धनतेरस पर सोने-चांदी से आगे बढ़कर स्वास्थ्य में निवेश करें
श्री प्रतापराव जाधव
“शुभं करोति कल्याणम् आरोग्यं धनसंपदा।”
संस्कृत की प्रार्थना के ये परिचित शब्द हमारी परंपराओं में स्वास्थ्य, कल्याण और समृद्धि के गहरे संबंध को बड़ी सुंदरता से व्यक्त करते हैं। ये हमें याद दिलाते हैं कि सच्ची समृद्धि केवल भौतिक संपत्ति से नहीं, बल्कि हमारे अपनों के स्वास्थ्य और खुशहाली से भी मापी जाती है। हर वर्ष धनतेरस के आते ही हमारे घरों में दीपावली की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। घरों की साफ-सफाई और सजावट होती है, बाजारों में उत्सव का उल्लास दिखाई देता है और लोग समृद्धि के प्रतीक के रूप में नई वस्तुएं खरीदते हैं। इन उत्सवों के बीच मेरे मन में अक्सर एक सरल-सा प्रश्न उठता है कि जब हम अपने परिवार के समृद्ध भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए इतनी तैयारियां करते हैं, तो उनके स्वास्थ्य की रक्षा पर कितना ध्यान देते हैं?
हम भविष्य के लिए बचत करते हैं, अपनी संपत्ति का बीमा कराते हैं और आर्थिक निवेश की योजनाएं बनाते हैं। लेकिन जिन आदतों पर हमारे आने वाले वर्षों का स्वास्थ्य निर्भर करता है, उन पर अक्सर सबसे कम ध्यान दिया जाता है। समय पर भोजन न करना हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन जाता है, पर्याप्त नींद न लेना व्यस्त जीवन की पहचान समझी जाने लगती है और स्वास्थ्य जांच तब तक टाल दी जाती है, जब तक कोई परेशानी गंभीर रूप नहीं ले लेती। धनतेरस हमें अपनी इन प्राथमिकताओं पर फिर से विचार करने का अवसर देता है।
धनतेरस का आयुर्वेद के साथ विशेष संबंध है। यह पर्व भगवान धन्वंतरि के प्राकट्य से जुड़ा है, जिन्हें देवताओं के वैद्य और आयुर्वेद के आदि प्रवर्तक के रूप में पूजा जाता है। समुद्र मंथन के दौरान अमृत कलश लेकर उनका प्रकट होना स्वास्थ्य और दीर्घायु की मानवता की चिरकालिक आकांक्षा का प्रतीक है। यही संबंध धनतेरस को सोने, चांदी या घरेलू वस्तुओं की खरीदारी से कहीं अधिक व्यापक अर्थ प्रदान करता है। यह हमें याद दिलाता है कि समृद्धि का वास्तविक आनंद तभी है, जब हमारे पास उसे अनुभव करने और अपने प्रियजनों के साथ साझा करने के लिए अच्छा स्वास्थ्य हो।
आयुष तथा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, दोनों मंत्रालयों की जिम्मेदारी निभाते हुए मैं अपने दैनिक जीवन में इस संदेश के महत्व को भली-भांति समझता हूं। स्वास्थ्य को लेकर हमारी बातचीत अक्सर तब शुरू होती है, जब बीमारी हमारे जीवन में दस्तक दे चुकी होती है। हम अस्पतालों, दवाओं और उपचार की चर्चा करते हैं, जो निस्संदेह आवश्यक हैं। लेकिन एक उतनी ही महत्वपूर्ण बातचीत इससे बहुत पहले शुरू होनी चाहिए, हमारे घरों, रसोईघरों, कार्यस्थलों और रोजमर्रा की दिनचर्या में।
क्या हम उपचार को जितना महत्व देते हैं, उतना ही महत्व बीमारियों की रोकथाम को भी दे सकते हैं?
