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    Home»अजब गजब»दिवाली पर यहां नहीं जलते पटाखे, 150 साल पुराने बरगद पर रहता है सैकड़ों चमगादड़ों का परिवार
    अजब गजब

    दिवाली पर यहां नहीं जलते पटाखे, 150 साल पुराने बरगद पर रहता है सैकड़ों चमगादड़ों का परिवार

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inNovember 4, 2026
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    Viral Video: तमिलनाडु के पेरम्बूर गांव में पिछले करीब 100 साल से दिवाली पर पटाखे नहीं जलाए जाते। इसकी वजह है 150 साल पुराने बरगद पर रहने वाले सैकड़ों चमगादड़, जिनकी सुरक्षा के लिए ग्रामीणों ने यह खास परंपरा बनाई है।

    तमिलनाडु के एक गांव में दिवाली मनाने का तरीका बाकी जगहों से बिल्कुल अलग है। यहां लोग त्योहार तो पूरे उत्साह से मनाते हैं, लेकिन पटाखे नहीं जलाते। न तेज आवाज होती है और न ही आसमान में धुएं का गुबार दिखाई देता है। इसकी वजह भी बेहद खास है। दरअसल, गांव के एक पुराने बरगद के पेड़ पर सैकड़ों चमगादड़ रहते हैं। ग्रामीणों ने इन बेजुबान जीवों की शांति और सुरक्षा के लिए पटाखों से दूरी बना रखी है। खास बात यह है कि यह परंपरा आज की नहीं, बल्कि करीब 100 साल से चली आ रही है। तो आइए विस्तार से जानते हैं। 

    आतिशबाजी से करते हैं परहेज
    यह अनूठी परंपरा तमिलनाडु के मयिलादुथुरई जिले के पेरम्बूर गांव की है। यहां दिवाली पर लोग घरों में दीये जलाते हैं, मंदिरों में पूजा करते हैं और परिवार के साथ त्योहार की खुशियां बांटते हैं। लेकिन आतिशबाजी से पूरी तरह परहेज करते हैं। गांव के लोगों का मानना है कि अपनी खुशी के लिए किसी दूसरे जीव को परेशान करना ठीक नहीं है।

    150 साल पुराने बरगद पर है चमगादड़ों का बसेरा
    गांव के ‘वव्व्वाल थोप्पू’ यानी चमगादड़ों के बाग में एक करीब 150 साल पुराना बरगद का पेड़ है। इस पेड़ पर सैकड़ों इंडियन फ्लाइंग फॉक्स यानी बड़े फल खाने वाले चमगादड़ रहते हैं। ये चमगादड़ दिन में पेड़ों पर आराम करते हैं और रात में भोजन की तलाश में बाहर निकलते हैं।

    धुएं से होती है गांव वालों को परेशानी
    ग्रामीणों को पता है कि दिवाली के दौरान पटाखों की तेज आवाज और उनसे निकलने वाला धुआं इन जीवों के लिए परेशानी का कारण बन सकता है। ऐसे में उन्होंने फैसला किया कि त्योहार की खुशियां मनाने के लिए इनका आशियाना खतरे में नहीं डालेंगे। तभी से गांव में पटाखे जलाने की परंपरा नहीं है। चमगादड़ पर्यावरण के लिए भी काफी जरूरी हैं। ये फलों के बीज दूर-दूर तक फैलाने और फूलों के परागण में मदद करते हैं। इससे जंगलों और हरियाली को बढ़ने में मदद मिलती है। यही वजह है कि गांव के लोग इन्हें सिर्फ एक जीव नहीं, बल्कि प्रकृति का अहम हिस्सा मानते हैं।

    तमिलनाडु के दूसरे गांवों में भी ऐसी परंपरा
    पेरम्बूर अकेला ऐसा गांव नहीं है, जहां लोग वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए पटाखे नहीं जलाते। तमिलनाडु के विल्लुपुरम जिले के कझुपेरुम्पक्कम गांव में भी चमगादड़ों को बचाने के लिए लोग आतिशबाजी से दूर रहते हैं। वहीं, कोयम्बटूर जिले के किट्टमपालयम गांव में साल 2012 में स्कूलों के जरिए पटाखे न जलाने की मुहिम शुरू हुई थी। धीरे-धीरे इस पहल से सैकड़ों परिवार जुड़ गए। इन गांवों के लोगों का मानना है कि त्योहार मनाने के साथ-साथ प्रकृति और जीव-जंतुओं का ध्यान रखना भी हमारी जिम्मेदारी है।

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