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    Home»लेख-आलेख»सत्ता, स्वार्थ और दलबदल का दौर…
    लेख-आलेख

    सत्ता, स्वार्थ और दलबदल का दौर…

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inMay 9, 2026
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    राजनीति विज्ञान को जब चंद्रगुप्त मौर्य के काल से जोड़ते हैं, तो हम पाते हैं कि उस समय नैतिक मूल्यों और आदर्शों की नींव पर राजनीति होती थी। यह इतनी शिक्षाप्रद थी कि वर्षों तक भारतीय राजनीति का सैद्धांतिक मार्ग बनी रही। किसी वक्त राजनीति का अर्थ राज्य की वह नीति होती थी जो लोक कल्याण और जनसेवा पर आधारित होती थी। यह शोषित और प्रताड़ित लोगों की मदद करती थी। राजनीति में मूल्यों और ईमानदारी का पाठ नेताओं को सही रास्ता दिखाता था। वे देश के उज्ज्वल भविष्य की नई तस्वीर गढ़ते थे।

    सच तो यह है कि वर्षों तक ऐसे नेताओं के संघर्ष और बलिदान की कहानियां आने वाली पीढ़ी के लिए प्रकाशस्तंभ बनती रहीं। तब करोड़ों लोगों को यह लगता था कि उनका भविष्य बेहतर हाथों में है। प्रगति के पथ पर बढ़ते कदम उसी राजनीति की देन थे। राजनीति में अपना लक्ष्य सिद्ध करने के लिए राजनीतिज्ञ साम, दाम, दंड, भेद की नीति का सहारा लेते हैं, लेकिन जब लक्ष्य ही बिगड़ जाए, तो यह नीति भी एक दिन काम नहीं आएगी।

    इसके अलावा पासा पलटने की नीति भी नेताओं ने अपना ली। इससे देशहित पीछे छूटने लगा। लोक कल्याण की भावना खत्म होने लगी। राजनीति में अपने और परिवार का हित देखा जाने लगा, तो दोहरा चेहरा भी उभरने लगा। परिवारवाद को गाली देने वाले खुद परिवार के पोषक बन गए। भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहिष्णुता की बात करने वाले ‘महाभ्रष्ट’ साबित हुए। नतीजा यह कि राजनीति का कुरूप चेहरा सामने आने लगा। कहीं न टिकने वाले नेता पासा पलट नीति का समर्थन करते हैं और इसी के बल पर देश में क्रांति के नारे लगाते हैं।

    आज राजनीतिक पटल पर दिन-रात इस तरह के तमाशे होते हैं। संघर्ष कर खड़ी हुई आदर्शवादी पार्टियां टूटती हैं और दल-बदल करने वाले नेता समय की जरूरत बन जाते हैं। सरकार ने राजनीति का चेहरा संवारने के लिए कानून बनाए। नेता अपनी सुविधा की सियासत न करें, जन कल्याण की बात करें, कुर्सी के लिए पार्टियां न बदलें और फिर पार्टियों के बदलने को न्यायसंगत न ठहराएं, इसके लिए दल-बदल विरोधी कानून भी बने। उनमें सख्ती भी लाई गई। इतनी सख्ती कि अगर किसी पार्टी के दो-तिहाई सदस्य बदलेंगे, तभी इसे माना जाएगा।

    मगर इस कानून को भी झांसा देने वाले नेताओं के चेहरे सामने आ गए। दल-बदल विरोधी कानून का अस्तित्व ही नहीं रहा। हाल में आम आदमी पार्टी से जुड़े राज्यसभा के सात सांसद राघव चड्ढा के नेतृत्व में पार्टी छोड़कर भाजपा में चले गए। उनके इस कदम पर खूब राजनीति हुई। कानून विशेषज्ञ अपनी राय देने लगे। दूसरी ओर खुद दल बदलने वाले दूसरों को गद्दार कहने लगे। मगर यह कड़वी सच्चाई है कि कुछ भी हो जाए, उसे बाद में स्वीकार कर ही लिया जाता है। कुछ समय बाद बदलाव की भूमिका बना दी जाती है।

    राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के दस सांसदों में से सात सांसदों के पार्टी छोड़ने पर सवाल तो उठे, लेकिन राजनीति में मूल्यों की कसौटी धरी रह गई। अलबत्ता, उनके इस कदम के गैर-कानूनी होने पर बहस तो चली, लेकिन वह कानूनी रूप से प्रमाणित सिद्ध हुई और सातों सांसदों को भाजपा में विलय की इजाजत दे दी गई। ये सांसद दल-बदल कानून के दायरे में नहीं पाए गए।

