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    Home»लेख-आलेख»आखिर क्यों बिखर रही हैं क्षेत्रीय पार्टियां?…
    लेख-आलेख

    आखिर क्यों बिखर रही हैं क्षेत्रीय पार्टियां?…

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inJune 25, 2026
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    पश्चिम बंगाल में हार के कुछ ही हफ्तों के भीतर तृणमूल कांग्रेस (टी.एम.सी.) जैसी क्षेत्रीय पार्टी के अचानक पतन और शिवसेना (यू.बी.टी.) में दूसरी बार विभाजन के साथ, यह संकेत मिल गया है कि परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं और समय के साथ, अन्य क्षेत्रीय पार्टियां भी इसी राह पर चल सकती हैं। जिस तेजी से पार्टियां बिखर रही हैं और जिस पैमाने पर विभाजन हो रहा है, उसने कई लोगों को चौंका दिया है। पश्चिम बंगाल विधानसभा में हार के कुछ ही हफ्तों के भीतर 80 विधायकों वाली टी.एम.सी. टूट गई और इसके बाद पार्टी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 ने अपने गुट का नैशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एन.सी.पी.आई.) नामक एक कम चॢचत पार्टी में विलय करने और संसद में भाजपा के नेतृत्व वाले एन.डी.ए. को समर्थन देने की घोषणा कर दी। और सोमवार को, बागी विधायकों ने टी.एम.सी. अध्यक्ष पद से बनर्जी को हटा दिया, जिससे असली पार्टी कौन है, इस पर अदालती लड़ाई का मंच तैयार हो गया है।

    यह कोई छिपी बात नहीं है कि अप्रैल में लोकसभा में मिली हार के बाद भाजपा संसद में दो-तिहाई बहुमत हासिल करना चाहेगी। इससे उसे विस्तारित लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटों के आरक्षण को आगे बढ़ाने और निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन को सुगम बनाने के उद्देश्य से संवैधानिक संशोधन विधेयक पारित करने में सहायता मिलेगी। भाजपा 2029 में सत्ता बरकरार रखने के अपने प्रयासों के लिए महिलाओं के समर्थन और परिसीमन को महत्वपूर्ण मानती है। 

    खबरों के मुताबिक, भाजपा द्रमुक की कुछ आपत्तियों को दूर करने के लिए परिसीमन विधेयक में बदलाव कर रही है। भाजपा द्रमुक के 22 लोकसभा सांसदों को अपने साथ लाने के लिए प्रलोभन और दबाव दोनों का इस्तेमाल कर रही है। कई लोगों का मानना है कि द्रमुक, जो कांग्रेस द्वारा उसे दरकिनार करके अभिनेता विजय की टी.वी.के. का साथ देने से पहले ही नाराज है, संशोधित परिसीमन विधेयक को स्वीकार कर सकती है, या तो मतदान से दूर रहकर या सत्ताधारी दल को मुद्दों के आधार पर समर्थन देकर। अगर ऐसा होता है, तो भाजपा के पास एन.डी.ए. के 293 सांसदों में 48 अतिरिक्त लोकसभा सांसद जुड़ जाएंगे-20 टी.एम.सी. के बागी सांसद, 22 द्रमुक के और 6 शिवसेना (यू.बी.टी.) के सांसद और इस तरह भाजपा को दो-तिहाई बहुमत (लोकसभा की वर्तमान संख्या 540) से सिर्फ 19 सांसद कम मिलेंगे।

    ‘करियरवादियों’ का वर्चस्व : हालांकि भाजपा को अपने इरादों का पता है लेकिन यह देखना महत्वपूर्ण है कि टी.एम.सी. और शिवसेना (यू.बी.टी.) जैसी पाॢटयां अचानक क्यों बिखर रही हैं। इनमें से कुछ तथाकथित बागी भारतीय आई.सी.ई. (आयकर, सी.बी.आई. और प्रवर्तन निदेशालय) की कार्रवाई से डर सकते हैं। वहीं, कुछ अन्य जानते हैं कि 2029 में वे अपनी मूल पार्टी के टिकट पर चुनाव नहीं जीत पाएंगे और ऐसी खबरें हैं कि भाजपा ने उन्हें 2029 में टिकट देने का आश्वासन दिया है। वहीं कुछ अन्य लोगों का मानना है, और बागी शिवसेना (यू.बी.टी.) सांसदों ने इसे खुलकर व्यक्त किया है, कि सत्ताधारी पार्टी का साथ देने पर उन्हें अपने निर्वाचन क्षेत्रों के विकास के लिए धन मिलेगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कई लोगों को लगता है कि विपक्ष के लिए यह एक लंबी लड़ाई होने वाली है और भाजपा की आज की लगभग अजेय स्थिति को देखते हुए, उसके साथ रहना बेहतर है।

    हाल की घटनाओं ने भारतीय लोकतंत्र में जनादेश की परिभाषा को बदल दिया है। ‘आया राम, गया राम’ की घटना (1960 के दशक के उत्तरार्ध में लगातार दलबदल करने वालों के लिए गढ़ा गया एक ङ्क्षहदी मुहावरा) कोई नई बात नहीं है। 1980 में, जब इंदिरा गांधी सत्ता में लौटीं, तो जनता पार्टी की सरकार के प्रमुख हरियाणा के मुख्यमंत्री भजन लाल ने पूरी विधानसभा को कांग्रेस में मिला लिया और रातों-रात कांग्रेस के मुख्यमंत्री बन गए। अब फूट डालने वाली पाॢटयों द्वारा बहुमत हासिल करने को अक्सर नई वैधता दी जा रही है। बीते वर्षों में मौजूद नैतिक मूल्यों को भूल जाइए, वे दिखावटी पर्दे भी गायब हो चुके हैं जो कभी हुआ करते थे।

    ‘अभिषेक’ की घटना : मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद, नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, के. चंद्रशेखर राव, एच.डी. देवेगौड़ा या एम.के. स्टालिन जैसे सत्ताधारी नेताओं ने अपने साम्राज्य का निर्माण किया (हालांकि द्रविड़ पार्टियां वैचारिक रूप से अधिक स्थिर रही हैं)। इन सभी ने सत्ता की बागडोर किसी भरोसेमंद सहयोगी की बजाय अपने परिवार के सदस्य को सौंपी। जब धन का बड़ा दाव लगा हो, तो नेता अपने सहयोगी की तुलना में अपने बेटे, बेटी या पत्नी पर अधिक भरोसा करते हैं। लेकिन अब एक प्रतिक्रिया शुरू होती दिख रही है, शायद वंशवादी सिद्धांत के खिलाफ नहीं, बल्कि वंशवादियों के कामकाज के तरीके के खिलाफ। इसे संक्षेप में ‘अभिषेक घटनाक्रम’ कहा जा सकता है। ममता बनर्जी के भतीजे और भावी उत्तराधिकारी अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व को लेकर टी.एम.सी. में स्पष्ट रूप से असंतोष पनप रहा था, जिन्हें पार्टी की असीमित बागडोर सौंप दी गई थी। भाजपा को टी.एम.सी. की इस अशांत स्थिति का फायदा उठाने का मौका मिला, क्योंकि ममता बनर्जी या तो इस असंतोष को समझ नहीं पाईं और शांत नहीं कर पाईं, या उन्होंने इसे नजरअंदाज करना चुना। हाल ही में हुए कई ‘तलाक’ अन्य पक्षों के लिए एक चेतावनी के रूप में सामने आए हैं-उन्हें आत्मचिंतन और अपनी दिशा में सुधार करना चाहिए।-कृष्ण भनोट 

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