नई दिल्ली/चेन्नई: सुप्रीम कोर्ट ने बीते 4 नवंबर को मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें तमिलनाडु के चिदंबरम स्थित भगवान नटराज मंदिर के प्रशासन का कुछ हिस्सा पुजारियों के एक समुदाय से लेकर पांच सदस्यीय बोर्ड को सौंपने का निर्देश दिया गया था। दरअसल, 30 अक्टूबर को मद्रास हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने चिदंबरम स्थित पवित्र थिल्लई नटराज मंदिर के वित्तीय, प्रशासनिक और संपत्ति प्रबंधन को अपने हाथ में लेने के लिए एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय ‘प्रबंधन बोर्ड’ के तत्काल गठन का आदेश दिया था। इस बोर्ड में राज्य सरकार द्वारा नियुक्त सदस्य शामिल थे। हालांकि, इस रोक से फिलहाल यथास्थिति बहाल हो गई है, लेकिन इसके मूल में मौजूद विवाद अभी भी बेहद संवेदनशील बना हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा-विवादित फैसले पर लगाते हैं रोक
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने मंदिर के ‘पोधु दीक्षितारों’ द्वारा दायर चुनौती पर सुनवाई करते हुए यह अंतरिम आदेश पारित किया। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को फटकार लगाते हुए सवाल किया कि क्या रिकॉर्ड पर रखी गई सामग्री से इन बदलावों के लिए दीक्षितारों की जिम्मेदारी साबित होती है। दलीलों पर विचार करने के बाद पीठ ने हाई कोर्ट के 30 अक्टूबर के फैसले पर रोक लगा दी और नोटिस जारी किया।
नोटिस जारी करें। वकीलों ने नोटिस स्वीकार कर लिया है। पक्षों की ओर से पेश हुए वकीलों को सुनने के बाद, हमारी यह राय है कि विवादित फैसले पर रोक लगाई जानी चाहिए। इसलिए, इस पर रोक लगाई जाती है।
सुप्रीम कोर्ट
कौन हैं पोडु दीक्षितार
पोडु दीक्षितार शैव पुजारियों का वह पारंपरिक समुदाय है, जिस पर मंदिर की धार्मिक रीतियों और प्रशासनिक परंपराओं की जिम्मेदारी है। यह विवाद मई 2022 में तमिलनाडु सरकार के एक आदेश से शुरू हुआ, जिसमें भक्तों को ‘कनकसभा’ से प्रार्थना करने की अनुमति दी गई थी। ‘कनकसभा’ मंदिर परिसर के भीतर एक ऊंचा चबूतरा है, जहां पारंपरिक रूप से विशेष प्रार्थनाएं और अनुष्ठान किए जाते हैं।
मंदिर का प्रबंधन करने वाले पुजारियों के समुदाय ‘पोडु दीक्षितार’ ने मद्रास हाई कोर्ट में इस आदेश को चुनौती दी। उन्होंने तर्क दिया कि सरकार का यह निर्देश उनके धार्मिक मामलों के प्रबंधन के अधिकार का उल्लंघन करता है, जो संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत गारंटीकृत है।
30 अक्टूबर को हुई सुनवाई में हाई कोर्ट ने सरकार के आदेश को सही ठहराते हुए कहा कि भक्तों को ‘कनकसभा’ से दर्शन करने की अनुमति देने से धार्मिक अनुष्ठानों में कोई बाधा नहीं आएगी।
चिदंबरम मंदिर के पीछे क्यों पड़ी तमिलनाडु सरकार
तमिलनाडु सरकार अदालतों की बार-बार की फटकार के बावजूद चिदंबरम मंदिर को अपने नियंत्रण में लेने के लिए इतनी जिद क्यों कर रही है? दरअसल, इसके पीछे एक बड़ी सच्चाई को समझना होगा। वह यह है कि चिदंबरम नटराज मंदिर तमिलनाडु का सबसे बड़ा, सबसे प्रमुख और ऐतिहासिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण हिंदू मंदिर है, जो राज्य के ‘हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्त विभाग’ (HR&CE) के सीधे नियंत्रण से बाहर है।
चिदंबरम मंदिर एक तरह से धार्मिक स्वतंत्र द्वीप
एक और वजह यह है कि HR&CE विभाग के तहत आने वाले 38,000 से ज्यादा मंदिरों के बीच चिदंबरम मंदिर राज्य के नौकरशाही तंत्र के लिए एक ऐसी स्थिति है जिसे वे बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। यह एक ऐसा संस्थान है जो उनके नियंत्रण में नहीं आता। यह एक तरह से ‘धार्मिक स्व-शासन’ का एक स्वतंत्र द्वीप है, जो एक ऐसे राज्य के बीच स्थित है, जिसने बाकी सभी हिंदू धार्मिक ढांचों को व्यवस्थित रूप से अपने अधीन कर लिया है। राज्य प्रशासन के लिए, यह मंदिर दो ऐसे आकर्षण पेश करता है जिनसे वे खुद को रोक नहीं पाते।
राज्य के ऑडिटरों को गेट से लौटा दिया जाता है
सबसे पहले, यह एक प्रशासनिक चुनौती है, क्योंकि सरकार के सामने एक ऐसी जगह है जहां राज्य के ऑडिटरों को गेट से ही लौटा दिया जाता है और राज्य द्वारा नियुक्त कोई भी कार्यकारी अधिकारी वहां काम नहीं करता है। दूसरी बात, यह मंदिर एक प्राचीन शाही केंद्र रहा है, जिसे अलग-अलग राजवंशों ने जमीन, सोना और रत्न दान किए थे। चिदंबरम के पास अपार धन और प्रतीकात्मक महत्व है। इस पर नियंत्रण पाना HR&CE विभाग के प्रशासनिक साम्राज्य की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।
