स्वच्छ ईंधन की बात करें तो, जहां 2014 में केवल 13 करोड़ एलपीजी कनेक्शन थे, वहीं अब यह संख्या 34 करोड़ से ज्यादा हो गई है। खास बात यह है कि इनमें से 10 करोड़ नए कनेक्शन उज्ज्वला योजना के तहत दिए गए…
26 मई 2014 को, भारतीय जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत मिलने के बाद, नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ली और पहली पूर्ण गैर-कांग्रेसी सरकार का नेतृत्व किया। जहां आजादी के बाद के शुरुआती तीन दशकों में भारत की आर्थिक विकास दर 3 से 4 प्रतिशत के बीच रही, वहीं पश्चिमी एशिया और दूसरी जगहों के छोटे देशों ने तकनीकी तरक्की के साथ-साथ बहुत तेजी से आर्थिक विकास किया। जहां भारत को एक विकासशील देश माना जाता रहा, वहीं ये छोटे देश ‘एशियन टाइगर्स’ के तौर पर मशहूर हो रहे थे। गरीबी कम होने की रफ्तार भी बहुत प्रभावशाली नहीं थी। एक खास ढांचे के आधार पर गरीबी का पहला आकलन 1973-74 में किया गया, जब योजना आयोग ने गरीबी रेखा की अवधारणा पेश की, जिसके मुताबिक 54.9 प्रतिशत आबादी इसके नीचे रह रही थी। हालांकि समय के साथ गरीबी रेखा की परिभाषाएं बदलती रहीं, लेकिन 2012-13 में भी 21.9 प्रतिशत आबादी- यानी 269.3 मिलियन (26.93 करोड़) लोग- गरीबी रेखा से नीचे माने जाते थे। इस बीच, वल्र्ड बैंक की परिभाषा के मुताबिक- जिसमें 2012-13 में रोजाना 1.25 अमरीकी डालर से कम कमाने वालों को घोर गरीबी में रहने वाला माना गया था- दुनिया के 1.2 अरब गरीब लोगों में से एक-तिहाई, यानी 40 करोड़ लोग, भारत में थे। हालांकि, 2025 तक, वल्र्ड बैंक की परिभाषा- जिसे बढ़ाकर 2.15 अमरीकी डालर प्रति दिन कर दिया गया था- के आधार पर घोर गरीबी में रहने वाली कुल आबादी का हिस्सा घटकर सिर्फ 2.3 प्रतिशत रह गया है।
अमरीकी डालर प्रति दिन की ज्यादा नई परिभाषा के तहत भी, यह आंकड़ा सिर्फ 5.3 प्रतिशत होने का अनुमान है। इसे निश्चित रूप से एक बड़ी उपलब्धि माना जा सकता है, जो प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में हुई। आज भारत और दुनिया भर में गरीबी की एक ऐसी परिभाषा मौजूद है जो इस घोर गरीबी से आगे जाती है, यानी ‘बहुआयामी गरीबी’। इसे मापने में दस पैमाने शामिल हैं : दो शिक्षा से जुड़े, दो स्वास्थ्य से, और बाकी छह में आवास, बिजली, स्वच्छता, खाना पकाने के लिए साफ ईंधन, पीने का पानी और संपत्ति का मालिकाना हक शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के अनुसार, 2015-16 और 2019-21 के बीच, सिर्फ पांच सालों में बहुआयामी गरीबी सूचकांक 0.117 से घटकर 0.069 हो गया। नीति आयोग की रिपोर्ट है कि बहुआयामी गरीबी 2013-14 में 29.17 प्रतिशत से घटकर 2022-23 में अनुमानित 11.28 फीसदी हो गई, जो एक दशक में लगभग 18 प्रतिशत अंकों की कमी को दर्शाता है। दूसरे शब्दों में, यह कहा जा सकता है कि भारत में न केवल घोर गरीबी में बल्कि बहुआयामी गरीबी में भी उल्लेखनीय कमी आई है। आम तौर पर, कई आर्थिक विशेषज्ञ यह तर्क देते हैं कि यदि आर्थिक विकास के दौर में गरीबी कम करने के प्रयासों के तहत संसाधनों के पुनर्वितरण पर ध्यान केंद्रित किया जाता है, तो विकास की गति धीमी हो सकती है। इसलिए, उनका मानना है कि आर्थिक विकास के चरणों के दौरान पुनर्वितरण को प्राथमिकता देना उचित नहीं है। इस विचार को मानने वाले अर्थशास्त्री, जो मुक्त व्यापार और मुक्त बाजार के समर्थक भी हैं, उनमें न केवल वल्र्ड बैंक और इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड के विशेषज्ञ शामिल हैं, बल्कि प्रो. जगदीश भगवती और उनके सह-लेखक प्रो. अरविंद पनगढिय़ा जैसी बड़ी हस्तियां भी इसी श्रेणी में आती हैं। ऐसे अर्थशास्त्रियों की दलीलों के बावजूद, न केवल भारत ने आर्थिक विकास दर ऊंचा रखा, बल्कि बहुआयामी और अत्यधिक गरीबी को कम करने में भी बड़ी सफलता हासिल की। कोविड-19 के कारण एक साल के झटके के बावजूद, नरेंद्र मोदी के कार्यकाल के दौरान भारत की वास्तविक जीडीपी लगभग 7.5 प्रतिशत की औसत वार्षिक दर से बढ़ती रही। हमें यह भी पहचानना होगा कि देश में असमानता और गरीबी को कम करने में कौनसी नीतियां असरदार साबित हुईं। यह समझना जरूरी है कि जहां आजादी के बाद के शुरुआती सालों में गरीबी कम होने की रफ्तार बहुत धीमी थी, वहीं मोदी के राज में गरीबी कम करने की दिशा में कैसे बड़ी प्रगति हुई, जिससे विकास पहले की तुलना में कहीं ज्यादा समावेशी हो गया।
