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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: “बहू अपनी सास के भरण-पोषण के लिए वेतन देने को बाध्य नहीं” – जानें पूरा मामला

सास-बहू केस: बिलासपुर हाईकोर्ट ने निचली अदालत का फैसला पलटा, जिसमें बहू को अनुकंपा नियुक्ति से मिली नौकरी की आय में से सास को हर महीने 10 हजार रुपए गुजारा-भत्ता देने का आदेश दिया गया था।

बिलासपुर (Saas Bahu Case): छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि अनुकंपा नियुक्ति को मृतक कर्मचारी की संपत्ति नहीं माना जा सकता। इसलिए बहू को अपने वेतन से सास का भरण-पोषण करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने बहू को सास को गुजारा भत्ता देने से मुक्त कर दिया।

जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की डिवीजन बेंच ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति, मृतक की व्यक्तिगत सेवा के बदले दी जाती है, न कि उसकी विरासत के रूप में। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने मनेंद्रगढ़ परिवार न्यायालय का वह आदेश रद्द कर दिया, जिसमें बहू को हर महीने सास को 10,000 रुपये देने को कहा गया था।

क्या है पूरा मामला?

एसईसीएल हसदेव के कर्मचारी भगवान दास की मौत वर्ष 2000 में हुई थी, जिसके बाद उनके बड़े बेटे ओंकार को अनुकंपा नियुक्ति मिली। लेकिन कुछ वर्षों बाद ओंकार की भी मृत्यु हो गई। इसके बाद उसकी पत्नी को केंद्रीय अस्पताल, मनेंद्रगढ़ में अनुकंपा के आधार पर नौकरी दी गई।

इसी दौरान ओंकार की मां ने परिवार न्यायालय, मनेंद्रगढ़ में याचिका दायर कर बहू से हर महीने 20,000 रुपये भरण-पोषण की मांग की। उन्होंने कहा कि वह 68 वर्ष की हैं, बीमार रहती हैं और मात्र 800 रुपये की पेंशन में उनका गुजारा नहीं हो रहा। इस पर अदालत ने बहू को सास को 10,000 रुपये मासिक देने का आदेश दिया, जिसे बहू ने हाई कोर्ट में चुनौती दी।

बहू की ओर से क्या तर्क दिए गए?

सुनवाई के दौरान बहू ने कहा कि उसकी मासिक आय केवल 26,000 रुपये है, जिससे वह अपनी और 6 वर्षीय बेटी की जिम्मेदारी निभा रही है। इसके अलावा, सास को 800 नहीं बल्कि 3,000 रुपये मासिक पेंशन मिलती है। उन्हें पति की मृत्यु के बाद बीमा के सात लाख रुपये भी प्राप्त हुए हैं। साथ ही, खेती से सालाना एक लाख रुपये की आमदनी होती है।

बहू ने यह भी बताया कि सास की देखभाल उनका छोटा बेटा उमेश करता है, जो एक निजी कंपनी में कार्यरत है और 50,000 रुपये मासिक कमाता है।

कोर्ट का निष्कर्ष

सभी तर्कों और तथ्यों को सुनने के बाद डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति मृतक कर्मचारी की संपत्ति नहीं होती। इस कारण, बहू को अपने वेतन से सास का भरण-पोषण देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। हाई कोर्ट ने परिवार न्यायालय का फैसला रद्द करते हुए बहू को राहत दी।

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