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    Home»लेख-आलेख»‘रिजर्व करंसी’ का दर्जा छोडऩे को डॉलर तैयार नहीं…
    लेख-आलेख

    ‘रिजर्व करंसी’ का दर्जा छोडऩे को डॉलर तैयार नहीं…

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inFebruary 12, 2026
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    2026 की शुरुआत के साथ ही 2 महत्वपूर्ण घटनाएं घटीं। पहली घटना यह थी कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती देने के लिए ‘मजबूत युआन’ का स्पष्ट आह्वान किया, वहीं दूसरी ओर, अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने गिरते डॉलर को लेकर जताई जा रही चिंताओं को ‘नहीं, यह तो बढिय़ा है’ कह कर खारिज कर दिया। यह सच है कि शी ने यह बात 2024 में एक बंद मंच पर कही थी, लेकिन चीनी अधिकारियों ने इसे इसी साल सार्वजनिक किया। यह भी सच है कि ट्रम्प लगभग 4 दशकों में डॉलर की बात करने वाले पहले अमरीकी राष्ट्रपति हैं।पहले अमरीकी डॉलर के विभिन्न ऐतिहासिक चक्रों पर एक संक्षिप्त नजर डालें। सबसे पहला चक्र 1971 में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन द्वारा ब्रेटन वुड्स समझौते के तहत स्वर्ण मानक और डॉलर की स्वर्ण में परिवर्तनीयता को निलंबित करने की चौंकाने वाली  घोषणा से शुरू होता है। तब से, डॉलर के 7 प्रमुख चक्र रहे हैं। पहला, 1971-1978: स्वर्ण मानक छोडऩे के बाद अस्थिरता। दूसरा, 1978-1985: डॉलर में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। 

    तीसरा चरण, 1985-1992: प्लाजा समझौता और व्यापारिक सांझेदारों के सहयोग से डॉलर के मूल्य में नियोजित अवमूल्यन।
    चौथा चरण, 1992-2002: मजबूत डॉलर का युग, जिसमें अमरीका एकमात्र वैश्विक महाशक्ति था।
    पांचवां चरण, 2002-2012: अमरीका द्वारा महत्वपूर्ण मौद्रिक नीति में ढील देने के कारण डॉलर का मूल्य कम हुआ, जबकि उभरते बाजारों में तेजी आई।

    छठा चरण, 2012-2022: मजबूती का एक दशक, जो 2022 के आसपास उच्चतम स्तर पर पहुंचा। सातवां चरण, 2022-2026: डॉलर नए शिखर पर पहुंचा लेकिन 2022 के मध्य में गिरावट शुरू हुई जो 2025 में और तेज हो गई।
    आज, डी.एक्स.वाई. डॉलर सूचकांक (छह मुद्राओं की एक टोकरी के मुकाबले) अपने 2022 के उच्चतम स्तर से लगभग 13 प्रतिशत नीचे है, अपने 2008 के न्यूनतम स्तर से 30 प्रतिशत ऊपर है और पूर्ण अवधि के रुझान के ठीक मध्य में है। साथ ही, सोना, जिसे कभी-कभी ‘एंटी-डॉलर’ कहा जाता है और चांदी, तांबा और प्लैटिनम जैसी अन्य धातुएं हाल ही में अपने सर्वकालिक उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हैं (हालिया बिकवाली के साथ)।  इससे कुछ विश्लेषकों ने इसे ‘डॉलर का अवमूल्यन’ कहना शुरू कर दिया है। मुद्राओं के संदर्भ में, अवमूल्यन एक गंभीर शब्द है। इस शब्द के लागू होने के लिए निम्नलिखित चारों शर्तों का पूरा होना आवश्यक है-एक, मुद्रा आपूर्ति में भारी वृद्धि, जिसे आमतौर पर एम2 वृद्धि द्वारा मापा जाता है; दो, बड़ा राजकोषीय और चालू खाता घाटा; तीन, आसान मौद्रिक नियंत्रण परिस्थितियां, जो आमतौर पर मात्रात्मक सहजता की नीति द्वारा चिह्नित होती हैं और चौथी, देश के आर्थिक प्रबंधन में कम विश्वास।

