नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को भाखड़ा-नांगल और ब्यास जल-विद्युत परियोजनाओं से पैदा होने वाली बिजली में हिस्से को लेकर चल रहे 60 साल पुराने विवाद का अंतिम रूप से निपटारा कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने तीन राज्यों हिमाचल प्रदेश , पंजाब और हरियाणा के बीच विवाद को सुलझाने के लिए बिना नकद लेनदेन वाले समझौते को मंजूरी दे दी। यह समझौता अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी की देखरेख में हुआ है।
CJI सूर्यकांत की पीठ ने पंजाब-हरियाणा को दिया निर्देश
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने पंजाब और हरियाणा को निर्देश दिया है कि वे अगले 20 वर्षों तक हर साल अक्टूबर से मार्च के बीच हिमाचल प्रदेश को 598 मिलियन यूनिट बिजली की आपूर्ति करें। हिमाचल के पक्ष में 2011 में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र करते हुए पीठ ने चिंता जताई कि 1996 में दायर किए गए इस मामले का लाभ हिमाचल को अभी तक नहीं मिला है, जबकि 15 साल से ज्यादा का समय बीत चुका है।
यह बहुत चिंता का विषय है। हम सभी संबंधित पक्षों को स्पष्ट रूप से बता देना चाहते हैं कि इस कोर्ट के निर्देश अनिवार्य हैं और इनका बिना किसी आनाकानी के पालन किया जाना चाहिए। – CJI सूर्यकांत की बेंच
पीठ ने पंजाब-हरियाणा को दी 20 साल की मोहलत
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने भारत के महान्यायवादी की प्रस्तावित गणना के ढांचे को स्वीकार कर लिया और निर्देश दिया कि 13,066 मिलियन यूनिट की बकाया ऊर्जा का निपटान बिना नकद लेनदेन के किया जाए।
वादी-राज्य यानी हिमाचल प्रदेश की rs 420.77 करोड़ की पूंजी-लागत देनदारी को लगभग 1,093 मिलियन यूनिट बिजली के बदले समायोजित करने के बाद बाकी लगभग 11,973 मिलियन यूनिट बिजली पंजाब और हरियाणा राज्यों द्वारा बीस ‘लीन सीजन’ (कम बिजली उत्पादन वाले मौसमों) के दौरान उपलब्ध कराई जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिवादी-राज्यों यानी पंजाब-हरियाणा पर बोझ कम करने के लिए इस अवधि को 15 साल से बढ़ाकर 20 साल कर दिया है।
कई दशकों से लंबित पड़े इस फैसले को किसी पक्ष (पंजाब और हरियाणा) की अनिच्छा या अड़ियल रवैये के कारण बेकार नहीं जाने दिया जा सकता। – CJI सूर्यकांत की बेंच
हमेशा के लिए बकाया मुद्दे को समाप्त कर दिया जाए: सुप्रीम कोर्ट
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने टिप्पणी की, ‘हमें यह भी स्वीकार करना चाहिए कि भले ही पंजाब वादी राज्य (हिमाचल प्रदेश) को देय अंतिम बकाया राशि पर सवाल उठाता है, लेकिन उसने सैद्धांतिक रूप से उस कार्यप्रणाली को स्वीकार कर लिया है, जिसका उपयोग वादी राज्य की पूंजी-लागत देनदारी की गणना के लिए किया गया था…। यह विशेष रूप से दुर्भाग्यपूर्ण है कि कई दशकों से लंबित विवाद अभी भी खिंचता जा रहा है, जिसमें अदालत का और अधिक समय और ध्यान लगाने की आवश्यकता पड़ रही है। इसलिए, यह अनिवार्य हो जाता है कि जो मुद्दे अभी भी सुलझने बाकी हैं, उन्हें हमेशा के लिए समाप्त कर दिया जाए। ‘
हमें उम्मीद है कि सभी संबंधित पक्ष अपना सहयोग देंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि इस अदालत द्वारा दिए गए निर्देशों का उनकी मूल भावना और मंशा के अनुरूप पालन किया जाए। – सुप्रीम कोर्ट
