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    Home»राष्ट्रीय»इच्छामृत्यु की प्रक्रिया के बीच हरीश राणा की मां की मार्मिक पुकार,‘हे प्रभु मेरे बेटे को इतना दुख न देना कि मुझसे देखा न जाए अब मेरे बेटे को और मत तड़पाना’…
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    इच्छामृत्यु की प्रक्रिया के बीच हरीश राणा की मां की मार्मिक पुकार,‘हे प्रभु मेरे बेटे को इतना दुख न देना कि मुझसे देखा न जाए अब मेरे बेटे को और मत तड़पाना’…

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inMarch 18, 2026
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    गाजियाबाद के 31 वर्षीय हरीश राणा, जो पिछले 13 वर्षों से ‘ब्रेन डेड’ की स्थिति में बिस्तर पर अचेत पड़े थे, अब अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘पैसिव इच्छामृत्यु’ की ऐतिहासिक अनुमति मिलने के बाद उन्हें दिल्ली के एम्स अस्पताल में स्थानांतरित किया गया है। इसी बीच हरीश की मां का एक बयान सामने आया है जो दिल को झकझोर देने वाली है। दरअसल, उनकी मां ने भागवान से प्रार्थना करते हुए कहा है कि हे प्रभु मेरे बेटे को इतना दुख न देना कि मुझसे देखा न जाए। 13 साल तक हमने हाथ जोड़कर मिन्नतें कीं, मन्नतें मांगीं, लेकिन मेरा हरीश एक शब्द न बोल सका।

    आपको बता दें कि मेडिकल प्रोटोकॉल के तहत डॉक्टरों ने उनका ऑक्सीजन सपोर्ट हटा दिया है और मंगलवार से उन्हें नली के जरिए पानी देना भी बंद कर दिया गया है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, आहार और जल के अभाव में अब उनके पास केवल कुछ ही दिनों का समय शेष है। यह मामला न केवल कानूनी बल्कि मानवीय संवेदनाओं की भी एक कठिन परीक्षा है।

    एम्स में शुरू हुई अंतिम विदाई की प्रक्रिया

    डॉक्टरों का अनुमान है कि आहार और जल त्यागने के बाद मानव शरीर सामान्यतः एक से दो सप्ताह तक जीवित रह सकता है। इस कठिन समय में एम्स प्रशासन ने मानवीय आधार पर हरीश के माता-पिता, निर्मला देवी और अशोक राणा को उनके वार्ड के पास ही ठहरने की अनुमति दी है, ताकि वे अंतिम समय में अपने बेटे के करीब रह सकें।

    हरीश की माता के साथ अस्पताल में मौजूद एक करीबी परिचित ने बताया कि पूरा परिवार इस असहनीय पीड़ा से गुजर रहा है। उन्होंने कहा, ‘हरीश का शरीर भले ही हमसे दूर जा रहा हो, लेकिन वह हमेशा हमारी यादों में जीवित रहेगा।’ बता दें कि साल 2011 में एक हादसे के बाद हरीश ‘ब्रेन डेड’ (कोमा) की स्थिति में चले गए थे। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने माता-पिता की दया याचिका स्वीकार करते हुए उन्हें इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिसके बाद 14 मार्च को उन्हें गाजियाबाद की राज एंपायर सोसाइटी से एम्स शिफ्ट किया गया था।

    असल में यह संवेदनशील पहल हरीश राणा के माता-पिता के उस दृढ़ फैसले का हिस्सा है, जिसमें उन्होंने अपने बेटे के निधन के बाद उसके अंग दान करने का निर्णय लिया है। उनका मानना है कि भले ही उनके बेटे का जीवन समाप्ति की ओर हो, लेकिन उसके अंग कई जरूरतमंद मरीजों के लिए नई उम्मीद बन सकते हैं और उन्हें जीवनदान दे सकते हैं।

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