वित्तीय समावेशन : आजादी और 2014 के बीच विकास की कई कोशिशों के बावजूद, देश में वित्तीय समावेशन के मामले में कोई खास प्रगति नहीं हुई। इसका सबूत यह है कि 2014 और 2026 के बीच 580 मिलियन (58 करोड़) जन धन खाते खोले गए। और इन जन धन खातों में कुल 3 लाख करोड़ रुपए जमा हो गए थे। जन धन खाते जीरो बैलेंस खाते होते हैं, यानी इन्हें खोलने के लिए किसी शुरुआती जमा राशि की जरूरत नहीं होती। वित्तीय समावेशन का एक और पहलू ‘प्रत्यक्ष लाभ अंतरण’ (डीबीटी) है। पहले, सरकार द्वारा कल्याणकारी योजनाओं के लिए आवंटित फंड का एक बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार की बलि चढ़ सही लाभार्थियों तक नहीं पहुंच पाता था। जन-धन खाते खुलने के बाद, उन्हें आधार (यूआईडी) और मोबाइल फोन नंबरों से जोड़ा गया, नतीजतन अब पूरी कल्याणकारी राशि सीधे लाभार्थी के खाते में ट्रांसफर की जाती है, जिससे पैसे के बीच में ही गायब होने या चोरी होने की कोई गुंजाइश नहीं रहती। इस प्रक्रिया को वित्तीय समावेशन का एक और पहलू ‘डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर’ (डीबीटी) है। पहले, सरकार द्वारा कल्याणकारी योजनाओं के लिए आवंटित फंड का एक बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार के कारण सही लाभार्थियों तक नहीं पहुंच पाता था। हालांकि, जन-धन खाते खुलने के बाद, उन्हें आधार (यूआईडी) और मोबाइल फोन नंबरों से जोड़ा गया। नतीजतन अब पूरी कल्याणकारी राशि सीधे लाभार्थी के खाते में ट्रांसफर की जाती है, जिससे पैसे के बीच में ही गायब होने या चोरी होने की कोई गुंजाइश नहीं रहती। इस प्रक्रिया को ‘जैम त्रय’ के नाम से जाना जाता है- जिसमें जन-धन खाते, आधार और मोबाइल कनेक्टिविटी शामिल हैं, यह एक ऐसी उपलब्धि है जिसे भारत ने अपनी तकनीकी क्षमता के दम पर हासिल किया है।
महिलाओं के लिए खास : आवास, स्वच्छता, स्वच्छ ईंधन, बिजली और पानी : आजादी से लेकर 2014 तक के सफर की एक बहुत बड़ी सच्चाई यह थी कि 2014 में भी देश में 12.3 करोड़ लोग कच्चे (अस्थायी) घरों में रहते थे, जबकि 31.7 करोड़ लोग अर्ध-स्थायी घरों में रहते थे। इसके विपरीत, सिर्फ पिछले 12 वर्षों में ग्रामीण इलाकों में 3 करोड़ और शहरी इलाकों में 1 करोड़ घर बनाए गए हैं, और उसके अलावा 1.2 करोड़ घर या तो मंजूर हो चुके हैं या बन रहे हैं। खुले में शौच करने की मजबूरी को लंबे समय से देश के लिए एक बड़ा कलंक माना जाता था। यह संतोष की बात है कि 2014 के बाद से देश भर में 12.8 करोड़ शौचालय बनाए गए हैं, जिससे खुले में शौच की समस्या का प्रभावी ढंग से समाधान हो गया है। आज, देश में लगभग पूरी तरह से बिजली पहुंच चुकी है, और ‘हर घर नल से जल’ योजना के तहत ज्यादातर इलाकों में पीने का पानी उपलब्ध हो गया है। स्वच्छ ईंधन की बात करें तो, जहां 2014 में केवल 13 करोड़ एलपीजी कनेक्शन थे, वहीं अब यह संख्या 34 करोड़ से ज्यादा हो गई है। खास बात यह है कि इनमें से 10 करोड़ नए कनेक्शन उज्ज्वला योजना के तहत दिए गए, जिसके जरिए गरीब परिवारों की महिलाओं को मुफ्त सिलेंडर और गैस स्टोव उपलब्ध कराए गए। आवास, पानी, बिजली, स्वच्छता सुविधाएं और एलपीजी कनेक्शन ऐसी उपलब्धियां हैं जिनसे पूरे समाज और खासकर गरीबों को फायदा हुआ है। हालांकि, महिलाओं का सबसे ज्यादा सशक्तिकरण हुआ है क्योंकि सुविधाएं मिलने से वंचित परिवारों की महिलाओं के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव आया है।-डा. अश्वनी महाजन

