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    Home»लेख-आलेख»होर्मुज संकट और भारत की रणनीति…
    लेख-आलेख

    होर्मुज संकट और भारत की रणनीति…

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inMarch 22, 2026
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    पश्चिम एशिया में बढ़ता संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य में प्रभावी व्यवधान ने एक बार फिर एक कड़वे सच को उजागर कर दिया है-भारत की ऊर्जा सुरक्षा अपनी सीमाओं से बहुत दूर भू-राजनीतिक झटकों के प्रति गहरी संवेदनशील बनी हुई है। जैसे-जैसे भारत $5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था और एक वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने की आकांक्षा रखता है, उसकी ऊर्जा जीवनरेखाओं की भंगुरता एक रणनीतिक चिंता है। भारत के कच्चे तेल के आयात का एक बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है, जो एक संकीर्ण समुद्री गलियारा है और वैश्विक तेल व्यापार के लगभग पांचवें हिस्से को संभालता है। बढ़ते तनाव के कारण वहां से गुजरने वाले जहाजों के बीमा प्रीमियम में भारी उछाल आया है। टैंकर ऑप्रेटर या तो अधिक माल ढुलाई दर वसूल रहे हैं या इस मार्ग से पूरी तरह बच रहे हैं। यहां तक कि अमरीकी युद्धपोतों की उपस्थिति भी सीमित आश्वासन ही दे पाती है। 

    वैश्विक ऊर्जा व्यापार के चोक पॉइंट्स और नाजुक जीवन रेखाएं : अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा व्यापार स्वाभाविक रूप से नाजुक है क्योंकि यह कुछ महत्वपूर्ण समुद्री चोक प्वॉइंट्स के माध्यम से केंद्रित है। पश्चिम से पूर्व की ओर ऐसी 6 वैश्विक धमनियां हैं, जिनके नाम हैं-स्वेज नहर और बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य, होर्मुज जलडमरूमध्य, मलक्का जलडमरूमध्य, सुंडा जलडमरूमध्य और गहरा लोम्बोक जलडमरूमध्य, जिसका उपयोग 2,00,000-3,20,000 डैड वेट टनेज वाले बहुत बड़े और अत्यंत बड़े कच्चे तेल के वाहकों द्वारा किया जाता है।

    भौगोलिक दृष्टि से, ऊर्जा का प्रवाह काफी हद तक पश्चिम से पूर्व की ओर होता है। भारत के लिए इसका मतलब है कि जहां स्वेज नहर या बाब अल-मंडेब में व्यवधान का ऊर्जा सुरक्षा पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है और मलक्का या सुंडा और लोम्बोक जलडमरूमध्य में रुकावटें पूर्वी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं को चोट पहुंचाती हैं, वहीं होर्मुज जलडमरूमध्य वह अस्तित्वगत प्रवेश द्वार बना हुआ है, जिससे भारत की ऊर्जा जीवनरेखा बहती है। किसी भी एक चोक प्वॉइंट पर ऊर्जा व्यवधान का प्रभाव भारतीय उपभोक्ताओं के लिए आपूर्ति शृंखला में कीमतों में वृद्धि, माल को फिर से भेजने में देरी और शिपिंग सेवाओं की कमी के रूप में ‘रिपल इफैक्ट’ डाल सकता है। इसलिए, ऊर्जा संप्रभुता केवल आपूर्ति लाइनों को सुरक्षित करके हासिल नहीं की जा सकती, इसके लिए कमजोर बाहरी प्रणालियों पर निर्भरता को पूरी तरह कम करने की आवश्यकता है।

    बढ़ती निर्भरता, निरंतर संवेदनशीलता : 2013-14 में, भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 77 प्रतिशत आयात करता था। 2025 तक यह आंकड़ा 85 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गया है। इसी अवधि के दौरान तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एल.एन.जी.) का आयात क्रमश: 30 से बढ़कर 47 प्रतिशत हो गया है। ऐसी दुनिया में, जहां आपूर्ति के झटके अधिक बार और अप्रत्याशित होते जा रहे हैं, रणनीतिक पैट्रोलियम भंडार का विस्तार, नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देना और इथेनॉल सम्मिश्रण पर जोर देना उन संरचनात्मक समाधानों की भरपाई नहीं कर सकता, जिनकी अत्यंत आवश्यकता है।

    निर्भरता से लचीलेपन तक-भारत की ऊर्जा रणनीति पर पुनर्विचार : प्रभावी ऊर्जा सुरक्षा प्राप्त करने के लिए, भारत को ऊर्जा आपूर्ति मध्यवर्ती विकसित करने चाहिएं और घरेलू ऊर्जा आपूर्ति के लिए मूल्य शृंखलाएं स्थापित करनी चाहिएं। तेल आयात के वर्तमान उच्च स्तर को देखते हुए, रिफाइनिंग क्षमता विकसित करना, पैट्रोकैमिकल्स को एकीकृत करना और भंडारण बुनियादी ढांचे का विस्तार करना महत्वपूर्ण है। विदेशी ऊर्जा संपत्तियों में निवेश और अन्य देशों के साथ आपूर्ति के लिए दीर्घकालिक समझौते अपरिहार्य हैं। ऊर्जा कूटनीति विदेश नीति का एक प्रमुख फोकस होना चाहिए, जिसमें राजनीतिक रूप से स्थिर क्षेत्रों में हाइड्रोकार्बन भंडार में रणनीतिक निवेश पर विशेष जोर दिया जाए। इसके अलावा, भारत को देश की बढ़ती ऊर्जा मांगों को पूरा करने के लिए परमाणु ऊर्जा के विकास में तेजी लाने के महत्व को पहचानना चाहिए। अन्य नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों (सौर और पवन) के विपरीत, परमाणु ऊर्जा एक प्रभावी और विश्वसनीय विकल्प है, जो मौसम की स्थिति से प्रभावित हुए बिना ‘बेसलोड’ बिजली उत्पादन प्रदान करने में सक्षम है।

    ऊर्जा सुरक्षा ही राष्ट्रीय सुरक्षा है : राष्ट्रीय ऊर्जा नीति और 2030 तक 500 गीगावॉट गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता का लक्ष्य और रणनीतिक पैट्रोलियम भंडार विस्तार योजनाओं सहित विभिन्न प्रकार की नीतियों को लागू करने के बावजूद, भारत के पास अभी भी एक व्यापक ऊर्जा सुरक्षा सिद्धांत की कमी है। एक समन्वित और एकीकृत ऊर्जा सुरक्षा योजना को अपनाया जाना चाहिए, जो स्थानीय ऊर्जा उत्पादन, ऊर्जा विविधीकरण, ऊर्जा भंडारण, ऊर्जा प्रौद्योगिकी और ऊर्जा कूटनीति को एक एकल संधारणीय प्रतिमान में संयोजित करे। होर्मुज संकट को एक चेतावनी के रूप में काम करना चाहिए कि ऊर्जा सुरक्षा राष्ट्रीय सुरक्षा का अभिन्न अंग है। जैसे-जैसे दुनिया अधिक खंडित और संघर्ष-प्रवण होती जा रही है, दूरस्थ और विवादित आपूर्ति लाइनों पर हमारी निर्भरता हमें दुश्मन के हमलों के प्रति संवेदनशील बनाती है, जिससे हमारी आर्थिक संप्रभुता के लिए बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिम पैदा होते हैं। समय आ गया है कि ऊर्जा निर्भरता के प्रबंधन से आगे बढ़कर मध्यम अवधि में इसे प्रभावी ढंग से कम करने की दिशा में कदम उठाए जाएं।-मनीष तिवारी

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