायत करने वालों से यह भी पूछा जाना चाहिए कि क्या किसी महान कृति का मूल्य हमारी सुविधा, हमारी अपेक्षा और हमारे निजी अनुभव की संतुष्टि से निर्धारित होना चाहिए!
मोनालिसा का महत्त्व इस बात पर निर्भर नहीं करता कि उसे देखने आए प्रत्येक व्यक्ति को वह कितनी बड़ी दिखाई दी, उसके सामने खड़े होकर तस्वीर खिंचवाने का अवसर मिला या नहीं, या फिर वहां तक पहुंचने में उसे कितनी असुविधा हुई। उसका महत्त्व उसकी कलात्मक ऐतिहासिकता, चित्रांकन की सूक्ष्मता और मनुष्य की जिज्ञासा को जीवित रखने वाली उसकी रहस्यमय मुस्कान में कायम है। किसी व्यवस्था की आलोचना करना अनुचित नहीं, लेकिन व्यवस्था से मिली निराशा का प्रतिशोध किसी कृति के मूल्यांकन में लेना एक अलग बात है।
यही प्रवृत्ति हमारे सामाजिक और व्यावसायिक जीवन में भी दिखाई देती है। कोई व्यक्ति वर्षों के परिश्रम से एक पुस्तक लिखता है, कोई शिक्षक अपने विद्यार्थियों के लिए अतिरिक्त समय लगाकर पाठ तैयार करता है, कोई कलाकार अपनी संवेदनाओं को रंगों में ढालता है, कोई कर्मचारी अपनी जिम्मेदारियों से आगे बढ़कर किसी कार्य को बेहतर बनाने का प्रयास करता है। मगर मूल्यांकन के मौके पर अक्सर उस पूरे श्रम की उपेक्षा करके एक छोटी-सी त्रुटि को सामने रख दिया जाता है। पुस्तक में आलोचक उन पंक्तियों को रेखांकित करने का प्रयास करते हैं, जिससे लेखक के संपूर्ण चिंतन पर प्रश्नचिह्न लगाया जा सके। शिक्षक को उत्तीर्ण विद्यार्थियों के लिए सराहना मिले न मिले, अनुत्तीर्ण विद्यार्थियों का परिणाम उसे कठघरे में खड़ा करने के लिए काफी है। किसी रचनाकार ने अगर एक साधारण रचना तैयार कर दी है, तो वह उसकी संपूर्ण प्रतिभा का निर्णय नहीं कर सकती।
इसके पीछे केवल आलोचना की प्रवृत्ति नहीं, बल्कि हमारी अपेक्षाओं का अहंकार भी काम करता है। हम चाहते हैं कि संसार हमारी कल्पना के अनुसार प्रस्तुत हो, दूसरे का श्रम, उसका रहन-सहन, उसका जीवन जीने का तरीका, सभी कुछ हमारे मानकों के अनुसार हो। मानो उसकी उपलब्धियों को मान्यता देने का ठेका हमें मिला हो। हम दूसरों की उपलब्धियों को भी अपनी असंतुष्टि के छोटे-से घेरे में कैद कर देते हैं। हम भूल जाते हैं कि किसी अनुभव का हमारे लिए निराशाजनक होना और उसका वास्तव में मूल्यहीन होना, दो भिन्न निष्कर्ष हैं।
हालांकि यह निष्कर्ष निकालना भी उचित नहीं होगा कि हर आलोचक संकीर्ण दृष्टि वाला है या हर नकारात्मक समीक्षा किसी महान उपलब्धि के प्रति अन्याय है। आलोचना आवश्यक है, असहमति भी आवश्यक है और प्रतिष्ठित कृतियां भी प्रश्नों से परे नहीं होतीं। कभी-कभी अपेक्षाएं वास्तविकता से अधिक होने के कारण नहीं, बल्कि किसी व्यवस्था में सचमुच कमी होने के कारण टूटती हैं। स्वस्थ आलोचना वह है, जो गुण और दोष दोनों को देख सके, अपने निष्कर्षों के लिए उचित आधार प्रस्तुत करे और किसी एक असुविधा को संपूर्ण मूल्य का पर्याय न बना दे। इसी प्रकार, रचनाकार के लिए भी प्रत्येक आलोचना को ईर्ष्या या अज्ञान कहकर टाल देना आत्ममुग्धता का ही दूसरा रूप है।
इसलिए जब कभी अपने काम की उपेक्षा से मन खिन्न हो, प्रशंसा के स्थान पर कमियां सुनने को मिलें, या फिर किसी की असहमति अपने परिश्रम को व्यर्थ सिद्ध करती प्रतीत हो, तब मोनालिसा के उन दो सितारों को याद करना उपयोगी हो सकता है। वे यह प्रमाणित नहीं करते कि आलोचक हमेशा ही गलत होते हैं। वे केवल यह स्मरण कराते हैं कि किसी मूल्यवान वस्तु का मूल्यांकन करने वाला प्रत्येक व्यक्ति अनिवार्य रूप से उसके मूल्य को पहचानने में सक्षम हो, यह आवश्यक नहीं है। वैन गॉग आज विश्व के सर्वाधिक चर्चित चित्रकारों में गिने जाते हैं, लेकिन अपने जीवनकाल में उन्हें व्यापक स्तर पर कलात्मक और आर्थिक मान्यता नहीं मिली। उनकी कहानी बताती है कि किसी रचनाकार की प्रतिभा और उसके समकालीन समाज की उसे पहचानने की क्षमता, हमेशा एक-दूसरे के अनुरूप नहीं होती।
अपने कार्य की समीक्षा अवश्य करना चाहिए, त्रुटियों को सुधारना चाहिए, उचित आलोचना से सीखना चाहिए, लेकिन अपनी समूची योग्यता का निर्णय किसी एक व्यक्ति की प्रतिक्रिया, किसी एक असफल अनुभव या फिर प्रशंसा के अभाव से नहीं करना चाहिए। संसार में कुछ उपलब्धियां ऐसी होती हैं, जिनका मूल्य तत्काल मिलने वाली स्वीकृति से कहीं अधिक विस्तृत होता है। कभी-कभी किसी कृति की प्रतिष्ठा और उसे देखने वाले की निराशा के बीच का अंतर हमें कृति से अधिक, अपनी दृष्टि के विषय में बहुत कुछ सिखा जाता है। किसी चीज को पसंद न करना उनका अधिकार है, लेकिन उनकी नापसंद को ही अपना अंतिम मूल्य समझ लेना हमारी दृष्टि की सीमा हो सकती है।

