ये ठीक नहीं कि आप जवान आबादी को, चाहे वह लडक़ा हो या लडक़ी, घर पर बैठा दो और सिर्फ इसलिए फ्रीबीज दे दो, ताकि वे आपके लिए वोट करें। ऐसा करके आप न सिर्फ बेकार लेबर बना रहे हैं, बल्कि सिस्टम में एक तरह का नुकसानदेह लेबर बना रहे हैं, जो आलसी हो जाता है। ऐसे लोग फिर दूसरी तरह की गलत हरकतों में पड़ जाते हैं, क्योंकि उनके पास करने को कुछ नहीं होता। 2019 में एक राजनीतिक दल ने अपने इलेक्शन मेनिफेस्टो में कहा था कि वह गरीबी रेखा से नीचे वालों को हर साल निश्चित रुपए देगा। ध्यान रहे कि यह टारगेटेड या यूनिवर्सल बेसिक इनकम भी फ्रीबीज का ही एक रूप है…
देश में मुफ्त बांट यानी फ्रीबीज की घोषणाएं इन दिनों सामाजिक गलियारों में एक प्रमुख चर्चा और चिंता का विषय बनी हुई हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने भी सत्ताधीशों द्वारा मुफ्त की चीजें इत्यादि बांटने पर गहरी नाराजगी जताई है। माननीय कोर्ट का सही मानना है कि इससे लोग काम करने की बजाय मुफ्त सुविधाओं पर निर्भर हो रहे हैं। इस तरह की योजनाएं राज्यों की अर्थव्यवस्था पर बोझ बन रही हैं। असल मे मुफ्तबांट के चक्कर में राज्यों का पूंजीगत खर्च कम हो रहा है, जिससे विकास कार्य प्रभावित हो रहे हैं। मुफ्त बांटने के कारण कई राज्यों पर भारी कर्ज (जीडीपी का 40 फीसदी से अधिक) होने की बात सामने आई है, जहां आय का बड़ा हिस्सा सिर्फ सबसिडी में जा रहा है। एक सर्वेक्षण के अनुसार 55 फीसदी लोग मुफ्त की योजनाओं को बंद करने के पक्ष में हैं, जबकि 77 फीसदी का मानना है कि ये योजनाएं लोगों को कामचोर बना रही हैं। मुफ्त बांट के चलते देश के लगभग हर राज्य की वित्तीय हालत खराब हो रही है। केंद्र सरकार की रिपोर्ट में भी इस पर चिंता जताई गई है। अनेक राज्यों की अर्थव्यवस्था के लिए मुफ्तबांट अब बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट बताती है कि पिछले साल एक राज्य के विधानसभा चुनाव से पहले 38000 करोड़ रुपए खर्च किए गए। इसके बाद सरकार के पास जरूरी खर्चों के लिए पैसे ही नहीं बचे।
नतीजतन, बिजली दरें बढ़ीं, बुनियादी ढांचा से जुड़े कामकाज ठप पड़ गए। पिछले कुछ बरसों में देश में मुफ्त कल्याणकारी योजनाएं तेजी से बढ़ी हैं। इससे राजस्व खर्च बढ़ रहा है। बढ़ा हुआ राजस्व खर्च विकास कार्यों पर असर डालता है। सडक़, पुल, बांध जैसे इंफ्रा प्रोजेक्ट पर यही पैसा लगाया जा सकता था। ऐसा नहीं होने पर रोजगार सृजन प्रभावित होता है। स्कूल-कॉलेज और कौशल विकास में सुस्ती से भविष्य में तरक्की धीमी हो सकती है। व्यवस्था ऐसी योजनाओं के आर्थिक दबाव में आएगी, फिर आर्थिक तरक्की कैसे होगी? अगले दो वर्षों में हमारे सामने आर्थिक मोर्चे पर सबसे बड़ी चुनौती हो सकती है। साथ ही, अगले साल की शुरुआत में आठवें वेतन आयोग के तहत नया वेतनमान लागू करना होगा, जिससे राज्यों को भी वेतन बढ़ाना पड़ेगा। यह वर्ग बड़ा वोटर भी है। सीमित खजाने और सिकुड़ते संसाधनों के बीच मुफ्त योजनाओं और विकास कार्यों का संतुलन बनाए रखना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। आर्थिक दबाव, महंगाई और चुनावी योजनाओं का तालमेल अब कठिन होता दिख रहा है। पिछले दिनों कई राज्यों में लोकलुभावन वादे पूरे करने में बजट की समस्या देखने को मिली। वोटरों को लुभाने के लिए फ्रीबीज अर्थव्यवस्था के लिए ठीक नहीं है। फ्रीबीज यानी रेवड़ी में अक्सर वे चीजें होती हैं, जो लोगों को सक्षम बनाने का काम नहीं करतीं। हमें फ्रीबीज को तरक्की के वादों से अलग करना होगा। अगर हम अपने संविधान की बात करें, तो उसके एक अनुच्छेद में साफ लिखा है कि राज्य को लोगों की आमदनी में असमानता कम करने की कोशिश करनी चाहिए। उसे स्टेटस, सुविधाओं और मौकों में जो नाइंसाफी है, उसे खत्म करने की कोशिश करनी चाहिए। इस नजरिए से देखें, तो बहुत जरूरी हो जाता है कि कुछ ऐसी चीजें हों जो लोगों की जिंदगी का स्तर ऊपर उठाएं और उनके लिए मौके बनाएं। नौकरी पैदा करना, रोजगार देना, या स्किल डिवेलप करना- ये राज्य की कुछ अहम जिम्मेदारियां हैं। लेकिन फ्रीबीज कल्चर के साथ दिक्कत यह है कि इसमें आप तरक्की के लिए सही माहौल नहीं बना रहे होते।