द्रविड़ नेता चाहते हैं कि मंदिर प्रशासन के कब्जे में हो
इसलिए, ‘प्रगतिशील सुधार’ के नाम पर ईश्वर को न मानने वाले द्रविड़ राजनेता अपने हस्तक्षेप को पवित्र स्थानों को लोकतांत्रिक बनाने और बंद-कमरे वाले पुजारी-तंत्र को खत्म करने की कोशिश के रूप में पेश कर रहे हैं। लेकिन इस रुख के पीछे एक गहरा संस्थागत असंतुलन छिपा है। जहां संविधान के तहत अल्पसंख्यक धार्मिक संस्थानों को अपने ट्रस्ट और पूजा-स्थलों को बाहरी हस्तक्षेप से मुक्त रखकर चलाने की पूरी आजादी है, वहीं राज्य प्रमुख हिंदू मंदिरों को ‘सार्वजनिक उपयोगिता’ वाली जगह मानता है, जिनका प्रबंधन नौकरशाह और राजनीतिक नियुक्तियों वाले लोग करते हैं।
राज्य का तर्क रिकॉर्ड से गलत साबित
- राज्य का यह तर्क कि मंदिरों की संपत्ति की सुरक्षा के लिए सरकारी नियंत्रण जरूरी है, विभाग के अपने ही पिछले रिकॉर्ड से गलत साबित होता है। दशकों के सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि ऐतिहासिक मंदिरों की बहुत सारी जमीनें अवैध राजनीतिक कब्जों और हड़पने की घटनाओं के कारण खो गई हैं।
- लाखों रुपये का किराया वसूल नहीं किया गया है और राज्य द्वारा कराए गए असंवेदनशील नवीनीकरण कार्यों के कारण चोल और पांड्य काल के प्राचीन शिलालेख मिट गए हैं।
- राज्य-स्तर पर देखी जा रही इस प्रशासनिक लापरवाही को देखते हुए ‘पोडु दीक्षितारों’ का विरोध एक जरूरी कदम है। यह विरोध उस सरकारी तंत्र के खिलाफ है, जो बार-बार उस विरासत को बचाने में नाकाम रहा है, जिसकी रक्षा करने का वह दावा करता है।
आगे का रास्ता क्या निकल सकता है?
- आगे का रास्ता यह हो सकता है कि धार्मिक समूहों के अपने आंतरिक प्रबंधन और पारदर्शी कार्यप्रणाली (जो बिना किसी दखल के हो) के बीच तालमेल बिठाया जाए। आने वाली पीढ़ियों के लिए अपनी संवैधानिक स्वायत्तता को बचाने के लिए ‘पोडु दीक्षितार’ खुद ही आधुनिक प्रशासनिक तरीकों को अपना सकते हैं। इससे वे अपनी संस्थागत आजादी को खोए बिना, जनता की उम्मीदों को भी पूरा कर सकते हैं। वे स्वेच्छा से वार्षिक वित्तीय समीक्षा करने और ऑडिट की गई सारांश रिपोर्ट प्रकाशित करने के लिए स्वतंत्र अकाउंटिंग फर्मों की सेवाएं ले सकते हैं। सार्वजनिक योगदान के लिए आधुनिक डिजिटल रसीद प्रणाली अपना सकते हैं। कनागासबाई मंडपम जैसे पवित्र स्थानों तक सभी भक्तों की सम्मानजनक पहुंच सुनिश्चित कर सकते हैं।
- पारंपरिक स्थापतियों (वास्तुकला विशेषज्ञों) और पुरालेखविदों का एक स्वतंत्र सलाहकार बोर्ड बना सकते हैं, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वास्तुकला संबंधी मरम्मत कार्य अंतरराष्ट्रीय संरक्षण मानकों के मुताबिक हों।
- सबनायगर मंदिर के प्रशासन पर कब्जा करने की राज्य की लगातार कोशिशें संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत मिले अधिकारों का सीधा उल्लंघन हैं। यह एक ऐसी व्यवस्था को दर्शाता है, जहां हिंदू धार्मिक स्थलों को विशेष रूप से निशाना बनाया जा रहा है।
- ‘पोडु दीक्षितार’ एक मान्यता प्राप्त धार्मिक समूह हैं, जिनके अधिकारों को ‘देवराज शेनॉय मामले’ (1952) में सुरक्षित किया गया था और ‘सुब्रमण्यम स्वामी मामले’ (2014) में फिर से पुष्टि की गई थी। इन्हें बार-बार हटाने की कोशिश करके सरकार सुप्रीम कोर्ट के उस स्पष्ट आदेश का उल्लंघन कर रही है, जिसके अनुसार राज्य का हस्तक्षेप केवल अस्थायी और सुधार के उद्देश्य से होना चाहिए, न कि इसे पूरी तरह से सरकारी नियंत्रण में ले लिया जाना चाहिए।
- इसके अलावा, सरकार का यह जरूरत से ज्यादा दखल एक गहरे संवैधानिक दोहरे मापदंड को उजागर करता है। जहां एक ओर अल्पसंख्यक धार्मिक समुदायों को अनुच्छेद 25, 26 और 30 के तहत अपने ट्रस्ट, संपत्ति और पूजा स्थलों के प्रबंधन की लगभग पूरी आजादी मिली हुई है। वहीं, दूसरी ओर तमिलनाडु में हिंदू संस्थानों को एक तरह की ‘सार्वजनिक सुविधा’ मान लिया गया है। इन पर सरकारी नौकरशाहों, राजनीतिक नियुक्तियों और केवल राजस्व पर ध्यान देने वाले अधिकारियों का भारी नियंत्रण थोप दिया गया है।