पंजाब-हरियाणा ने गणना पर उठाए थे सवाल
पंजाब और हरियाणा ने महान्यायवादी की गणना पर सवाल उठाते हुए तर्क दिया कि हिमाचल प्रदेश को दी गई अतिरिक्त बिजली को ध्यान में रखते हुए बकाया राशि कम की जानी चाहिए, और पूंजी-लागत की देनदारी की गणना अलग तरीके से होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब की आपत्तियों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि ये आपत्तियां अस्पष्ट और सतही थीं और इनका मकसद उन मुद्दों पर फिर से कानूनी कार्यवाही शुरू करना था, जिन्हें कोर्ट ने अपने 2011 के फैसले में पहले ही सुलझा दिया था।
यह है 60 साल पुराना मामला
- हिमाचल प्रदेश ने संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत सुप्रीम कोर्ट के मूल क्षेत्राधिकार का उपयोग करते हुए यह मुकदमा दायर किया है। इसमें भारत संघ, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान राज्यों और चंडीगढ़ केंद्र शासित प्रदेश के खिलाफ दावा किया गया है कि भाखड़ा-नांगल और ब्यास जल-विद्युत परियोजनाओं से पैदा हुई बिजली में हिमाचल प्रदेश का भी हिस्सा है।
- इन जल-विद्युत परियोजनाओं की परिकल्पना तब की गई थी, जब तत्कालीन पंजाब राज्य एक एकल और संयुक्त इकाई के रूप में मौजूद था। ये परियोजनाएं मुख्य रूप से तत्कालीन बिलासपुर रियासत और कांगड़ा जिले के क्षेत्र में बनाई गई थीं। ये दोनों ही अब हिमाचल प्रदेश राज्य का हिस्सा हैं।
- भाखड़ा-नांगल परियोजना के लिए तत्कालीन बिलासपुर राज्य की लगभग 27,869 एकड़ भूमि को जलमग्न करना पड़ा, जबकि ब्यास परियोजना के लिए कांगड़ा जिले में 65,050 एकड़ से अधिक भूमि जलमग्न हो गई। हालांकि, इससे पैदा बिजली का मुख्य लाभ संयुक्त पंजाब राज्य को मिला और इसके पुनर्गठन के बाद, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ को मिला।
- ‘पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966’ के तहत संयुक्त पंजाब राज्य का पुनर्गठन किया गया, जिससे यह वर्तमान पंजाब और हरियाणा राज्यों में विभाजित हो गया, केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ का गठन हुआ और कुछ क्षेत्र को उसकी आबादी सहित वादी-राज्य हिमाचल प्रदेश को सौंप दिया गया।
- धारा 78 की स्पष्ट शर्तों के बावजूद कोई अंतिम बंटवारा नहीं किया गया। वादी-राज्य को भाखड़ा-नांगल परियोजना से रियायती दर पर हर दिन 1.2 लाख यूनिट बिजली भी अलग से मिलती रही। इसे ‘पुराना हिमाचल प्रदेश दर’ कहा जाता है। हिमाचल ने इन परियोजनाओं से मिलने वाले कुल लाभों में से 7.19% हिस्से पर अपना दावा जताया, जिसका आधार संयुक्त पंजाब की वह आबादी थी जिसे इस राज्य में ट्रांसफर की गई थी।
- केंद्र सरकार ने इस दावे को खारिज कर दिया और विवाद को सुलझाने के लिए बुलाई गई त्रिपक्षीय बैठक भी विफल रही। इसके बाद वादी-राज्य ने मुकदमा दायर किया, जिसमें अन्य बातों के अलावा, ‘होम स्टेट’ (गृह राज्य) सिद्धांत के आधार पर कुल बिजली का 12% हिस्सा मुफ्त में या फिर जनसंख्या-स्थानांतरण अनुपात के आधार पर 7.19% बिजली, दावा किए गए हिस्से की आपूर्ति न होने के लिए 2,199.77 करोड़ रुपये का मुआवजा और साथ ही ब्याज व मुकदमे का खर्च मांगा गया।
सुप्रीम कोर्ट का सितंबर, 2011 का फैसला क्या था?