आप एक आलसी और बेकार वर्कफोर्स बनाते हैं, जो बस घर पर बैठकर सबसिडी का मजा लेगी। न तो आप वर्कफोर्स को ट्रेनिंग दे रहे हैं, न ही उनके लिए ऐसे मौके बना रहे हैं, जिनमें वे किसी तरह से राष्ट्रीय आय और ग्रोथ में योगदान दे सकें। यही वह बिंदु है, जहां रोजगार के हालात बनाने या स्किल्ड लेबर तैयार करने और उस लेबर को बेकार बैठा देने के बीच फर्क साफ दिखता है। इकॉनमी के लिए यह स्थिति उलटी पड़ती है कि लोगों को घर बैठाकर उन्हें कुछ रुपए तक दे दिया जाए। असली वेलफेयर ऑफर हैं, जो सच में भलाई करते हैं। भलाई आप तब कर सकते हैं, जब आप लोगों के लिए रोजगार और स्वरोजगार पैदा करें, बेहतर सामाजिक सुरक्षा यानी सोशल सिक्योरिटी दे और सोशल सिक्योरिटी तब देनी चाहिए, जब कोई मुसीबत में हो, या फिर बुजुर्गों के लिए बेहतर सोशल सिक्योरिटी बनानी चाहिए। ये ठीक नहीं कि आप जवान आबादी को, चाहे वह लडक़ा हो या लडक़ी, घर पर बैठा दो और सिर्फ इसलिए फ्रीबीज दे दो, ताकि वे आपके लिए वोट करें। ऐसा करके आप न सिर्फ बेकार लेबर बना रहे हैं, बल्कि सिस्टम में एक तरह का नुकसानदेह लेबर बना रहे हैं, जो आलसी हो जाता है। ऐसे लोग फिर दूसरी तरह की गलत हरकतों में पड़ जाते हैं, क्योंकि उनके पास करने को कुछ नहीं होता। 2019 में एक राजनीतिक दल ने अपने इलेक्शन मेनिफेस्टो में कहा था कि वह गरीबी रेखा से नीचे वालों को हर साल निश्चित रुपए देगा। ध्यान रहे कि यह टारगेटेड या यूनिवर्सल बेसिक इनकम भी फ्रीबीज का ही एक रूप है। इतना पैसा देना भी इकनॉमिक्स में एक फिनॉमिना को जन्म देता है, जो खासकर विकासशील और अविकसित देशों में देखा जाता है। इसे कहते हैं ‘बैकवर्ड बेंडिंग लेबर सप्लाई कर्व’, इसका मतलब ये कि लोग खुद मेहनत करने की कोशिश ही नहीं करेंगे।
अगर उन्हें बिना कुछ किए इतना पैसा मिल रहा है, तो वे प्रोडक्टिव कामों में हिस्सा क्यों लेंगे? यूनिवर्सल बेसिक इनकम विकसित देशों में काफी जगहों पर चलता है, लेकिन वहां का सिस्टम अलग है। वहां सोशल सिक्योरिटी का लेवल बहुत ऊंचा है, और वह ज्यादा बराबरी वाला है। साथ ही, उन देशों की प्रति व्यक्ति आय भी एक खास लेवल तक पहुंच चुकी है। हालांकि यूनिवर्सल बेसिक इनकम विकसित देशों में काफी जगहों पर चलता है, लेकिन वहां का सिस्टम अलग है। वहां सोशल सिक्योरिटी का लेवल बहुत ऊंचा है, और वह ज्यादा बराबरी वाला है। साथ ही, उन देशों की प्रति व्यक्ति आय भी एक खास लेवल तक पहुंच चुकी है। लेकिन यहां अगर हम फ्रीबीज के चक्कर में पड़ गए तो हम अपनी डेमोग्राफिक डिविडेंड, यानी अपनी जवान आबादी का फायदा नहीं उठा पाएंगे। हमारी 65 फीसदी आबादी 30 साल से कम उम्र की है, और 55 फीसदी से ज्यादा आबादी 25 साल से कम की। हमारा डेमोग्राफिक डिविडेंड वर्ष 2045-2047 तक रहेगा, फिर खत्म हो जाएगा। हमें एक दिन इस मुफ्तबांट के कल्चर से बाहर निकलना ही होगा। क्यों न ऐसे हालात बनाए जाएं, जिसमें हमारी वर्कफोर्स सिर्फ देश की राष्ट्रीय आय में योगदान ही न दे, बल्कि सही मायने में रोजगार भी पाए। हमें तो यह भी विचारना होगा कि मुफ्त बांट से क्या हमारी कार्य संस्कृति पर नकारात्मक प्रभाव तो नहीं पड़ेगा।-डा. वरिंद्र भाटिया

