Close Menu
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Trending
    • मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने अपनी माँ के नाम पर लगाया पीपल का पौधा, वन महोत्सव-2026 का हुआ शुभारंभ
    • रांची में प्रदर्शनकारी छात्रों से बातचीत के लिए CM हेमंत ने बनाई 4 मंत्रियों की कमिटी
    • डीपफेक और बाल शोषण पर घिरा मेटा: जुकरबर्ग ने सरकार से मांगी माफी
    • विश्व स्तनपान सप्ताह : स्वास्थ्य मंत्री करेंगे राज्य स्तरीय कार्यक्रम की अध्यक्षता,छत्तीसगढ़ में स्थापित होगा पहला मातृ दूध कोष (मदर मिल्क बैंक)
    • वित्त मंत्री श्री ओ.पी. चौधरी ने किया सम्मानित, 13,912 आवेदनों के सफल निराकरण से बनाया रिकॉर्ड
    • ‘मुख्यमंत्री समग्र ग्रामीण विकास योजना’के तहत तिल्दा की विभिन्न ग्राम पंचायतों में 41 लाख से 10 नए रंगमंचों का निर्माण
    • डीजी जेल हिमांशु गुप्ता ने बिलासपुर केंद्रीय जेल का किया आकस्मिक निरीक्षण
    • Breaking : राज्यसभा से जजों की संख्या बढ़ाने वाला बिल पास
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Chhattisgarh RajyaChhattisgarh Rajya
    Wednesday, August 5
    • खानपान-सेहत
    • फीचर
    • राशिफल
    • लेख-आलेख
    • व्यापार
    • बिलासपुर
    • रायपुर
    • भिलाई
    • राजनाँदगाँव
    • कोरबा
    Chhattisgarh RajyaChhattisgarh Rajya
    Home»संपादकीय»बहस के बिना कानून: लोकतंत्र में संवाद जरूरी
    संपादकीय

    बहस के बिना कानून: लोकतंत्र में संवाद जरूरी

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inAugust 4, 2026
    Facebook Twitter WhatsApp Email Telegram
    Share
    Facebook Twitter LinkedIn Pinterest Email

    संसद देश का सर्वोच्च विधायी निकाय है, जहां जनकल्याण से जुड़े मसलों पर मंथन किया जाता है और उसके निष्कर्षों के आधार पर नीति निर्माण का खाका तैयार किया जाता है। जनता की आकांक्षाओं को आकार देने और देश को लोकतांत्रिक दिशा प्रदान करने में संसद की भूमिका सर्वोपरि है। आमजन की यह उम्मीद होती है कि उनके चुने हुए प्रतिनिधि उनकी समस्याओं, चिंताओं एवं जरूरतों को संसद में रखेंगे और उन पर विचार-विमर्श के बाद एक सक्षम कानून या योजना बनाई जाएगी। मगर, जब संसद में व्यापक चर्चा के बिना ही किसी विधेयक को पारित कर कानून की शक्ल दे दी जाए, तो उसकी समग्र व्यावहारिकता और सार्थकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

    संसद के मानसून सत्र में अब तक ऐसी ही स्थिति देखने को मिली है। हाल ही में विद्यार्थियों के आंदोलन से निकले लोक परीक्षा (अनुचित साधन निवारण) संशोधन विधेयक, 2026 को व्यापक चर्चा और सुझावों के बिना ही पारित कर दिया गया और सोमवार को दो अन्य विधेयकों को भी इसी तरह से मंजूरी दे दी गई।

