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    Home»राजनीति»कभी कांग्रेस का मजबूत गढ़ थी भबानीपुर सीट…
    राजनीति

    कभी कांग्रेस का मजबूत गढ़ थी भबानीपुर सीट…

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inMarch 22, 2026
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    कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति के लगातार बदलते परिदृश्य में भबानीपुर जैसी कुछ ही सीटें हैं, जिनके साथ इतिहास और प्रतीकात्मक महत्व इतनी गहराई से जुड़ा हुआ है। यह केवल एक विधानसभा क्षेत्र नहीं, बल्कि वह राजनीतिक सफर है जो राज्य में कांग्रेस के लंबे प्रभुत्व से लेकर तृणमूल कांग्रेस के उभार तक के बदलाव को साफ तौर पर दर्शाता है। आज मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का राजनीतिक गढ़ मानी जाने वाली भबानीपुर सीट हमेशा से तृणमूल कांग्रेस की पहचान नहीं रही। आजादी के बाद दशकों तक दक्षिण कोलकाता की यह सीट कांग्रेस का मजबूत गढ़ थी और राज्य के कई प्रभावशाली नेताओं का राजनीतिक आधार रही।

    कभी कांग्रेस का था कब्जा

    पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे ने इस सीट से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में और बाद में निर्दलीय के तौर पर चुनाव जीता। कांग्रेस के अन्य दिग्गज नेताओं जैसे मीरा दत्ता गुप्ता और रथिन तालुकदार ने भी इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया, जिससे भबानीपुर कांग्रेस का प्रमुख शहरी गढ़ बन गया। कई वर्षों तक यह सीट कांग्रेस के प्रभाव में रही, जबकि वामपंथी दल उस समय केवल 1969 में थोड़े समय के लिए यहां जीत हासिल कर सके, जब इस सीट का नाम बदलकर कालीघाट विधानसभा क्षेत्र कर दिया गया था। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नेता साधन गुप्ता ने बांग्ला कांग्रेस और माकपा की संयुक्त मोर्चा की दूसरी सरकार के दौरान यह सीट जीती। वह 1953 में भारत के पहले दृष्टिहीन सांसद बने थे।

    1972 में परिसीमन के बाद चुनावी नक्शे से ही गायब हुआ भबानीपुर

    भबानीपुर की राजनीतिक यात्रा ने तब अप्रत्याशित मोड़ ले लिया जब यह सीट 1972 में परिसीमन के बाद चुनावी नक्शे से ही गायब हो गई। लगभग चार दशकों तक यह सीट केवल राजनीतिक स्मृतियों में ही बनी रही। जब 2011 के परिसीमन के दौरान यह सीट दोबारा अस्तित्व में आई तब पश्चिम बंगाल की राजनीति भी बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही थी। उसी वर्ष वाम मोर्चा के 34 साल के शासन का अंत हुआ और ममता बनर्जी का दौर शुरू हुआ। नए सिरे से बनी भबानीपुर सीट जल्द ही तृणमूल के उभार से जुड़ गई। बनर्जी ने 2011 के पहले चुनाव में अपने करीबी सहयोगी सुब्रत बक्शी को इस सीट से उम्मीदवार बनाया।

    कैसे बना तृणमुल का मजबूत गढ़ बना भबानीपुर

    बक्शी ने 64 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल कर माकपा के नारायण जैन को करीब 50,000 वोट से हराया और भबानीपुर को तृणमूल का मजबूत गढ़ बना दिया। इसके बाद बक्शी ने सीट छोड़ दी ताकि तृणमूल की भारी जीत के बाद मुख्यमंत्री बनीं ममता बनर्जी उपचुनाव के जरिए विधानसभा में प्रवेश कर सकें। बनर्जी ने करीब 77 प्रतिशत वोट हासिल कर माकपा की नंदिनी मुखर्जी को 54,000 से अधिक मतों से हराया और भबानीपुर में अपना मजबूत राजनीतिक आधार स्थापित किया। तब से यह सीट तृणमूल के कब्जे में बनी हुई है।

    भबानीपुर में कई हाई-प्रोफाइल मुकाबले

    वर्षों से भबानीपुर में कई हाई-प्रोफाइल मुकाबले हुए, लेकिन नतीजा नहीं बदला। वर्ष 2016 के विधानसभा चुनाव में वाम दलों और कांग्रेस ने गठबंधन कर वरिष्ठ कांग्रेस नेता दीपा दासमुंशी को बनर्जी के खिलाफ उतारा। इस मुकाबले को ‘’दीदी बनाम बौदी’ के रूप में पेश किया गया। बनर्जी ने 65,520 वोट हासिल कर दासमुंशी (40,219 वोट) को आसानी से हराया। बीजेपी के चंद्र कुमार बोस तीसरे स्थान पर रहे, जो नेताजी सुभाष चंद्र बोस के परिवार से ताल्लुक रखते हैं। पांच साल बाद 2021 के विधानसभा चुनाव में बनर्जी ने नंदीग्राम से चुनाव लड़ने का फैसला किया, जहां उनका मुकाबला उनके पूर्व सहयोगी शुभेंदु अधिकारी से हुआ।

    ममता ने लड़ा था उपचुनाव

    भबानीपुर से तृणमूल ने शोवनदेव चट्टोपाध्याय को उम्मीदवार बनाया, जबकि बीजेपी ने अभिनेता रुद्रनील घोष को मैदान में उतारा। घोष को 44,786 वोट मिले, जो इस सीट पर किसी विपक्षी उम्मीदवार को अब तक मिले सबसे ज्यादा वोट थे। लेकिन वह 28,000 से अधिक वोटों से हार गए। उसी वर्ष यह सीट और अधिक महत्वपूर्ण हो गई। नंदीग्राम में अधिकारी से 1,956 वोटों से हारने के बाद ममता बनर्जी को मुख्यमंत्री बने रहने के लिए उपचुनाव जीतना जरूरी था। एक बार फिर भबानीपुर केंद्र में आया। चट्टोपाध्याय ने सीट खाली की और बनर्जी ने बीजेपी की प्रियंका टिबरेवाल के खिलाफ उपचुनाव लड़ा। बनर्जी ने 58,000 से अधिक वोटों के अंतर और लगभग 72 प्रतिशत मतों के साथ जीत हासिल की जिससे भबानीपुर उनकी सबसे भरोसेमंद सीट के रूप में स्थापित हो गया।

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