    इन चार मापदंडों के आधार पर, आज अमरीका की स्थिति कुछ इस प्रकार है। एम2 द्वारा मापी गई वार्षिक मुद्रा आपूर्ति वृद्धि 5 प्रतिशत है, जो काफी सामान्य है। अमरीका का राजकोषीय घाटा काफी अधिक है (2025-26 के लिए सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 5.5 प्रतिशत अनुमानित) और इसका राष्ट्रीय ऋण 39 ट्रिलियन डॉलर है। एक असामान्य स्थिति यह है कि इसमें से 9 ट्रिलियन डॉलर का पुर्नवत्तपोषण 2026 में होना है, जिससे बॉन्ड यील्ड पर दबाव बढ़ सकता है। अमरीका सकारात्मक वास्तविक दरों और मात्रात्मक सख्ती के संयोजन के साथ मध्यम रूप से सख्त मौद्रिक स्थितियों में काम कर रहा है। हाल के समय में डॉलर के ‘सामान्यीकरण’ की प्रक्रिया तेज हुई है और आज अमरीका को मुद्रा अवमूल्यन का खतरा नहीं है। यह मुख्य रूप से अमरीकी अर्थव्यवस्था के प्रति लोगों की भावना पर निर्भर करता है। प्रबंधन ने डॉलर को कमजोर कर दिया है। पिछले करीब एक साल से भारतीय रुपया उन मुद्राओं में से एक रहा है, जिनकी कीमत डॉलर के कमजोर होने के कारण कम हुई है। आम धारणा के विपरीत, 2025 में विनिमय दर में भारी गिरावट के बावजूद, पिछले कुछ वर्षों में रुपए का वाॢषक अवमूल्यन केवल 3.1 प्रतिशत रहा है। पिछले 25 वर्षों में रुपए के लिए सबसे खराब 3 साल की अवधि 2011-13 थी, जिसमें ‘टैपर टैंट्रम’ और डॉलर का अपने आधार पर लौटना शामिल था, जिसने डॉलर की मजबूती के दौर का भी संकेत दिया था।

    आज भारत की आर्थिक वृद्धि मजबूत है और महामारी के बाद से हमने राजकोषीय सुदृढ़ीकरण को बनाए रखा है। अमरीका के मुकाबले सापेक्ष मुद्रास्फीति अब 25 वर्षों में सबसे कम है और इसमें गिरावट का रुझान दिख रहा है। अमरीका के साथ जल्द ही लागू होने वाले नए व्यापार समझौते को देखते हुए, रुपए-डॉलर विनिमय दर के लिए संभावनाएं सकारात्मक दिखती हैं और यह मुद्रास्फीति के अंतर से कहीं बेहतर प्रदर्शन कर सकती है। साथ ही, भारतीय रिजर्व बैंक के पास 700 अरब डॉलर से अधिक का अब तक का सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार है, जो रुपए में किसी भी अप्रत्याशित गिरावट को रोकने में सक्षम है। 

    अमरीका की मिश्रित औसत टैरिफ दर में एकल-अंकीय से दोहरे-अंकीय स्तर तक की वृद्धि डॉलर पर ऊपर की ओर (नीचे की ओर नहीं) दबाव डालती है। आगामी समय में ट्रेजरी के पर्याप्त पुनॢवत्तपोषण को लेकर चिंताएं 2026 में डॉलर को कमजोर कर सकती हैं। हालांकि अंतर्राष्ट्रीय केंद्रीय बैंक डॉलर से हटकर विविधीकरण कर सकते हैं, जिससे डॉलर का प्रभुत्व कुछ हद तक कम हो सकता है लेकिन विश्व की आरक्षित मुद्रा (रिजर्व करंसी) के रूप में इसका स्थान खोना अभी बहुत दूर की बात है। डॉलर के बाहर किए जाने वाले द्विपक्षीय व्यापार का हिस्सा एक छोटे प्रतिशत से बढ़कर एक उच्च आंकड़े तक पहुंच सकता है। भले ही ट्रम्पवाद के कई सामाजिक पहलू उनके राष्ट्रपति पद के दौरान बने रहें लेकिन डॉलर की आरक्षित मुद्रा स्थिति को ‘असाधारण विशेषाधिकार’ की बजाय बोझ के रूप में देखने का नजरिया शायद ही कायम रहेगा। चीन अपने रेनमिनबी को आरक्षित मुद्रा के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है लेकिन इसके लिए आवश्यक संस्थागत विश्वसनीयता में कम से कम एक दशक लगेगा। इससे पहले के लगभग 5 राष्ट्रपति कार्यकालों की तरह, अमरीका जल्द ही ‘मजबूत डॉलर’ की उस नीति पर लौट आएगा, जो पिछले 40 वर्षों से देश की पहचान रही है। अवमूल्यित डॉलर से अमरीका को फिर से महान नहीं बनाया जा सकता।-नारायण रामचंद्रन

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