कुछ दिन पहले मैंने शिवसागर, बेटबारी, लिगिरिपुखुरी और नेपालिखुटी के बाढ़ प्रभावित गांवों का दौरा किया। कामरूप जिले के छायागांव से होने के नाते बाढ़ मेरे जीवन का हिस्सा रही है। यहां पानी उतरने के बाद भी बाढ़ खत्म नहीं होती। यह टूटे हुए घरों, गाद से दबे खेतों, खोए हुए मवेशियों और कभी न मिटने वाली यादों में बनी रहती है। यह उन लोगों के भीतर भी बनी रहती है, जो रात में घरों में पानी घुसने की आवाज सुनकर जाग जाते हैं। दोबारा बारिश होती है तो डर भी लौट आता है।
बेहद बेचैन करने वाला पल
बाढ़ से एक मां बूरी तरह टूट गई थी। क्योंकि उसकी युवा बेटी को अभी-अभी पहला पीरियड हुआ था। वे लगभग खाली हाथ घर से निकले थे और उनके पास अंडरवियर की एक अतिरिक्त जोड़ी तक नहीं थी। आसपास कोई दुकान नहीं थी और लड़की को किसी से मांगने में शर्म आ रही थी। हमने किसी तरह उसके लिए एक जोड़ी का इंतजाम किया। उसने मेरे पैर छूने की कोशिश की और कहा कि वह इस मदद को कभी नहीं भूलेगी। वह पल बेहद बेचैन करने वाला था। एक बहुत ही बुनियादी जरूरत सम्मान और जीवन का सवाल बन गई थी।
अपना घर छोड़ने से इनकार कर दिया
एक अन्य बुजुर्ग महिला ने अपना घर छोड़ने से इनकार कर दिया। वह केले के तनों से बनी नाव पर बैठकर अपनी बकरियों और मुर्गियों की रखवाली करती रही। जब हमारी नाव उसके पास पहुंची तो वह उस खेत के बारे में रोने लगी, जिसे उसने कई वर्षों की मेहनत से तैयार किया था। लोग कीचड़ में अपनी तस्वीरें और सामान तलाश रहे थे। बच्चे अपनी किताबें ढूंढ रहे थे। बाढ़ के ग्यारह दिन बाद भी हर तरफ पानी था। एक वीडियो में राहत सामग्री लेते हुए एक छोटे बच्चे ने चुपचाप कहा कि बस मेरे लिए दे दो। मुझे अपनी मां नहीं मिल रही है।
हर साल नए रूप में लौटती है बाढ़
कभी-कभी ऐसा लगता है कि असम में समय एक ही घेरे में घूम रहा है। हर साल बाढ़ नए रूप में लौटती है, जबकि नुकसान और जीवन बचाने की कहानियां एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती रहती हैं। हमारे माता-पिता और दादा-दादी के साथ जो हुआ, वह पूरी तरह अतीत की बात नहीं है। वह आज भी यह तय करता है कि हम कैसे जीते हैं और अगले मॉनसून से कितना डरते हैं। ग्रामीण असम में बड़े होने का मतलब था यह स्वीकार करना कि बाढ़ जीवन का हिस्सा है। हमने तैरना सीखा क्योंकि हमें पता था कि एक दिन यह हमारी जान बचा सकता है।
इस साल की बाढ़ ने बढ़ाई चिंता
मेरी मां जया दास शादी के बाद नाव से मेरे पिता के पुश्तैनी घर आई थीं। वह नीलाचल की पहाड़ियों में पली-बढ़ी थीं और उन्हें तैरना नहीं आता था। उन्होंने मुझे बताया कि शुरुआती दिन कितने मुश्किल थे। वहां शौचालय तक नहीं था और मेरी चाची को शौचालय का इस्तेमाल करने के लिए नाव चलाकर दूर जाना पड़ता था। इस समस्या से निपटने के लिए वर्षों से कई चर्चाएं, वादे और कोशिशें हुई हैं, लेकिन चुनौती अब भी बनी हुई है। इस साल कुछ अलग महसूस हुआ। पानी उन जगहों तक पहुंच गया, जहां लोगों ने कभी बाढ़ की कल्पना भी नहीं की थी। वहीं कुछ ऐसे इलाके थे जो आम तौर पर बाढ़ की चपेट में आते थे वो इस बार सूखे रहे। ऐसे बदलाव यह सवाल खड़े करते हैं कि क्या हम पर्यावरण के किसी गहरे असंतुलन को देख रहे हैं। जहां नदियों, बारिश, जमीन और इंसानी बस्तियों के बीच का रिश्ता बदल रहा है।

