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    Home»लेख-आलेख»यू.जी.सी. विनियम 2026 पर स्टे…
    लेख-आलेख

    यू.जी.सी. विनियम 2026 पर स्टे…

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inJanuary 30, 2026
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    सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वीरवार यू.जी.सी. विनियम 2026 पर स्टे लगाने के बाद देश के हर सामान्य नागरिक विशेषकर छात्रों और शिक्षकों ने राहत की सांस ली है। उसकी जगह कोर्ट ने अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए फिलहाल पूर्ववर्ती 2012 के नियम को लागू कर दिया है। मार्च के महीने में 2026 के विनियम पर विस्तृत सुनवाई होगी। लेकिन माननीय मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायाधीश जॉयमाला बागची की खंडपीठ ने इसके बारे में जो टिप्पणियां की हैं, वे काफी गंभीर और विचारणीय हैं। उन्होंने जाति से जुड़े कुछ आधारभूत प्रश्न किए हैं।

    यू.जी.सी. के इस भेदभावपूर्ण विनियम के आलोक में माननीय सर्वोच्च न्यायालय की यह टिप्पणी कि क्या हम उल्टी दिशा में जा रहे हैं, अपने आप में बड़े प्रश्न खड़े करती है। खंडपीठ ने कहा कि हमें एक जातिविहीन समाज की ओर बढऩा चाहिए लेकिन हम आजादी के 75 साल बाद भी जाति  की जंजीरों में जकड़े हुए हैं। क्या पिछले 75 वर्षों में हमने जो कुछ हासिल किया, उसको गंवाना चाहते हैं? यह चिंताजनक है। भारत का संविधान एक समावेशी समाज बनाने पर बल देता है। जातिवाद के खिलाफ हमने बड़े कदम उठाए हैं। जिस किसी को भी सुरक्षा की जरूरत है वह उसको मिलनी चाहिए। जहां तक इस विनियम का प्रश्न है, तो प्रथम दृष्टया यह अस्पष्ट दिखता है। कानून के विशेषज्ञों को इसकी भाषा को स्पष्ट करने की जरूरत है। अपने वर्तमान स्वरूप में इस विनियम के दुरुपयोग की संभावनाएं हैं और यह संविधान की धारा 31 सी को चुनौती देता है। ये वही प्रश्न थे जो हर किसी को खटक रहे थे। 

    वास्तव में उच्च शिक्षा व्यवस्था से यह अपेक्षा की जाती है कि वह समाज को बांटने वाले पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर ज्ञान, विवेक और मुक्त ङ्क्षचतन को बढ़ावा दे। विश्वविद्यालय और कॉलेज विचारों के ऐसे मंच होते हैं, जहां व्यक्ति अपनी पहचान से पहले छात्र और फिर शोधकत्र्ता बनता है। दुर्भाग्यवश, यू.जी.सी. द्वारा प्रस्तावित इक्विटी रैगुलेशन 2026 इसी मूल भावना के विपरीत खड़ा दिखाई देता है। यह विनियम समानता के नाम पर भेदभाव की एक ऐसी इकतरफा और संकीर्ण परिभाषा गढ़ता है, जो समस्या के समाधान से अधिक, नई समस्याओं को जन्म देने वाली है। स्वयं मेरे लिए एक शिक्षक के रूप में यह मानना कठिन है कि कक्षा में खड़ा होकर कोई भी शिक्षक अपने  विद्यार्थियों को जाति के चश्मे से देखता या उनसे कोई भेदभाव करता है। वर्षों तक पढ़ाने, मार्गदर्शन देने और शोध कराने के दौरान एक शिक्षक के लिए छात्र की पहचान उसकी जिज्ञासा, अनुशासन और बौद्धिक क्षमता से बनती है, न कि किसी सामाजिक वर्ग से। यही कारण है कि अधिकांश शिक्षक अपने छात्रों की उपलब्धियों में ईष्र्या नहीं, बल्कि गर्व महसूस करते हैं, चाहे वे किसी भी जाति-वर्ग से हों। 

    जिस रोहित वेमुला प्रकरण के आलोक में इस एकतरफा कानून को बनाने की बात कही जा रही थी, उसकी सच्चाई खुद तेलंगाना सरकार की रिपोर्ट में खुल चुकी है। यू.जी.सी. रैगुलेशन 2026 की सबसे गंभीर समस्या उसकी जातिगत भेदभाव की परिभाषा है। यह परिभाषा पहले ही यह मानकर चलती है कि शैक्षणिक परिसरों में भेदभाव एकतरफा होता है, यानी एक वर्ग स्वभावत: उत्पीड़क है और दूसरा पीड़ित। यह दृष्टिकोण न केवल बौद्धिक रूप से आलसी है, बल्कि सामाजिक रूप से खतरनाक भी। क्या भेदभाव केवल एक ही दिशा में होता है? क्या अपमान, बहिष्कार, वैचारिक ङ्क्षहसा और सामाजिक तिरस्कार किसी एक ही वर्ग तक ही सीमित है? आज का सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य बिल्कुल अलग है। जिन्हें हम पिछड़ा या दलित कह कर संबोधित करते हैं, वे अब देश और समाज का नेतृत्व कर रहे हैं, उच्चतम पदों पर आसीन हैं और अपनी क्षमता का प्रदर्शन कर रहे हैं। देश की अल्पसंख्यक सामान्य जाति की तरफ से इसका कोई विरोध भी नहीं है। 

    फिर भी पिछले कुछ दशकों में विश्वविद्यालय परिसरों में खुलेआम जाति-आधारित नारेबाजी, सामूहिक अपमान और वैचारिक बहिष्कार के दृश्य देखे गए हैं। ‘तिलक-तराजू और तलवार’ जैसे प्रतीकों को गाली बनाकर प्रस्तुत करना, एक पूरे समुदाय को शोषक, मनुवादी या पितृसत्तात्मक कह कर खारिज करना अब फैशनेबल बना दिया गया है। संभवत: मार्च में जब इस विनियम पर सुनवाई होगी तो न्यायालय के समक्ष खतरनाक जातिगत भेदभाव के ये उदाहरण भी रखे जाएंगे। इसको ध्यान में रखते हुए यदि अब सर्वोच्च न्यायालय की गंभीर टिप्पणियों को देखें तो यह स्पष्ट होगा कि हमारी असल जरूरत ‘कास्ट-न्यूट्रल’ कैंपस विकसित करने की है, जहां छात्र आपस में तथा छात्र और शिक्षक एक-दूसरे के साथ खुल कर बातचीत कर सकें और अपने विचार रख सकें। नियम जरूर बनें, पर वे ऐसे हों ताकि कैंपस में किसी के खिलाफ जातिगत दुव्र्यवहार या भेदभाव किया जाना असंभव हो। आवश्यकता इस बात की है कि हम पूर्वाग्रहों से प्रेरित नीति-निर्माण की बजाय संतुलित, तर्कसंगत और न्यायपूर्ण दृष्टि अपनाएं। यदि शिक्षा संस्थान ही सामाजिक अविश्वास और वैमनस्य के केंद्र बन गए, तो समाज को दिशा कौन देगा? आशा है सर्वोच्च न्यायालय में अब यू.जी.सी. रैगुलेशन 2026 को इन्हीं कसौटियों पर परखा जाएगा।-मिहिर भोले

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