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    Home»छत्तीसगढ़»छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद: डर का दूसरा नाम डीआरजी, जिससे काँपते हैं माओवादी
    छत्तीसगढ़

    छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद: डर का दूसरा नाम डीआरजी, जिससे काँपते हैं माओवादी

    Chhattisgarh RajyaBy Chhattisgarh RajyaMay 28, 2025
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    नक्सलवाद
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    जगदलपुर: डर का दूसरा नाम बन चुकी है डीआरजी! बस्तर के आत्मसमर्पित माओवादियों और स्थानीय आदिवासी लड़ाकों से बनी डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड (डीआरजी) को देश-विदेश के रक्षा विशेषज्ञ गुरिल्ला युद्ध में सबसे प्रभावशाली और घातक बल मानते हैं। आज पूरे देश में इस बल की चर्चा जोर-शोर से हो रही है।

    सुरक्षा एजेंसियों के पास माओवादी प्रमुख बसव राजू की मात्र एक 45 साल पुरानी तस्वीर थी, जबकि देश के 16 माओवाद प्रभावित राज्यों की पुलिस भी उसे पकड़ नहीं पाई। लेकिन डीआरजी ने अबूझमाड़ में पिछले बुधवार को हुई मुठभेड़ में इसे मार गिराया।

    इस मुठभेड़ में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के महासचिव नंबाला केशव राव, दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी के सदस्य नागेश्वर राव उर्फ राजन्ना समेत 25 अन्य माओवादियों को भी मौत के घाट उतार दिया गया। ये सभी पीपुल्स लिब्रेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की कंपनी नंबर सात के सदस्य थे, जिसे डीआरजी ने पूरी तरह खत्म कर दिया। पिछले डेढ़ साल में बस्तर में लगभग 440 माओवादी मारे जा चुके हैं, जिसमें डीआरजी की भूमिका अहम रही है।

    2015 में पूर्ववर्ती रमन सरकार ने बस्तर में माओवाद के प्रभाव को कम करने के लिए डीआरजी बल का गठन किया था। नारायणपुर जिले में 600 पदों पर स्थानीय आदिवासी और आत्मसमर्पित माओवादियों की भर्ती की गई, जिनके पास जंगल की जानकारी, स्थानीय बोली और खुफिया नेटवर्क की समझ थी।

    अब दंतेवाड़ा, सुकमा, बीजापुर, कांकेर, कोंडागांव समेत पूरे संभाग में डीआरजी की संख्या लगभग 5000 है, जिनमें करीब 500 आत्मसमर्पित माओवादी शामिल हैं। 2019 में महिला कमांडो यूनिट की भी स्थापना हुई, जो अब लगभग 700 महिला कमांडो तक पहुंच चुकी है।

    डीआरजी की सफलता का राज है कड़ा प्रशिक्षण और अनुशासन। कांकेर के जंगलवार कैंप में इसके जवानों को देश के कई राज्यों और यहां तक कि श्रीलंका से बुलाए गए विशेषज्ञों द्वारा गुरिल्ला युद्ध की ट्रेनिंग दी जाती है। दंतेवाड़ा पुलिस अधीक्षक गौरव राय बताते हैं कि डीआरजी के जवान लगातार 12 घंटे तक कड़ी मेहनत करते हैं ताकि लंबे और थकाऊ अभियानों में वे बेहतर प्रदर्शन कर सकें। यह बल 70 किलो से अधिक वजन लेकर घने जंगल में तीन-चार दिन तक 100 किलोमीटर पैदल मार्च करने में सक्षम है।

    स्थानीय आदिवासियों और आत्मसमर्पित माओवादियों की मौजूदगी ने डीआरजी को जंगलों में बेहद मजबूत और दक्ष बना दिया है। कड़े प्रशिक्षण और आधुनिक हथियारों से लैस यह बल गुरिल्ला युद्ध में अब छत्तीसगढ़ का सबसे प्रभावशाली और खतरनाक सुरक्षा बल बन चुका है।

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