यही प्रश्न आयुर्वेद की स्वास्थ्य संबंधी सोच के मूल में है। आयुर्वेद का सिद्धांत ‘स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणम्’, अर्थात स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना, आज की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए भी अत्यंत प्रासंगिक है। यह हमें बताता है कि हमारा स्वास्थ्य इस बात से प्रभावित होता है कि हम क्या खाते हैं, कितनी नींद लेते हैं, कितने शारीरिक रूप से सक्रिय रहते हैं और अपनी देखभाल कितनी नियमितता से करते हैं। आज जब गैर-संचारी रोग, निष्क्रिय जीवनशैली और तनाव स्वास्थ्य संबंधी बड़ी चुनौतियों के रूप में सामने आ रहे हैं, तब निवारक स्वास्थ्य सेवाओं पर अधिक ध्यान देना आवश्यक हो गया है।
उदाहरण के लिए, परिवार के साथ किया जाने वाला एक साधारण भोजन भी स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने का अवसर हो सकता है। इसके माध्यम से हम बच्चों में पौष्टिक भोजन की आदत विकसित कर सकते हैं और परिवार के बुजुर्गों की पोषण संबंधी आवश्यकताओं का ध्यान रख सकते हैं। इसी प्रकार प्रतिदिन टहलना, नियमित योगाभ्यास करना या सोने और जागने का समय निश्चित रखना भले ही छोटे प्रयास लगें, लेकिन लंबे समय तक इनका पालन करने से स्वास्थ्य में सार्थक बदलाव आ सकता है। निवारक स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक शक्ति अक्सर ऐसे ही सरल और रोजमर्रा के निर्णयों में निहित होती है।
भारत की आयुष चिकित्सा पद्धतियां स्वास्थ्य संरक्षण और समग्र कल्याण की इस संस्कृति को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। आयुष्मान आरोग्य मंदिर (आयुष) जैसी पहलों के माध्यम से सामुदायिक स्तर पर आयुष आधारित स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं। साथ ही, वैज्ञानिक अनुसंधान, गुणवत्ता मानकों और प्रमाण-आधारित चिकित्सा पद्धतियों को बढ़ावा देना भी आवश्यक है, ताकि भारत का पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान वर्तमान स्वास्थ्य सेवाओं में जिम्मेदारी और प्रभावी ढंग से योगदान दे सके।
हालांकि, परिवारों और समुदायों की सक्रिय भागीदारी के बिना कोई भी स्वास्थ्य पहल पूरी तरह सफल नहीं हो सकती। एक स्वस्थ भारत का निर्माण केवल संस्थानों और स्वास्थ्य सुविधाओं के माध्यम से नहीं किया जा सकता। इसके लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपनी रोजमर्रा की आदतों और निर्णयों में स्वास्थ्य को प्राथमिकता देनी होगी। जब भारत वर्ष 2047 में अपनी स्वतंत्रता के सौ वर्ष पूरे करेगा, तब विकसित भारत की हमारी परिकल्पना में ऐसे नागरिक भी होने चाहिए, जो अधिक स्वस्थ, जागरूक और रोकी जा सकने वाली बीमारियों से स्वयं को सुरक्षित रखने में सक्षम हों।
यहीं धनतेरस की भावना हमें एक सार्थक बदलाव के लिए प्रेरित कर सकती है। हम इस पर्व को अपने घर में कुछ नया लाने से जोड़कर देखते हैं। तो क्यों न इस वर्ष हम अपने घर एक नई अच्छी आदत भी लेकर आएं? यह आदत सोच-समझकर पौष्टिक भोजन करने की हो सकती है, नियमित योगाभ्यास की हो सकती है, पर्याप्त नींद लेने की हो सकती है या परिवार के किसी सदस्य को लंबे समय से टल रही स्वास्थ्य जांच कराने के लिए प्रेरित करने की हो सकती है।
इस शुभ अवसर पर मैं प्रत्येक नागरिक से अपील करता हूं कि वह निवारक स्वास्थ्य सेवाओं को अपने जीवन का हिस्सा बनाने का व्यक्तिगत संकल्प ले। आइए, हम अपनी दिनचर्या में कम से कम एक सकारात्मक बदलाव की शुरुआत करें और परिवार के किसी एक अन्य सदस्य को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करें। अपने बुजुर्गों और बच्चों के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दें, आवश्यकता पड़ने पर समय से चिकित्सकीय सलाह लें और स्वस्थ जीवनशैली को पूरे परिवार की साझा जिम्मेदारी बनाएं।
इस धनतेरस जब हम अपने घरों में दीपक जलाएं, तो उसकी रोशनी हमें अपने और अपने प्रियजनों के प्रति हमारी जिम्मेदारी का भी स्मरण कराए। हम जो आभूषण खरीदते हैं, वे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को विरासत में मिल सकते हैं, लेकिन जो अच्छी स्वास्थ्य संबंधी आदतें हम अपने परिवार में विकसित करते हैं, वे भी आने वाली पीढ़ियों के लिए उतनी ही मूल्यवान विरासत बन सकती हैं।
इस धनतेरस आइए, हम अपने घर केवल समृद्धि के प्रतीक ही नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन की नई आदतें भी लेकर आएं। अपने प्रियजनों की देखभाल करें, स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं और निवारक स्वास्थ्य को अपने परिवार के उज्ज्वल भविष्य की नींव बनाएं।
(लेखक केंद्रीय आयुष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) एवं स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री हैं।)