- द प्रिंट की एक रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर 2011 में, लंबी कानूनी कार्यवाही और मध्यस्थता की असफल कोशिशों के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला सुनाया। इसमें हिमाचल प्रदेश के उस दावे को खारिज कर दिया गया, जिसमें उसने 12% मुफ्त बिजली की मांग की थी; कोर्ट ने इसे एक ऐसा नीतिगत निर्णय माना जिसे लागू नहीं किया जा सकता।
- हालांकि, कोर्ट ने 1966 के अधिनियम की धारा 78 के तहत हिमाचल प्रदेश के कानूनी अधिकार को बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा कि संयुक्त पंजाब से जुड़ी बिजली में हिमाचल प्रदेश का 7.19% हिस्सा बनता है। इसका मतलब यह हुआ कि 1 नवंबर 1966 से भाखड़ा-नांगल परियोजना से पैदा होने वाली कुल बिजली में हिमाचल का 6% हिस्सा है। ब्यास यूनिट-I से उसके चालू होने की तारीख से 5.752% हिस्सा है और ब्यास यूनिट-II से उसके चालू होने की तारीख से लगभग 3% हिस्सा है।
- कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा के हिस्से क्रमशः 51.8% और 37.5% तय किए। साथ ही, राजस्थान के खिलाफ किए गए सभी दावों को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि राजस्थान कभी भी संयुक्त पंजाब का हिस्सा नहीं रहा था। केंद्र सरकार को निर्देश दिया गया कि वह छह महीने के भीतर बिजली के बकाया हिस्से की सटीक गणना करे।
2011 का फैसला लागू क्यों नहीं हो पाया?
- हालांकि 2011 के फैसले से हिमाचल प्रदेश के हक तो तय हो गए, लेकिन बिजली के बकाया भुगतान की गणना और निपटारा नहीं हो सका। अक्टूबर 2011 में, विद्युत मंत्रालय ने तीन सदस्यों वाली एक तकनीकी समिति बनाई। लेकिन उसी महीने, मंत्रालय ने एक आदेश जारी करके 1 नवंबर 2011 से बिजली के आवंटन में बदलाव कर दिया।
- 5 जुलाई 2013 को केंद्र सरकार ने अदालत में एक हलफनामा पेश किया। इसमें 1 नवंबर 1966 से अक्टूबर 2011 के बीच हिमाचल प्रदेश को मिलने वाली बिजली में कुल 13,066 मिलियन यूनिट की कमी का हिसाब दिया गया था। इसमें भाखड़ा-नांगल परियोजना और ब्यास की दो इकाइयां शामिल थीं।
- उस समय बकाया राशि का अनुमान लगभग 1.5 करोड़ रुपये लगाया गया था। वहीं, हिमाचल प्रदेश की वह पूंजीगत लागत जो उसे वापस नहीं मिली थी, और आधुनिकीकरण की देनदारी, कुल मिलाकर 111.5 करोड़ रुपये बैठती थी।
- 2014 से भारत के महान्यायवादी की देखरेख में कई बार सुलह की कोशिशें की गईं, लेकिन कोई लिखित समझौता नहीं हो सका। 2015 में औपचारिक रिपोर्टें दाखिल की गईं, और फिर 2017 में इस पर और बातचीत हुई। इन कोशिशों के नाकाम रहने की बात 9 जुलाई 2019 की एक अदालती रिपोर्ट में दर्ज की गई।

