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    Home»छत्तीसगढ़»जिन्हें बसव राजू ने सिखाया था हिंसा का पाठ, वही अंत में उसकी मौत की वजह बने।
    छत्तीसगढ़

    जिन्हें बसव राजू ने सिखाया था हिंसा का पाठ, वही अंत में उसकी मौत की वजह बने।

    Chhattisgarh RajyaBy Chhattisgarh RajyaMay 22, 2025
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    बसव राजू
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    जगदलपुर। एक समय देश का सबसे बड़ा माओवादी कमांडर बना बसव राजू उर्फ अंबाला केशव राव उर्फ गगन्ना बुधवार को छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ और इंद्रावती टाइगर रिजर्व के जंगलों में सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ में मारा गया। यह कार्रवाई जिला रिजर्व गार्ड (DRG) के जवानों ने अंजाम दी, जिनमें कई पूर्व माओवादी शामिल हैं, जो कभी बसव राजू से ही प्रशिक्षण ले चुके थे और बाद में आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में शामिल हो गए।

    चार दशक तक छत्तीसगढ़ के बस्तर में आदिवासियों को हथियारबंद कर गुरिल्ला युद्ध की ट्रेनिंग देने वाला बसव राजू, अपने ही पुराने शिष्यों की घेराबंदी में आ गया। DRG जवानों ने उसके गुरिल्ला तकनीकों को उसी के खिलाफ इस्तेमाल करते हुए उसे और उसके 26 साथियों को ढेर कर दिया।

    माओवाद पर केंद्र और राज्य का तीखा प्रहार

    बीते 15 महीनों में छत्तीसगढ़ में डबल इंजन सरकार की रणनीति और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के 2026 तक माओवादी सफाए के संकल्प के तहत माओवादियों पर कड़ी कार्रवाई की गई है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा के नेतृत्व में सुरक्षाबलों ने अब तक 200 से अधिक मुठभेड़ों में 440 से ज्यादा माओवादियों को मार गिराया है। अधिकारियों के अनुसार, इन अभियानों में सबसे अहम भूमिका DRG जवानों की रही है, जो जंगल की भौगोलिक स्थितियों और माओवादियों की रणनीतियों से भली-भांति परिचित हैं। वर्तमान में तीन हजार से अधिक DRG जवान बस्तर में सक्रिय हैं।

    इंजीनियर से आतंकी मास्टरमाइंड तक

    बसव राजू ने राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (NIT), वारंगल से बीटेक की पढ़ाई की थी। इसके बाद वह माओवादी आंदोलन से जुड़ गया और अपनी इंजीनियरिंग की समझ का उपयोग हथियार और विस्फोटक उपकरण (IED) बनाने में किया। 1987 में उसने लिट्टे (LTTE) के पूर्व लड़ाकों से गुरिल्ला युद्ध और विस्फोटक संभालने की तकनीक सीखी। बाद में वह माओवादी संगठन का केंद्रीय सैन्य आयोग प्रमुख और पोलित ब्यूरो सदस्य बना।

    उसने अबूझमाड़, गंगालूर और कर्रेगुट्टा क्षेत्र में कई अवैध हथियार फैक्ट्रियां स्थापित कीं, जहां टिफिन बम, कुकर बम, बैरल ग्रेनेड लांचर आदि तैयार किए जाते थे।

    छात्र राजनीति से माओवादी नेतृत्व तक का सफर

    1955 में आंध्रप्रदेश के श्रीकाकुलम जिले के जियान्नापेट गांव में जन्मे बसव राजू ने वामपंथी छात्र राजनीति से अपने करियर की शुरुआत की। 1980 के दशक में वह पीपुल्स वार ग्रुप से जुड़ा और 1992 में केंद्रीय समिति का सदस्य बना। 2004 में CPI (माओवादी) के गठन के बाद उसे महासचिव नियुक्त किया गया। वह अक्सर AK-47 लेकर चलता था और माओवादियों का थिंक टैंक माना जाता था।

    माओवाद के बड़े हमलों में उसकी भूमिका

    बसव राजू को कई बड़े माओवादी हमलों का मास्टरमाइंड माना जाता है:

    • ताड़मेटला (2010) – 76 CRPF जवान शहीद

    • झीरम घाटी (2013) – कांग्रेस नेताओं समेत 32 लोगों की मौत

    • चिंतागुफा (2017) – 25 जवान शहीद

    • टेकुलगुड़ेम (2021) – 21 जवान शहीद

    • किस्टाराम, मदनवाड़ा, एर्राबोर और अन्य हमलों में भी उसकी भूमिका प्रमुख रही।

    त्रिस्तरीय सुरक्षा को भी ध्वस्त किया

    बसव राजू त्रिस्तरीय सुरक्षा घेरे में रहता था। लेकिन DRG जवानों ने उसकी मौजूदगी की सूचना मिलते ही बीजापुर, दंतेवाड़ा और नारायणपुर से 2000 से ज्यादा जवानों को ऑपरेशन में लगाया। उन्होंने 10 किलोमीटर के दायरे में माओवादियों को चारों ओर से घेरकर भागने का कोई मौका नहीं दिया।

    फिलहाल, क्षेत्र में सर्च ऑपरेशन जारी है।

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