    एक कसौटी होती है तकनीकी और एक कसौटी होती है नैतिकता की। जो बात तकनीकी कसौटी पर पूरी उतरे, वह जरूरी नहीं है कि नैतिकता की कसौटी पर भी पूरी उतरे। आप के बागी नेताओं के भाजपा में जाने के बाद उनके बयान भी आने लगे, जिनमें वे अपने आप को सही ठहराने की कोशिश करते रहे। यह सही ठहराने की कोशिश भी जैसे राजनीति बन गई है।

    जब भ्रष्ट नेता पकड़ा जाता है, तो वह इसे बदले की राजनीति कहता है और किसी भी अपराध में पकड़ा गया नेता हिरासत में रहने पर जमानत पर छूटता है, तो उसका ऐसे स्वागत होता है जैसे वह किला फतह करके आया हो। राजनीति का यह नया पाठ हमें कहां ले जाएगा? जनता के हित जिस तरह से हाशिये पर जा रहे हैं, यह चिंता का विषय है।

    इस नई राजनीति को केवल राज्य स्तर पर ही नहीं, वैश्विक स्तर पर भी हम देखते हैं। अब वैश्विक स्तर पर हथियार बेचने के लिए वर्षों और महीनों तक युद्ध होते हैं या कराए जाते हैं, चाहे इससे दुनिया भर में अराजकता ही क्यों न फैल जाए। वैश्विक नेताओं की नीतियों में सिवाय उनके अहम के कुछ भी नजर नहीं आता।

    आज की नई राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप प्रमुख हो गया है। बाकी बातें गौण हो रही हैं। यह चिंता की बात है। देश की राजनीति में सैद्धांतिक आधार गुम हो जाते हैं, जातीय आधार प्रबल हो जाते हैं। इसीलिए जाति जनगणना को युगप्रवर्तक फैसला कहा जाने लगता है।

    आजादी के बाद से हम पिछड़े नागरिकों को नया जीवन देने की बात करते आए हैं, उनके लिए आरक्षण की व्यवस्था करते रहे हैं। मगर पिछड़े हुए फिर भी पिछड़े ही रहते हैं। जब अति पिछड़े लोग भी नजर आने लगे, तो इनके तुष्टीकरण की भी राजनीति होने लगी और उसी की पक्षधरता जनसेवा बन गई।

    राज्यों में सरकारें बदल जाती हैं, लेकिन सैद्धांतिक कसौटी का भी तो कोई ख्याल रखना चाहिए। परिस्थितियों के बदल जाने का लाभ उठाने की कोशिश ने विचारधारा को गायब कर दिया है। दलबदलू नेताओं के लिए अब दल-बदल कानून कोई बाधा नहीं रही। ऐसी हालत में सात सांसदों का अपनी पार्टी का दामन छोड़कर चले जाना और उनको दूसरे दल में स्वीकृति मिल जाना, एक गंभीर संकेत है।

    कल को किसी राज्य में अगर सत्तारूढ़ दल का स्पष्ट बहुमत है और वहां भी दो-तिहाई नेता उसका दामन छोड़कर चले जाते हैं, तो काम करती अच्छी-भली सरकार के गिरने का अंदेशा पैदा हो सकता है। अब ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक जीवन से नैतिकता और आदर्श गायब हो चुके हैं। उनके स्थान पर स्वार्थपरकता और हित हावी होने लगे हैं।

    दल-बदल की ऐसी घटनाएं एक पार्टी या एक राज्य तक सीमित नहीं हैं। ज्यादातर पार्टियों को अपने आधार हिलते नजर आते हैं। मजबूत संगठन वाली पार्टियां भी दूसरे दलों से आए लोगों का स्वागत करने लगी हैं, बिना परवाह किए कि उनके पास वह प्रशिक्षण है भी या नहीं, जो वे अपने कार्यकर्ताओं को देती हैं। हर नेता जनकल्याण के नाम पर अपने गुट का कल्याण करता हुआ नजर आता है। अब युवा पीढ़ी क्या इस तरह की राजनीति करेगी?

    देश की आर्थिक गति उत्थान पर है। विकास दर की गति तेजी से बढ़ रही है। मगर दूसरी ओर बड़ी आबादी सस्ते और मुफ्त अनाज पर पल रही है। वहीं अरबपतियों की संख्या बढ़ती जा रही है। गरीबी, बेरोजगारी और भुखमरी की बात कोई नहीं करता। ऐसे माहौल में साम, दाम, दंड और भेद का नीतिविहीन चेहरा स्थापित होता नजर आता है। इस विसंगति से कैसे बचा जाए, इस पर सोचना होगा।

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