    अहम सवाल यह है कि संविधान में संसद सत्र आयोजित किए जाने की जो व्यवस्था की गई है, क्या उसका मूल उद्देश्य पूर्ण हो पा रहा है? अगर किसी कानून या योजना को सक्षम एवं कारगर बनाने में विपक्ष की कोई भूमिका न हो, तो संसद की प्रासंगिकता क्या रह जाएगी? इसमें दोराय नहीं कि सदन को सुचारु रूप से चलाने की जिम्मेदारी सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों की है। मगर जब विपक्ष कोई सवाल या समस्या उठाता है, तो उसका निराकरण करना सत्तापक्ष का दायित्व होता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्तापक्ष अपनी जवाबदेही से पल्ला नहीं झाड़ सकता। संसद के मानसून सत्र की अब तक की अवधि पर नजर डालें, तो हंगामा और कार्यवाही का स्थगन, इन्हीं दो बातों पर जोर दिया गया है।

    ऐसा लगता है कि स्थगन, कार्यवाही का पर्याय बन गया है। विपक्ष नीट प्रश्नपत्र लीक के विरोध में प्रदर्शन कर रहे विद्यार्थियों पर पुलिस कार्रवाई तथा राम मंदिर चढ़ावा चोरी के मुद्दों को लगातार संसद में उठा रहा है और हंगामे के कारण दोनों सदनों की कार्यवाही बार-बार स्थगित हो जाती है। इस बीच महत्त्वपूर्ण विधेयक भी व्यापक चर्चा के बिना ही पारित हो जाते हैं।

    संसद में बने इस गतिरोध को दूर करने के बजाय आरोप-प्रत्यारोप के जरिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। विपक्ष का कहना है कि सरकार उनकी मांग को नजरअंदाज कर लोकतंत्र पर प्रहार कर रही है, तो सत्तापक्ष का दावा है कि विपक्ष जानबूझकर सदन की कार्यवाही में व्यवधान उत्पन्न कर रहा है। इसी का नतीजा रहा कि लोकसभा में उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीश संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 और राज्यसभा में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास (संशोधन) विधेयक भी विस्तृत चर्चा के बगैर ही पारित कर दिए गए।

    ऐसे में यह सवाल महत्त्वपूर्ण है कि संसद में अपेक्षित कामकाज न होने से उसके कीमती समय और धन की जो बर्बादी हो रही है, उसके लिए कौन जिम्मेदार है? क्या यह दोनों पक्षों का दायित्व नहीं है कि गतिरोध को खत्म करने के लिए व्यावहारिक तौर पर गंभीरता से प्रयास किए जाएं, ताकि जन सरोकार से जुड़े मसलों पर सार्थक चर्चा और मूल्यवान सुझावों के आधार पर नीतियों का निर्माण किया जा सके। किसी भी समस्या का हल सरकार की प्राथमिकता में होना चाहिए, फिर चाहे संसद में गतिरोध हो या सड़क के रास्ते सत्ता के गलियारों में पहुंचने वाली मांग हो।

    यह विचित्र विडंबना है कि संविधान में दर्ज जिन नियम-कायदों का पालन न केवल तकनीकी दृष्टि से, बल्कि नैतिकता की कसौटी पर भी जरूरी होना चाहिए, उन्हें ताक पर रखकर कई बार सरकारें अपनी सुविधा के मुताबिक तर्क गढ़ लेती हैं।

    Share. Facebook Twitter Telegram WhatsApp Email
    chhattisgarhrajya.in
    chhattisgarhrajya.in
    • Website

    Related Posts

    …अग्निकांडों से’ जा रहे अनमोल प्राण!

    August 5, 2026

    टूट रहीं संसदीय मर्यादाएं

    July 31, 2026

    नीट पेपर लीक : नई पहल से क्या अब प्रतियोगी परीक्षाओं में लौटेगा भरोसा?

    July 29, 2026

    Address - Gayatri Nagar, Near Ashirwad Hospital, Danganiya, Raipur C.G.

    Chandra Bhushan Verma
    Owner & Editor
    Mobile - 9826237000 Email - chhattisgarhrajya.in@gmail.com
    Facebook X (Twitter) Instagram Pinterest
    • About Us
    • Contact Us
    • Privacy Policy
    • Terms and Conditions
    • Disclaimer
    © 2026 ThemeSphere. Designed by ThemeSphere.

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.